ठा. रघुवीरिसंह जावली

ठा. रघुवीरिसंह जावली

ठा. रघुवीरसिंह जावली का जन्म दिनांक 29 अक्टूबर 1902 को राजा दुर्जनसिंह जावली (जिला अलवर, तत्कालीन अलवर राज्य) के घर में हुआ था। कछवाहों की शाखा नरूका वंश के राजा दुर्जनसिंह जावली ठिकाने के जागीरदार थे। रघुवीरसिंह उनके तृतीय पुत्र थे। राजा दुर्जनसिंह संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू भाषाओँ के सांगोपांग ज्ञाता व साहित्य के मननशील विद्वान थे। आपने श्री भगवदगीता सिद्धान्त पुस्तक भी लिखी। अलवर राज्य में आप पच्चीस वर्षों तक मंत्री, प्रधानमंत्री व अन्य उत्तरदायित्वपूर्ण पदीं पर कार्यरत रहे। आपके ही मंत्रिकाल में राज्य मे शिक्षा की अभूतपूर्व उन्नति हुई व हिन्दी को उर्दू के स्थान पर राज्य भाषा के आसन पर आरूढ़ किया गया। बालक रघुवीरसिंह पर एक और उनके विद्वान, सतोगुणी कर्मयोगी अपने पिता दुर्जनसिंह का प्रभाव पड़ा वहीं दूसरी ओर उनकी माता के उत्कृष्ट पवित्र व भक्तिमय जीवन का भी कम प्रभाव नहीं पड़ा।
जयपुर शहर से करीब 11 किमी. मनोहरपुरिया ग्राम में सन्त रामसिंह की समाधि पर प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति पर मेला लगता है। ये सन्त रामसिंह रावलोत भाटी ठा. मंगलसिंह के सुपुत्र थे, जिन्होंने पुलिस में सब-इन्सपेक्टर रहते हुए इतना उच्च कोटि का जीवन बिताया कि आज वे सन्त के रूप में पूजे जाते हैं। ये सन्त रामसिंह ठा. रघुवीरसिंह जावली के मामा थे। सन्त रामसिंह की सबसे बड़ी पुत्री दयाल कँवर खूड़ में सती हुई व उनकी बहिन ने ठा. रघुवीरसिंह जैसे कर्मवीर को जन्म दिया। प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा के उपरान्त बालक रघुवीर सिंह भारत में सुविख्यात मेयो कॉलेज अजमेर में शिक्षार्थ भेजे गये। वहाँ पर तीन-चार वर्ष पढ़ने के उपरान्त आप आगरा कॉलेज में प्रविष्ट कराये गये। अपने क्षत्रियोचित स्वभाव की स्वतंत्र वृति के कारण आपका मन कॉलेज के नकली अनुशासन की सीमा में बँधा नहीं रहा। परम देशभक्त लोकमान्य तिलक की राजनैतिक विचारधारा का आप पर बड़ा प्रभाव पड़ा। जब आगरे में तिलक महाराज का आगमन हुआ तो आपने कॉलेज के प्रिंसिपल की निषेधात्मक आज्ञा की तनिक भी परवाह न करके उनका स्वागत किया और उनके भाषण को सुनने गये। परिणामतः प्रिंसिपल ने आपके विरुद्ध अनुशासनात्मक कदम उठाया और ग्रीष्मकालीन अवकाश में आपको घर जाने की आज्ञा नही मिली।

उन्हीं दिनों जब सन् 1921 में गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन चलाया और विदेशी कपड़े की होली जलाई तब आप कॉलेज के उन प्रथम छात्रों में से थे जिन्होंने उसमें सक्रिय सहयोग दिया। आपने भी अपने कुछ साथियों सहित बड़े ही गर्व से विदेशी कपड़ों को भस्मीभूत कर दिया। अब बालक रघुवीरसिंह के मानस पटल पर राष्ट्र की परतन्त्रता का चित्र अंकित हो चुका था और उनका नवोत्साहपूर्ण भावुक हृदय कोई क्रान्तिकारी कदम उठाने को उतावला हो उठा। जब सन् 1921 में ही स्वाभी श्रद्धानन्द ने शुद्धि आन्दोलन चलाया तो आपने उसमें सहर्ष सक्रिय योगदान दिया।

आगरा कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा में सफल होने के उपरान्त रघुवीरसिंह जब अलवर आये, उस मय अलवर नरेश सवाई जयसिंह के साथ प्रधानमंत्री राजा दुर्जनसिंह का भारी मतभेद चल रहा था। गोचर भूमि को समाप्त करना, विधवाओं की सहायता बन्द करना, निःसनतान मरने वाले जागीरदारों के स्थान पर उनके भाइयों को उत्तराधिकार न देकर ठिकानों को जब्त करने जैसे अनेक कदम थे जिनका विरोध करते हुए राजा दुर्जनसिंह ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। इस संघर्ष में कुंवर रघुवीरसिंह ने अपने पिता को पूर्ण सहयोग दिया व इसी कारण उन्हें कुछ समय तक अलवर से बाहर भी रहना पड़ा जहाँ उनका सम्पर्क महामना मदनमोहन मालवीय से हुआ। लगभग तीन वर्षों तक मालवीय जी के साथ रहने से जहाँ वे एक ओर धर्म व संस्कृति के कट्टर समर्थक बने वहीं दूसरी ओर भारतीय दर्शन व क्षात्र धर्म के बारे में गहन अध्ययन का भी अवसर मिला। इसी के परिणामस्वरूप वे धर्म नियंत्रित राजतंत्र के उपासक बने व बाद में रामराज्य परिषद के सदस्य व स्वामी करपात्री जी के अनुयायी हुए।

जिस सामाजिक न्याय का आज इतना हल्ला है उसका वास्तविक श्रीगणेश आप अपने ठिकाने जावली के ग्रामों में आजादी से 15 वर्ष पूर्व ही कर चुके थे। सामन्तशाही परम्परा को तोड़कर गाँव के हरिजनों के घर जाकर मलेरिया, प्लेग, हैजा, सर्पदंश आदि रोगों के भयंकर आक्रमणों के दिनों में आपने अपने पास से औषधि वितरण करके दीन-हीन जनता को सम्भाला।

अलवरेन्द्र जयसिंह के निर्वासन के पश्चात् जब भारत सरकार ने अलवर के राजकाज का संचालन अपने हाथ में ले लिया तो आप जैसे सुयोग्य, होनहार, लोकप्रिय नवयुवक की सेवाओं का लाभ उठाने की दृष्टि से आपको सन् 1933 में कलैक्टरी के शिक्षण के लिऐ झेलम भेजा गया। प्रशिक्षण समाप्ति पर आपको अलवर कलैक्टर बनाया गया। उसी समय अलवर राज्यान्तर्गत बहरोड़ में साम्प्रदायिक दंगे हुए और की गोली से कई हिन्दू मारे गये उस समय आपने उस जिले का चार्ज सम्भाला और स्थिति को पूर्ण वश में कर के पीड़ित हिन्दू परिवारों को राज्य की ओर से सहायता दिलवाई। इसके पश्चात् सन् 1937 में आप अलवर राज्य के विकास मंत्री बना दिये गये। थोड़े ही समय पश्चात् लोकप्रिय ठा. सा. सुलतानसिंह पलवा का आसामयिक स्वर्गवास हो जाने पर आपको गृहमंत्री के पद का कार्य भार सौंपा गया।

आपने मंत्रीपद का उत्तरदायित्व को संभालते ही रियासत में सुशिक्षा के प्रसार के लिये ग्रामशालाएँ खोलीं, और छात्रावास स्थापित करने के लिए सरकार की ओर से समुचित योग दिया, जिसके फलस्वरूप आज अन्य भूतपूर्व राज्यों के मुकाबिले अलवर में छात्रावासों का बाहुल्य है। राजपूत छत्रावास, जाट छात्रावास, चारण छात्रावास, ब्राह्मण छात्रावास, अहीर छत्रावास, जैन छत्रावास, अग्रवाल छत्रावास और खण्डेलवाल छत्रावास प्रभूति दर्जनों छात्रावास स्थापित हुए। राजर्षि कॉलेज को डिग्री कॉलेज बनाया।

आपने सन् 1947 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ओटीसी शिविर जावली भवन अलवर में लगवाया जिसमें दो हजार स्वयंसेवकों ने भाग लिया। शिविर के संचालक थे संघ के सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर। अटलबिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवानी इस शिविर में साधारण स्वयंवेक थे। इस शिविर में संघ को नजदीक से देखने का उन्हें अवसर मिला। वर्ण-विहीन हिन्दूवाद उन्हें रास नहीं आया।

इस समय देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की शुरूआत हो चली थी। अलवर राज्य के गृहमंत्री रहते हुए आपने हरियाणा से अलवर की ओर बढ़ने वाली साम्प्रदायिक ताकतों को सफलतापूर्वक रोका। किन्तु महात्मा गाँधी की हत्या के बाद डा. खरे के रियासत में प्रधानमंत्री होने के कारण अलवर नरेश तेजसिंह व डा. खरे को दिल्ली बुलाकर नजरबन्द कर दिया गया व उन पर गाँधीजी की हत्या में सहयोग करने का आरोप लगाया गया। इसी रोज रात्रि में 11 बजे अलवर में गोरखा पलटन आ धमकी। नगर में कफ्यूं लगा दिया गया। गिरफ्तारियों का ताँता बध गया। मंत्रिमण्डल को पदच्युत कर दिया गया व एडमिनिस्ट्रेटर ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। उस समय रियासत के विरुद्ध जो भी आरोप लगाये गये उनका आपने दृढ़तापूर्वक खण्डन किया व प्रशासन की ओर से जो भी कार्यवाही की गई उसकी जिम्मेदारी आपने अपने ऊपर ली। अंततोगत्वा अलवर नरेश को दोष मुक्त किया गया व उनका शासनाधिकार उन्हें पुनः प्राप्त हुआ।

अलवर रियासत के विलीनीकरण के बाद आपको सेवा का कोई अवसर नहीं दिया गया। क्योंकि आप सिविल सेवा के अधिकारी थे व गृहमंत्री के पद पर पदोन्नत किये गये थे। अतः आपने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की जिस पर आपको शेष सेवाकाल का वेतन व सेवानिवृति के बाद पेंशन स्वीकृत की गई।

अखिल भारतीय रामराज्य परिषद् द्वारा संचालित हिन्दू कोड विरोधी सत्याग्रह में आप सक्रिय रहे व आठ दिसम्बर 1949 को गोहत्या विरोधी आंदोलन में दिल्ली के गाँधी ग्राउण्ड में आपने गिरफ्तारी दी। आप अखिल भारतीय रामराज्य परिषद के प्रधानमंत्री व राजस्थान प्रदेश रामराज्य परिषद के सभापति भी रहे। आप 1957 में रामराज्य परिषद के टिकट पर राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी चुने गये।

1955-56 में बड़े जागीरदारों ने पं. गोविन्दवल्लभ पंत के साथ समझौता कर जब भू-स्वामियों की जागीरों का पुर्नग्रहण करवा दिया तब आपने भू-स्वामियों का साथ दिया व भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने जब भू-स्वामियों को समझौता वार्ता के लिए आमंत्रित किया तब प्रधानमंत्री को प्रस्तुत किये जाने वाले मेमोरेण्डम का ड्राफिंटग कुंवर आयुवानसिंह के सहयोग से आपने ही किया था। बाद में भूस्वामियों की समस्याओं के अध्ययन के लिये केन्द्र सरकार ने जिन दो अधिकारियों को नियुक्त किया था, उनके साथ आपने सफल वार्ता कर ‘‘नेहरू अवार्ड’’ प्राप्त किया। उसके बाद भी आप क्षत्रिय युवक संघ व भू-स्वामियों से निरन्तर जुड़े रहें। 1977 ई. में आयुवानसिंह स्मृति संस्थान की स्थापना होने पर आप इसके अध्यक्ष बने। आपके कार्यकाल में कुंवर आयुवानसिंह द्वारा लिखी गई समस्त पुस्तकों का पुनः प्रकाशन हुआ। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही साधारण बीमारी के बाद 25 अप्रैल 1994 को आपका जावली भवन अलवर में स्वर्गवास हो गया।

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