राजपूत नारियों की साहित्य साधना : प्रेम कुंवरी

यह सर्वथा अज्ञात और साहित्यिक क्षेत्र में अचर्चित राजपूत कवयित्री है| महाराजा जयसिंह आमेर की महारानी चन्द्रावती द्वारा अपनी आत्मा के कल्याणार्थ संकलित करवाई गयी पद्य कृति में इनके २८ छंद संकलित है| यह पद्य महाराव मनोहरदास शेखावत के ब्रजभाषा में रचित पद्यों के संकलन के पश्चात् लिखित है| ग्रंथ में लिखा है- प्रेमकुंवर बाई […]

राजपूत नारियों की साहित्य साधना : चंपादे भटियाणी

यह जैसलमेर के रावल मालदेव की पोत्री और रावल हरराज की राजकुमारी थी| रावल हरराज जैसलमेर के शासकों में बड़े साहित्य और कला प्रेमी शासक थे| उनके शासनकाल में राजस्थानी छंद शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ पिंगल सिरोमणि और श्रृंगार रस के काव्य ढोला मारू री चौपाई का सर्जन जैन मुनि कुशललाभ जी ने किया था| […]

मीरांबाई

मीरांबाई

साहित्यिक क्षेत्र में भक्ति भागीरथी मीरांबाई राजपूत समाज ही नहीं भारतीय नारी समाज की माला की सुमेरु-मणि है| मध्यकालीन संत तथा भक्त-कवियों में कबीर, तुलसीदास और सूरदास के समकक्ष साहित्य जगत में उसका स्थान है| वह राजस्थान के राठौड़ कुल की मेड़तिया शाखा के राव दूदा की पोत्री तथा ठाकुर रतन सिंह बजोली की पुत्री […]

रामप्यारी रो रसालो

रामप्यारी रो रसालो : उन दिनों पुरे राजस्थान और राजस्थान के सभी रजवाड़ों को मराठों ने लूटपाट कर तंग कर रखा था| मेवाड़ भी मराठों से तंग तो था ही ऊपर से वहां गृह कलह भी फ़ैल गया| चुण्डावत और शक्तावतों के बीच आपस ने अनबन चल रही थी| और उसी वक्त महाराणा अड़सिंह जी […]

प्रणय और कर्तव्य

रणथंभौर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने पिछले तीन महीनों से घेरा डाल रखा था | उसके बागी सेनानायक महिमाशाही (मुम्मदशाह) को रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान ने शरण दे रखी थी उसी बागी को वापस पाकर दण्डित करने के उद्देश्य से अल्लाउद्दीन ने हम्मीरदेव के किले पर आक्रमण किया और घेर लिया | किले की […]

पद्म श्री डा.रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत : परिचय

पद्म श्री डा.रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत : परिचय

लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत का जन्म तत्कालीन उदयपुर राज्य (मेवाड़) के देवगढ ठिकाने में दिनांक २४ जून १९१६ (वि.स.१९७३ आषाढ़ शुक्ल ९ ) को हुआ था | आपके पिताजी का नाम रावत विजयसिंह जी व दादा का नाम रावत किशनसिंह जी था | आपकी माता रानी नन्दकुंवर मेवाड़ के झाला कुल में देलवाड़ा के राजराणा जालमसिंह जी […]

सुहाग पर भारी पड़ा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

सुहाग पर भारी पड़ा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

रावल अखैसिंह की मृत्युपरांत सन १७६२ में रावल मूलराज जैसलमेर की राजगद्दी पर बैठे | उनके शासन काल में उनका प्रधानमंत्री स्वरूपसिंह जैन जो वैश्य जाति का था बहुत भ्रष्ट व स्वेछाचारी था | उसके षड्यंत्रों से सभी सामंत बहुत दुखी व नाराज थे पर प्रधान स्वरूपसिंह जैन ने रावल मूलराज को अपनी मुट्ठी में […]

पति के प्राणों की रक्षार्थ अपना प्राणोंत्सर्ग करने वाली रानी कलावती

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | […]

रानी जवाहर बाई

रानी जवाहर बाई

मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह का पुत्र विक्रमादित्य विलासी और योग्य शासक था | मेवाड़ राज्य की बागडोर जब उसके हाथ में आई तो उसके कुप्रबंधन के चलते राज्य में अव्यवस्था फ़ैल गई | मेवाड़ की पड़ोसी रियासतें मालवा व गुजरात के पठान शासकों ने इस अराजकता का लाभ उठाकर चितौड़ पर आक्रमण कर दिया | […]

चितौड़ की रानी पद्मिनी

चितौड़ की रानी पद्मिनी

रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बैठा | रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी | उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी | उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को […]