हठीलो राजस्थान-44, जलवायु पर दोहे

हठीलो राजस्थान-44, जलवायु पर दोहे

गरजत बरजत सोच दिल, लुक छिप दाव लड़ंत | इण धरती पर आवतां, इन्दर डरपै अन्त ||२६२|| यहाँ (राजस्थान में) बादल लुकते छिपते ही कभी कभार बरसते है | मानों यहाँ आते हुए इंद्र को भी डर लग रहा है | कांसी लीलो रंग करयो, नाड़ी तातो नीर | बादल बासी रात रा, धरलै कामण […]

हठीलो राजस्थान-43, राजस्थान के जलवायु पर दोहे

हठीलो राजस्थान-43, राजस्थान के जलवायु पर दोहे

हेलो सुण मो बादली, मत कर इतो गुमान | हिम-गिर बरस्यां नह सिरै, बरसो राजस्थान ||२५६|| हे बादली ! हमारी पुकार सुनकर इतना गर्व न करो | हिमालय पर बरसने से काम नहीं चलेगा | राजस्थान में बरसो जहाँ देश के रक्षक पैदा होते है | बुठो भोली बादली, तूठो जग दातार | रूठो मत […]

हठीलो राजस्थान-42

हठीलो राजस्थान-42

राहू डसियां नह छिपै, छिपै न बादल ओट | झीणी रज पड़दै छिपै, दिनकर करमां खोट ||२५०|| राहू के ग्रसने पर भी जो पूरी तरह नहीं छिपता और न ही बादलों की ओट में छिपता है | वही सूर्य झिनी गर्द के आवरण में छिप जाता है | इसे सूर्य के कर्मों का दोष ही […]

हठीलो राजस्थान-21

अमर धरा री रीत आ, अमर धरा अहसान | लीधौ चमचौ दाल रो, सिर दीधो रण-दान ||१२४|| इस वीर भूमि की कृतज्ञता प्रकाशन की यह अमर रीत रही है कि दल के एक चम्मच के बदले में यहाँ के वीरों ने युद्ध में अपना मस्तक कटा दिया || नकली गढ़ दीधो नहीं , बिना घोर […]

हठीलो राजस्थान-20

मुरछित सुभड़ भडक्कियो, सिन्धु कान सुणीह | जाणं उकलता तेल में, पाणी बूंद पडिह ||१०३|| युद्ध में घावों से घायल हुआ व् अचेत योद्धा भी विरोतेजनी सिन्धु राग सुनते ही सहसा भड़क उठा,मानो खौलते तेल में पानी की बूंद पड़ गई हो | बाजां मांगल बाजतां, हेली हलचल काय | कलपै जीवण कायरां, सूरां समर […]

हठीलो राजस्थान-19

हठीलो राजस्थान-19

बिण ढाला बांको लड़े, सुणी ज घर-घर वाह | सिर भेज्यौ धण साथ में, निरखण हाथां नांह ||९७|| युद्ध में वीर बिना ढाल के ही लड़ रहा है | जिसकी घर-घर में प्रशंसा हो रही है | वीर की पत्नी ने युद्ध में अपने पति के हाथ (पराक्रम) देखने के लिए अपना सिर साथ भेज […]

हठीलो राजस्थान- 9

हठीलो राजस्थान- 9

धुण हिड़दै इक सांभली, भणतां खुद भगवान | राग सदा सत वाहिनी, संदेसो सत -ग्यान ||५२|| हे सखी ! भगवान का भजन करते करते मुझे हृदय में स्वयं भगवान की एक धुन सुनाई देती है | उस ध्वनि से मेरे हृदय में,सत्य के कम्पन से उत्पन्न हुई एक अनुपम राग,अनुभव होती है व सत्य-ज्ञान का […]

हठीलो राजस्थान – 8

हठीलो राजस्थान – 8

नैणा नाथ न निरखियौ,परणी खांडै साथ | बलती झाला वा रमी,रगड़े हन्दी रात ||४६|| उस वीरांगना ने अपनी आँखों से पति के कभी दर्शन नहीं किये ,क्योंकि विवाह के अवसर पर उसका पति युद्ध-क्षेत्र में चला गया था ,अत: पति की तलवार के साथ ही उसका विवाह हुआ था | युद्ध क्षेत्र में पति की […]

हठीलो राजस्थान – 7

बौले सुरपत बैण यूँ ,सुरपुर राखण सान |सुरग बसाऊं आज सूं,नान्हों सो रजथान ||४०|| सुर-पति इंद्र कहता है कि स्वर्ग की शान रखने के लिए आज से मैं यहाँ भी एक छोटा सा राजस्थान बसाऊंगा | (ताकि लोग स्वर्ग को भी वीर भूमि समझे ) दो दो मेला भरे,पूजै दो दो ठौड़ |सिर कटियो जिण […]

हठीलो राजस्थान – 6

छीन ठंडी छीन गरम है,तुनक मिजाजी नेस |भोली सूर सभाव री,धरती दोस न लेस ||३४ || राजस्थान की भूमि क्षणभर में ठंडी व क्षण भर में गर्म हो जाती है | इसमें इस धरती का तनिक भी दोष नहीं है,और न ही यह स्थिर स्वभाव की द्योतक है बल्कि यह शूरवीर के भोले स्वभाव का […]

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