हठीलो राजस्थान-42

हठीलो राजस्थान-42

राहू डसियां नह छिपै, छिपै न बादल ओट | झीणी रज पड़दै छिपै, दिनकर करमां खोट ||२५०|| राहू के ग्रसने पर भी जो पूरी तरह नहीं छिपता और न ही बादलों की ओट में छिपता है | वही सूर्य झिनी गर्द के आवरण में छिप जाता है | इसे सूर्य के कर्मों का दोष ही […]

हठीलो राजस्थान-41, राजस्थान की गर्मी पर दोहे

हठीलो राजस्थान-41, राजस्थान की गर्मी पर दोहे

बीजल सी चंचल लुवां, नागण सी खूंखार | पाणी सूँ पतली घणी, पैनी धार कटार ||२४४|| राजस्थान में चलने वाली गर्म हवाएं बिजली सी चंचल है ,नागिन सी भयावह है , पानी से भी पतली है तथा कटार की धार सी तीक्षण है || बालै , चूंवै अंग सूँ, नह दीसै नैणांह | भूतण सी […]

हठीलो राजस्थान-40, वीर रस के डिंगल सौरठे

हठीलो राजस्थान-40, वीर रस के डिंगल सौरठे

तनां तपावै ताव सूं, मनां घणी खूंखार | त्यागण तणी पुकार ना, नागण तणी फुंकार ||२३८|| ग्रीष्म ऋतू प्रचंड ताप से तन को तपा रही है यह स्वभाव से ही खूंखार है जिसके कारण उष्णता अधिक है | अब गर्मी के कारण वस्त्रादि त्यागने की बात सुनाई नहीं पड़ती क्योंकि लू रूपी नागिन फुंकारे भर […]

हठीलो राजस्थान-39, वीर रस के सौरठे

हठीलो राजस्थान-39, वीर रस के सौरठे

गरम धरा, गरमी गजब, गरम पवन परकास | सूरां तणों सभाव ओ, इला तणों उछवास ||२३२|| यहाँ (राजस्थान)की धरती गर्म है, यहाँ गजब ढाने वाली गर्मी पड़ती है | हवाएं भी गर्म चलती है | उपरोक्त गर्मी यहाँ बसने वाले शूरवीरों के उग्र स्वभाव का प्रभाव है अथवा यहाँ की धरती द्वारा छोड़ी गए उच्छवासों […]

हठीलो राजस्थान-21

अमर धरा री रीत आ, अमर धरा अहसान | लीधौ चमचौ दाल रो, सिर दीधो रण-दान ||१२४|| इस वीर भूमि की कृतज्ञता प्रकाशन की यह अमर रीत रही है कि दल के एक चम्मच के बदले में यहाँ के वीरों ने युद्ध में अपना मस्तक कटा दिया || नकली गढ़ दीधो नहीं , बिना घोर […]

हठीलो राजस्थान-20

मुरछित सुभड़ भडक्कियो, सिन्धु कान सुणीह | जाणं उकलता तेल में, पाणी बूंद पडिह ||१०३|| युद्ध में घावों से घायल हुआ व् अचेत योद्धा भी विरोतेजनी सिन्धु राग सुनते ही सहसा भड़क उठा,मानो खौलते तेल में पानी की बूंद पड़ गई हो | बाजां मांगल बाजतां, हेली हलचल काय | कलपै जीवण कायरां, सूरां समर […]

हठीलो राजस्थान-19

हठीलो राजस्थान-19

बिण ढाला बांको लड़े, सुणी ज घर-घर वाह | सिर भेज्यौ धण साथ में, निरखण हाथां नांह ||९७|| युद्ध में वीर बिना ढाल के ही लड़ रहा है | जिसकी घर-घर में प्रशंसा हो रही है | वीर की पत्नी ने युद्ध में अपने पति के हाथ (पराक्रम) देखने के लिए अपना सिर साथ भेज […]

हठीलो राजस्थान- 9

हठीलो राजस्थान- 9

धुण हिड़दै इक सांभली, भणतां खुद भगवान | राग सदा सत वाहिनी, संदेसो सत -ग्यान ||५२|| हे सखी ! भगवान का भजन करते करते मुझे हृदय में स्वयं भगवान की एक धुन सुनाई देती है | उस ध्वनि से मेरे हृदय में,सत्य के कम्पन से उत्पन्न हुई एक अनुपम राग,अनुभव होती है व सत्य-ज्ञान का […]

हठीलो राजस्थान – 8

हठीलो राजस्थान – 8

नैणा नाथ न निरखियौ,परणी खांडै साथ | बलती झाला वा रमी,रगड़े हन्दी रात ||४६|| उस वीरांगना ने अपनी आँखों से पति के कभी दर्शन नहीं किये ,क्योंकि विवाह के अवसर पर उसका पति युद्ध-क्षेत्र में चला गया था ,अत: पति की तलवार के साथ ही उसका विवाह हुआ था | युद्ध क्षेत्र में पति की […]

हठीलो राजस्थान – 7

बौले सुरपत बैण यूँ ,सुरपुर राखण सान |सुरग बसाऊं आज सूं,नान्हों सो रजथान ||४०|| सुर-पति इंद्र कहता है कि स्वर्ग की शान रखने के लिए आज से मैं यहाँ भी एक छोटा सा राजस्थान बसाऊंगा | (ताकि लोग स्वर्ग को भी वीर भूमि समझे ) दो दो मेला भरे,पूजै दो दो ठौड़ |सिर कटियो जिण […]

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