परम्पराएं ही बचा सकती है जातीय सौहार्द

परम्पराएं ही बचा सकती है जातीय सौहार्द

भारतीय संस्कृति में अनेकों जातियों का समावेश है. अनेक जातियां सदियों से इस देश में आपसी सौहार्द से एक साथ रहती आई है. यहाँ जो भी व्यक्ति पैदा होगा वो किसी न किसी जाति में पैदा होगा, उसी में ही पलेगा बढेगा. अत: वह अपने आप इस व्यवस्था का एक अंग बन जाता है. उसकी […]

क्या पारम्परिक परिधान रूढ़ीवाद व पिछड़ेपन की निशानी है ?

पिछले दिनों फेसबुक पर अपने आपको एक पढ़ी-लिखी, आत्म निर्भर, नौकरी करने, अकेले रहने, आजाद, बिंदास व स्वछंद जिंदगी जीने वाली लड़की होने का दावा करने वाली एक लड़की ने लिखा- “पढाई के दिनों उसकी एक मुस्लिम लड़की सहपाठी थी वो पढने लिखने में होशियार, समझदार, आधुनिक विचारों वाली थी पर जब बुर्के की बात […]

व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये

व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये

स्वाभिमान के मामले में समझौता करने वाले लोगों पर अक्सर लोग व्यंग्य कसते सुने जा सकते है कि- “बणिये की मूंछ का क्या ? कब ऊँची हो जाये और कब नीची हो जाय ?” राजस्थान में तो एक कहावत है –गाँव बसायो बाणियो, पार पड़े जद जाणियो” कहावत के जरिये बणिये द्वारा बसाये किसी गांव […]

मिलजुल कर कृषि कार्य करना और ल्हास रूपी दावत का मजा

मिलजुल कर कृषि कार्य करना और ल्हास रूपी दावत का मजा

भारत की समृद्ध भाषाओँ में हर कार्य के लिए अलग-अलग शब्द प्रयुक्त किये गए है। कृषि कार्य में भी किये जाने वाले हर कार्य को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे फसल में खड़ी खरपतवार को निकालने के लिए हमारे यहाँ राजस्थान में “निनाण” करना कहते है, फसल में पानी देने को “पाणत”, बाजरे […]

क्या आपने सुना है “लोटा विवाह परम्परा” के बारे में ?

ज्ञान दर्पण पर मैंने अपने एक लेख में राजस्थान की खांडा विवाह परम्परा के बारे में लिखा था| इतिहास में ऐसे कई विवाह प्रकरण आते है जिन्हें पढकर मालूम होता है कि खांडा विवाह सिर्फ राजपूतों में ही नहीं वरन उस वक्त लगभग सभी जातियों में थी जो लोग सैन्य गतिविधियों से जुड़े थे वे […]

हम किस संस्कृति की और बढ़ रहे है ?

कुँवरानी निशा कँवरसभ्यता और संस्कृति ,संस्कार और व्यवहार ,खान-पान और रहन-सहन,चाल-ढाल ,बोली-भाषा के आकलन से किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का या चरित्र का अनुमान लगाया जाता है |लेकिन उक्त चरित्र या व्यक्तित्त्व निर्माण में सर्वाधिक भूमिका यदि होती है तो वो है सभ्यता, संकृति और संस्कार |वैसे यह सभी शब्द सामान अर्थी तो नहीं […]