रिश्ते : कल्पना जड़ेजा

रिश्तों को न थामों तुम मुट्ठी में रेत की तरह …सरक जायेंगे वो भी वक़्त की तरह ..महसूस करो तुम उनको हर एक साँस की तरह …रिश्ते जब बंधते है तो ख़ुशी देते है …टूटते है तो कांच की तरह.अनगिनित परछाई में बंट जाते है …आसान है बिखरे मोती इकट्टे करना …रिश्ता तो रहता है […]

समय : कल्पना जड़ेजा

मोहब्बत में चिराग जलाने की क्यों बातें करते हो …विज्ञान का जमाना है.. बिजली जला लो न ..प्रदुषण फैलता है ..इतना भी नहीं जानते हो …भावनाओं का स्थान नहीं है यहाँ ..यहाँ दिल में दिल नहीं पत्थर है ..क्यों अपनी भावनाओं को दुखाते हो …गया वो जमाना भी जब सिने में दिल रहा करते थे […]

पर तुम रोना नहीं माँ …………..

पर तुम रोना नहीं माँ …………..

माँ ओ माँ …………श्श्श्श माँ … ओ माँ ..मैं बोल रही हूँ ………सुन पा रही हो ना मुझे …आह सुन लिया तुमने मुझे ……..ओह माँ कितना खुबसूरत है तुम्हारा स्पर्श बिल्कुल तुम जैसा माँ ………मेरी तो अभी आँखे भी नहीं खुली … पर ..तुम्हारी खूबसूरती का अंदाज़ा लगा लिया मैंने तुम्हारी दिल की धडकनों से […]

रामा-रामा कैसा ये गजब हो गया : कुं.अमित सिंह

रामा-रामा कैसा ये गजब हो गया,आजकल का रंग -ढंग कैसा अजब हो गया| जो वस्त्र होता था नीचा वो ऊँचा ,और जो होना था ऊँचा वो नीचा हो गया|…जब तक “जोकी” लिखा न दिखे ,इनको आता चैन नहीं अगर करे कोई टोका-टोकी होता इनको सहन नहींकन्यायें भी त्याग रही पहनावे के सरे संस्कारटॉप हो रहा […]

आधुनिक भारत : कुं. अमित सिंह

“गेट्स-बी” का हेयर जैल, और “जिलेट” का हो शेव जैल “फा” का हो आफ्टर शेव और “रे -बैन” का हो गोगल| “जोकी” का होना चाहिए अंडरवियर और बनियान“नाईक” के हों जूते,और मोज़े भी उसी के श्रीमान“लेविस” की हो जींस, और “पीटर इंग्लॅण्ड” की कमीज“हाय बड्डी-वाज़ -अप”, वाली होनी चाहिए आपमें तमीज| “मेक-डोनाल्ड” वाला पिज्जा,और हो […]

कुछ काम भी तो नहीं करती !

कुछ काम भी तो नहीं करती  !

कुछ जरुरी काम हैं , बहुत जरुरी काम हैं ना जाने कितने समारोह छोड़ दिए थे मैंने यही कह कहकर कि काम है बहनों की शादी हो या भाइयो की सगाई बस एक दिन पहले ही पहुंच पाती हूँ कैसे पहुँचती काम ही जो इतना होता हैं कई बार मन करता हैं , सखियों से […]

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे

मैंने देखा है तुमको मेरे सीने पे उभरे माँस को ताकते हुएतब जब मै घूँघट मे थी, और आँचल लिपटा था दामन पे घूँघट हटा मैने दुपट्टा ले लिया ,ये सोचकर की मेरी तैरती आँखे देखशायद तुम ताकना बंद कर दो . पर गिरी नजरे ऊपर उठे तो देखो न तुम मेरी आँखों मेंतुम तो […]

कविता की करामात

कविता की करामात

कवि अपनी दो पंक्तियों में भी वह सब कह देता है जितना एक गद्यकार अपने पुरे एक गद्य में नहीं कह पाता,राजा महाराजाओं के राज में कवियों को अभिव्यक्ति की पूरी आजादी हुआ करती थी और वे कवि अपने इस अधिकार का बखूबी निडरता से इस्तेमाल भी करते थे|राजस्थान के चारण कवि तो इस मामले […]

इसलिए बस मेरे शहर चली आई

इसलिए बस मेरे शहर चली आई

उस स्टेशन पर तुम बदहवास सी दौड़ रही थीगाड़ी तो आई नहीं थी ,पर तुम घबरा रही थीकुछ इसे ही पलो मे टकराई थी तुम मुझ सेफिर सिलसिला शुरू हुआ मुलाकातों काना तुम थी मेरे शहर की, ना मै था तुम्हारे शहर कामै अपना हक़ किसी और को दे चूका थाऔर तुम पर हक़ किसी […]

औरत होने का अहसास

औरत होने का अहसास

बचपन से देखा है माँ को घर के कामों में पीसता हुआ सुबह से शाम वो बिना किसी मजदूरी के मजदूरों सा काम करती थी फिर भी खुश हमेशा खुश , उनके काम का अंतिम चरण यही सुन के समाप्त होता था ” तुम करती क्या हो दिन भर घर मे ?” माँ ने हिंदी […]