मांडळ रौ बंधौ

मांडळ रौ बंधौ
श्री सौभाग्य सिंह जी शेखावत की कलम से…….

Story of Mandalgarh Dem in Rajasthani Bhasha
राजा लोग आपरा कवरां भंवर नै राजकाज रौ व्यवहार, रीत-क्यावर, रौ सांप्रतेक ग्यान करावण तांई बारी-बारी सूं उणा नै राज रा महकमां रौ काम संूपिया करता। इण सूं उणां नै काम-काज री लकब, मिनख री परख, काम-काज रौ तरीकौ आप रौ ग्यान मिलतौ। देसी रजवाड़ां री टैठ री चाल सूं राजा रै रामसरण हुवां पछै उण रौ मोबी कुंवर इज पाट बैठतौ। बाकी रा छोटा कुंवरां नै राज री पैदास नै आमदनी-रै माफक जीवका-जागीर पटै में मिळती। आ परम्परा गूढ़ विचार वमेक रै पछै चालू हुई ही।

कारण, भायां में बरौबर सारखौ बंटवाड़ौ करियां राज री सकती इज बीखर जावै अर पछै सासन में निबळता आ जावै। महाराणा फतैसिंघ रै तौ अेक इज भोपाळसिंघ कुंवर हा। इणां नै राजरीत सिखावण तांई फतैसिंघ बारीबारी सूं राज रा कारखानां, कमठाणा, अर विभाग रा काम भोळाया। फतैसिंघ जिण साल भोपाळसिंघ नै माल रा महकमा रौ काम दियौ उणी इज साल मेवाड़ में ठाढी, बिरखा पड़ी। मेह री अधिकता सूं मेवाड़ रा घणखरा तळाव, बंधा, नाडा, निवाण पाणी सूं छबा-छब, छिलाछिल भरीजग्या। कितरा ई बंधा टूट ग्या अर आखी मेवाड़ बाढ़ रा पाणी संू रेळपेळ व्हैगी । उण मेह रा जोर सूं मेवाड़ रै मांडळ रौ वडौ तळाव टूटग्यौ। अर उण रा पाणी रा बहाव सूं अजमेर रतळाम लैण री रेलगाडी रा चीला ऊपड़ग्या। रेल री पटड़ियां बह नै न जांणै कठै रेत में दबगी। इण सूं अंग्रेजी राज में हजारां रिपियां रौ खाडौ घलग्यौ। बीं रेल लेण री मालक अंग्रेज सिरकार ही। अंग्रेज सिरकार आपरी खामी कद मानै। राजावां रा झुंथरिया ऊपाड़ण में त्यार बैठी रैवती इज।

अंग्रेज सिरकार बंधा सूं व्हियोड़ा नुकसांण नै मेवाढ़ राज रै माथै मांडण नै महाराणाजी पर दावौ चलाणों तै करियौ। आमां-सामां कामेती, बावसू फिरिया। पछै भारत री अंग्रेज सिरकार मेवाड़ सिरकार संू खामिजायौ लेय रेल री पटड़ी पाछी बणावणै री पटड़ी बैठावण लागा। महाराणाजी उण दावा रा कागद मिसलां जुवराज भोपाळसिंघ कनै मोकळ दिवी। भोपाळसिंघ आपरा सल्लाकारौं सू सल्ला सूत तेवड़ी। अंत पंत में आ तै रैयी कै तळाव फूटणै सूं रेल री पटड़ी अर रेल रा टेसणां रौ खोगाळ हुवौ है। इण वास्तै औ हरजाणौ मेवाड़ रै लागसी। इण रीत हरजाणौ देवण री सल्ला कर नै हरजाणा भरबा रा फार्मा रा काचा मसौदा बणावण लागा। कागद जद त्यार व्हैग्या तद महाराणाजी री मंजूरी ताई पेसी में खिंनाया। महाराणाजी सज्जनगढ़ पधारियोड़ा हा। उठै डाक रौ थेलौ गयौ।

महाराणाजी सगळा वाद बिबाद सूं वाकब तौ हूंता इज। मेवाड़ रा जबाव रा कागदां ने न्हाळ अर हंसबा लागा। दूजै ही पळ उण नै खारिज करता थकां लिख्यौ । मांडळ रौ बांध चार-सौ पांच-सौ साल जूनौ बणियौ थकौ है। अर रेल री पटड़ी बणियां नै तीस चालीस बरसां सूं ज्यादा समै नीं हुवौ। इण वास्तै अंगरेज सिरकार रेल री पटड़िया बिछाई अर चीला न्हाखियां जद पैली देखणौ हौ कै तळाव पुराणौ है कदै फूट नीं जावै। तळाव रा जळ रा बहाव सूं अळगी पटड़ियां बणावणी चायिजती ही। आगली पाछली नीं विचारणै सूं औ नुकसाण हुवौ जिण रौ दायौ अंगरेज सिरकार रौ है। मेवाड़ सिरकार रौ इण नुकसाण सूं क्यूं ई तल्लौ मल्लौ नीं है।

महाराणा फतैसिंघ रौ ओपतौ पडू़तर पाय अंगरेज सिरकार चुप्पी घालण में इज आप रौ भलौ दीठौ। कैड़ौ जावण दियौ जिण नै बिना चाखिया इज ताळवौ चिपग्यौ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.