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राणाजी नै राजकुंवार

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श्री सौभाग्य सिंह जी की कलम से……..
Story fo Maharaja Fateh Singh and Maharaja Bhopal Singh, Udaipur in Rajasthani Bhasha
राजस्थान में मेवाड़ रा सीसोदिया राजवंस कुळ गौरव अर उण रै सुतंतरता री रक्षा रै खातर घणौ ऊंचौ, आदरजोग अर पूजनीक मानीजै। राजस्थान रा बीजा रजवाड़ां में मेवाड़ वाळा सदा अपणी मान मरोड़, कुरब कायदा कांनी ऊभा पगां रैवता आया है। इण सूं उण नै धन, मिनख री हाण अर घणी अबखाई रा कामां सू भटभेड़ियां भी लेवणी पड़ी। मेवाड़ रौ आडंबर तौ आखा बाईसा रजवाड़ां में नामी इज हौ।
पख हाड़ौती माळवौ, ढब देखै ढूंढाड़।
आखर परखै मुरधरा, आडंबर मेवाड़।।

मेवाड़ रा धणी महाराणा फतैसिंघ मेवाड़ री म्रजाद रा छेला रुखाळा हा। कारण ब्रजादा रा बंधणां में चाल्या घणी अड़ेच, अबलाई सहणी पड़ै। असरधा वाळां सूं परम्परावां नी निभाइजै। महाराणां फतैसिंघ अर उणा रै इकोलडा महाराजकुंवार भोपाळसिंघ रै आपस में अमेळ व्है गयौ। चाडीगारा नारदिया तौ मौका री बाट जोवता ही रैवै। आपस री अडकसी में नान्हा मिनखां रा फौ लागै। वडा लोगां रा कामेती, पासवान आधी पड़ती सांच नै तोड़मोड़ धर कळह कराय आपरी दूकान चलाय लै। ‘घर रा तौ पराया अर पराया घर रा’ इण इज भांत री कुबधां सूं हुवै है। चालबाज लोग पाव नै पंसेरी अर राई नैं पहाड़ बणा देवै। वडा लोगों में भी कूड़ा-कूड़ री छाण बीण करण री आदत कम है। कानां रा तौ काचा वडा मिनख सदा सूं ही बाजै। पण, महाराणा फतैसिंघ में अै ओगुण नीं हा। फेर भी एक बडा राजा तौ हा इज। चुगली चांटीगारा लोग भी बड़ा फरेबी हुवै। मगरमछ रा आंसू तौ उणां रै कनै हर पुळ, हर घड़ी त्यार ही रैवै है। महाराणा फतैसिंघ भी चुगली री सूळ ने मेट नीं पाया। मेवाड़ रौ आडंबर उणा रै आडौ फिर गयौ। इणा सूं बाप बेटा एक जाजम माथै विराज नै चुगलां रै मुंहडा पर थाप नीं दे पाया। उणंारै बीच दिन दूणौं रात चोगणौ आंतरौ पड़तौ रैयौ। पण फतैसिंघ घणी देखियोड़ा हा। जमाना री रग-रग नै जाणता-पिछाणता। महाराणा कनै जिको कोई जुवराज री खोटी-खरी चुगली झूठ काढ लेवता। महाराणा नै जिका लोग जुवराज री चुगली चाडी करता वे लोग जुवराज री मूंछा रा बाळ भी वण्या रैवता। अेक साथै दौनां घोड़ों पर चढ़िया रैवता। चित भी म्हॉरी पुट भी म्हॉरी। उठी नै महाराणा री जुवराज कानां में भळी-मूंडी घालता रैवता। पण फतैसिंघ जुवराज री सिकायत रा ओळिमा आप रा कलमदान में मेलावता। किणी बीजा रै हाथ नीं पड़बा देवता। महाराणा फतैसिंघ रै छैला दिनां में अेक दिन महाराणा सा जुवराज भोपाळसिंघ नै बुलवायौ अर आप रा कलमदान री कूची सूंपता थका कैयौ-म्हॉरौ सरीर बीत जावै जद पछै। इण कलमदान नै हाथौंहाथ संभाळज्यौ। किंणी दूजा नै मतां दीज्यौ।
थोड़ा सा दीहाड़ों पछै इज फतैसिंघ देवलोक हुयग्या। जुवराज समझयौ कोई बेस कीमती कागद, रुक्का, सीख भोळावण या आखरी इंछ्या लिखी होसी। पछै भोपालसिंघ गादी बिराज पछै उण कलमदान नै खोलियौ। उण में पांच सौ रै अड़ैगडै़ कागद रा ओळिया निकळिया जिक में भोपालसिंघ रा घणा मरजीदानां रा आखरां सूं फतैसिंघ नै भोपाळसिंघ री सिकायतां करियौड़ी मिळी।

महाराणा भोपाळसिंघ अेक-अेक कागद नै पढ़ता गया, फाड़ता गया। उणा री आंखिया में गंगा-जभना उमड़ आई। आंसुवां रा चौसरिया बहबा लागा। पास खवासा रा मुंहडा पीतळीजग्या। महारांणा अेक निसासो नांख नै कैयौ-राजावां री म्रजादा नै आडंबर भी कैड़ा है जिकौ पिता पूत मिळ बैठ नै बातचीत भी नीं कर सकै। हेताळु रै रूप में चाडीगारा संपळेटिया कांई-कई नीं कर न्हाखै। दूजै इज पळ उण नकली हेताळवां रै प्रति उणरै चेरै पर ग्लाणी रा भाव उतर आया। महाराणा फतैसिंघ रै साथ बरती भावनावां नै धड़ी धारणावां रै खातर अपार दरद, असीम पीड़ अर पछतावौ माथौ धुणाबी लागी।

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