गुलामों की आवाज की कभी कीमत नहीं होती

कुछ दिन पहले राजस्थान के वरिष्ठ व चर्चित पत्रकार श्रीपाल शक्तावत ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा – “कांग्रेस के प्रति मुसलमानों की निष्ठा और भारतीय जनता पार्टी को लेकर राजपूतों के मन में गुलामी की हद तक के समर्पण को लेकर इन दिनों कई जगह सुनने को मिला है।” और इसके बाद शक्तावत जी ने इस सम्बन्ध को लेकर एक चटपटा किस्सा भी लिखा- एक प्रशिक्षु तांत्रिक (अपने गुरु से)- मेरे बस में नहीं आत्माओं को जगाना और उन्हें वश में करके अपने काम निकलवाना।
गुरु- क्या हुआ ? इतने जल्दी थक गये अपने मिशन से ? प्रशिक्षु तांत्रिक – थकना ही था कितने दिन से आपके कहे मुताबिक आत्माओं को जगाने की मुहीम में लगा हूँ, लेकिन बात बन नहीं रही। गुरु (मुस्कराते हुए) – चल आज से एक मन्त्र याद करले। प्रशिक्षु तांत्रिक – क्या गुरुदेव ?

गुरु – “कब्रिस्तान में जाकर कांग्रेस के नारे लगाना और राजपूतों के श्मशान में जाकर भाजपा के नारे लगाना, आत्माएं ही आत्माएं आयेंगी, जिसे चाहे काम लेना, जिसे चाहे छोड़ देना।” प्रशिक्षु तांत्रिक- जी गुरुदेव ! लेकिन ?

गुरु – लेकिन वेकिन कुछ नहीं। इनसे ज्यादा राजनैतिक दलों का मानसिक गुलाम कोई नहीं मिलेगा। सो नारे लगाते ही निकल आयेंगी हजारों आत्माएं, जो पूरी जिन्दगी इनके नारे लगाते लगाते ही मर गई।

श्रीपाल जी ने सही लिखा मुसलमानों पर तो दूसरा धर्म होने के नाते टिप्पणी करना मैं किसी भी लिहाज से ठीक नहीं समझता पर हाँ चूँकि खुद राजपूत जाति से हूँ इसलिए अपनी जाति की चर्चा करने को अपने आपको स्वतंत्र मानता हूँ। आज देशभर का नहीं तो कम से कम राजस्थान का राजपूत भारतीय जनता पार्टी से इतना जुड़ गया कि उसे भाजपा के बाद कुछ भी दिखाई नहीं देता, भले भाजपा उसके स्वाभिमान से खेले या उसकी कभी कोई आवाज तक ना सुने। चुनावों में टिकट वितरण के समय जरुर भाजपा कुछ राजपूत उम्मीदवार उतारती है ताकि राजपूत समझते रहे कि अन्य दलों से ज्यादा हमें भाजपा ने टिकट दी है और इसी एक बिंदु को लेकर भाजपा के प्रति राजस्थान के राजपूतों का समर्पण मानसिक गुलामी तक पहुँच गया है। यही नहीं राजपूतों के अग्रणी सामाजिक संगठन भी भाजपा के मानसिक गुलाम बन अपने समाज को इसी धारा में बहाते रहने को कटिबद्द है। इस मानसिक गुलामी की हद तक समर्पण करने वाले राजपूतों को ध्यान रखना चाहिये कि गुलामों की आवाज की कभी किसी जमाने में कोई कीमत व कद्र नहीं रही। तो आज क्या रहेगी ?

और इस बात को राजस्थान भाजपा सरकार ने चरितार्थ भी कर दिखाया। राजस्थान में तीन विश्व विद्यालय प्रस्तावित थे- अलवर में मत्स्य विश्व विद्यालय, भरतपुर में ब्रज विश्व विद्यालय और शेखावाटी में शेखावाटी विश्व विद्यालयद्य भाजपा सरकार ने आते ही इन तीनों विश्व विद्यालयों के नाम जो स्थानीय क्षेत्रों के नाम पर थे को स्थानीय महापुरुषों के नाम पर करते हुए अलवर में राजा भरतरी विश्व विद्यालय, भरतपुर में राजा सूरजमल विश्व विद्यालय और शेखावाटी में प्. दीनदयाल विश्व विद्यालय रख दिया जबकि शेखावाटी के राजपूत लंबे समय से शेखावाटी विश्व विद्यालय का नामकरण शेखावाटी के संस्थापक राव शेखाजी के नाम पर करने की मांग करते आ रहे थे।

लेकिन भाजपा सरकार को पता था कि राजपूत भाजपा के मानसिक गुलाम है अतः इनकी मांग मानी जाये या ना मानी जाये कोई फर्क नहीं पड़ता। राजपूत पारम्परिक तौर पर कांग्रेस विरोधी है अतः भाजपा को वोट देना उनकी मजबूरी है फिर अब राजपूत भाजपा के मानसिक गुलाम तक बन चुके तो ऐसी परिस्थिति में वे कहीं जाने वाले नहीं सो उनकी मांग ना सुनकर शेखावाटी विश्व विद्यालय का नामकरण दीनदयाल उपाध्याय पर कर दिया गया। जबकि दीनदयाल उपाध्याय का शेखावाटी में कोई योगदान नहीं। पर भाजपा ने अपना संघी एजेंडा शेखावाटी का जनता के माथे थोप दिया। और तो और भाजपा के राजपूत विधायक और सामाजिक संगठन चाहते हुए भी सिर्फ इसलिए आवाज नहीं उठा पाये कि इससे संघ नाराज हो जायेगा और उनकी स्थिति पार्टी में कमजोर हो जायेगी। लानत ऐसे विधायकों व सामाजिक संगठनों पर जो राजनीति तो समाज के नाम पर करते है पर समाज के स्वाभिमान व हित से स्व हित बड़ा समझते है।

इस घटना से साफ जाहिर है कि भाजपा ने राजपूतों को अपना मानसिक गुलाम समझ उनकी आवाज की कोई कीमत नहीं समझी। इसके ठीक विपरीत भाजपा को पता है कि जाट जातिय आधार पर वोट देते है अतः उनके वोट लेने के लिए भाजपा ने पहले उन्हें बिना मांगे राज्य में आरक्षण दिया और ब्रज विश्व विद्यालय का नाम बिना किसी मांग के जाट राजा सूरजमल के नाम पर किया ताकि जाटों को खुश कर वोट लिए जा सके। इस तुष्टिकरण की हद तो तब देखने को मिली जब कांग्रेस के अभी दिवंगत हुए नेता परसराम मदेरणा के नाम से वसुंधरा राजे कालेज खोलने की घोषणा से नहीं चुकी। अपने विपक्षी दल के मदेरणा के नाम कालेज खोलने की घोषणा के पीछे भी राजे की जाट तुष्टिकरण की मंशा साफ देखी जा सकती है।

हालाँकि हमें राजा सूरजमल व परसराम मदेरणा के नाम पर विश्व विद्यालय बनाने की कोई शिकायत नहीं है, बल्कि हम इस घोषणा का तहेदिल से स्वागत करते है पर इनकी तुलना यह समझाने के लिए काफी है कि गुलामों की आवाज की कोई कीमत नहीं होती। शायद अब भी राजपूत समुदाय इस बात को समझे, राजपूत ही क्यों सभी समुदायों को यह बात समझनी चाहिये और किसी भी राजनैतिक दल के प्रति मानसिक गुलामी की हद तक समर्पण करने से बचना चाहिये।

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