कठै गया बे गाँव आपणा ?

कठै गया बे गाँव आपणा कठै गयी बे रीत ।
कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||

दुःख दर्द की टेम घडी में काम आपस मै आता।
मिनख सूं मिनख जुड्या रहता, जियां जनम जनम नाता ।
तीज -त्योंहार पर गाया जाता ,कठै गया बे गीत ||
कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||(1)

गुवाड़- आंगन बैठ्या करता, सुख-दुःख की बतियाता।
बैठ एक थाली में सगळा ,बाँट-चुंट कर खाता ।
महफ़िल में मनवारां करता , कठै गया बे मीत ||
कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||(2)

कम पीसो हो सुख ज्यादा हो, उण जीवन रा सार मै।
छल -कपट,धोखाधड़ी, कोनी होती व्यवहार मै।
परदेश में पाती लिखता , कठै गयी बा प्रीत ||
कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||(3)

लेखक : गजेन्द्रसिंह शेखावत

कठै = कहाँ, बे = वे, मिनख = मनुष्य, टेम घडी = समय, गुवाड़ = चौक, सगळा = सब

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