जब कानून पर भारी पड़ी ईमानदारी

जब कानून पर भारी पड़ी ईमानदारी

जयपुर की स्टेट चीफ कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश शीतलाप्रसाद वाजपेई का न्यायालय उस दिन खचाखच भरा था, दर्शकों की भारी भीड़ झुंझुनू के नाजिम इकराम हुसैन द्वारा बिना गवाहों के, सिर्फ पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर की रपट के आधार पर एक चोर को सुनाई सजा के खिलाफ हो रही सुनवाई को ध्यानपूर्वक सुनने में व्यस्त थी| चोर के वकील ने नाजिम इकराम हुसैन द्वारा सुनाई सजा के खिलाफ कानून की अनदेखी पर खासा प्रकाश डालते हुए चोर को बरी किये जाने की गुहार की| लेकिन प्रधान न्यायाधीश ने वकील की एक भी दलील ना मानते हुए नाजिम इकराम हुसैन के फैसले को ज्यों का त्यों रखते हुए चोर की सजा को बरक़रार रखा| तब बचाव पक्ष के वकील ने फिर दलील दी कि – “एक पुलिस सब इंस्पेक्टर के बयान को प्रमाण मानकर सजा देना उचित नहीं है| फौजदारी कानून में ऐसा कोई प्रवधान नहीं|”

लेकिन वकील की यह दलील ठुकराते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा – “थानेदार  राम सिंह भाटी जैसे सत्यनिष्ठ सब इंस्पेक्टर का बयान और कथन कानून के प्रावधानों से कहीं ज्यादा वजनदार है|”

यह संत थानेदार के नाम से मशहूर थानेदार रामसिंह की सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, सदाचार, नैतिकता और कुशल व्यवहार की ख्याति का ही कमाल था कि उस समय के सभी न्यायाधीश सिर्फ उनके बयान या उनकी जाँच रिपोर्ट के आधार पर बिना ज्यादा सुनवाई किये फैसला दे दिया करते थे, क्योंकि उक्त निराला थानेदार इतना ईमानदार व सत्यनिष्ठ था कि ना किसी के लिए झूंठ बोलना ना मुफ्त का पानी का तक पीना| उसका व्यवहार इतना मृदु व प्यार भरा होता था कि चोर बिना पीटे चोरी का माल बरामद करवा दिया करते थे और आगे से चोरी छोड़ दिया करते थे तो अपराधी अपराध छोड़ भक्ति भजन में लग जाया करते थे| शरीर से दुबला-पतला वह निराला थानेदार खतरनाक डाकुओं को जिनसे पुलिस थर्राया करती थी को बिना खून खराबे के पकड़ लाया करता था|

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