Rupgarh Fort रुपगढ़ किले का इतिहास

Rupgarh Fort रुपगढ़ किले का इतिहास  : अरावली के उबड़ खाबड़ मगरों और ऊँची नीची पहाड़ियों की चोटियों में से एक चोटी पर आकाश को कुदेरता, गुमसुम हुआ, यह गौरवशाली दुर्ग ऐसे खड़ा है, जैसे किसी विस्मृत सिद्धि की पुन: प्राप्ति के लिए कोई अनुष्ठान कर रहा हो | कभी इस छोटे से दुर्ग के भी सुनहले दिन थे, चांदनी रातें थी, वीरता, सुख, वैभव व सम्पत्ति की अठखेलियों की मंगल बहारें थी, मंगल संगीत व ठाकुर मंगलसिंह की समाजसेवा व उत्सवों की ऋतुएँ थी | पर आज वो विदा ले चुकी है और यह छोटा सा दुर्ग और इसकी तलहटी के बने महल अपने उद्दार की राह देख रहे हैं |

श्रीविहीन अवस्था में भी यह दुर्ग बाहें पसार कर आपका स्वागत कर रहा है| दुर्दिन की निराशा में भी यह अतिथि सत्कार की परंपरा को नहीं भुला है क्योंकि इसे पता है पर्यटन के इस युग में कोई आएगा और इसका उद्दार कर यहाँ पर्यटन केंद्र स्थापित करेगा, तब इसके वैभव की पुन: स्थापना हो पाएगी | इस दुर्ग का निर्माण खूड़ के ठाकुर रूपसिंह ने कराया था, अरावली पर्वतमाला की एक ऊँची चोटी पर इस दुर्ग को बना कर अपने नाम से रुपगढ़ गांव बसाया था| पहाड़ी की तलहटी में खुबसूरत जनाना व मर्दाने महल बनवाये थे और साथ ही बनवाया था अपने आराध्य रघुनाथजी का मंदिर | रुपगढ़ का यह छोटा सा दुर्ग एक तरह से खूड़ के ठाकुर की युद्धकालीन राजधानी था |

Rupgarh Fort के निर्माता ठाकुर रूपसिंह ने सन 1731 में सीकर के राव शिवसिंह व झुंझुनू के ठाकुर शार्दूलसिंह के नेतृत्व में शेखावाटी के मुस्लिम राज्य फतेहपुर की नींव उखाड़ फैंकने के लिए युद्ध किया था, उस युद्ध में रूपसिंह के पुत्र अजीतसिंह ने अपने प्राणों की आहुति दी थी| अजीतसिंह के वीरगति प्राप्त करने पर उनकी कुंवरानी ने चिता में प्रवेश कर सहगमन किया था, रुपगढ़ के कुए पर उन दोनों की स्मृति में बनी छतरियां आज भी उनकी याद दिलाती है|

रूपसिंह के बाद Rupgarh Fort के स्वामी ठाकुर बखतसिंह हुए जिन्होंने हिन्दुओं के आराध्य देव बाबा खाटूश्यामजी के मंदिर की रक्षार्थ मुग़ल सेनापति मुर्तजा अली भडेच से युद्ध करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था| यह युद्ध सन 1780 में लड़ा गया था | बखतसिंह के बाद देश की आजादी तक इस दुर्ग पर छ: ठाकुरों ने राज किया| इसके अंतिम स्वामी ठाकुर मंगलसिंह मेयो कालेज से शिक्षित थे जो अपनी उदारता, दानवीरता व समाजसेवा के इतिहास में विख्यात है | ठाकुर मंगलसिंह स्वतंत्रताप्रेमी, समाज सुधारक, राष्ट्रभक्त, गौ-सेवक, शिक्षा-प्रेमी, गांधी जी के खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के समर्थक व उच्च विचारों के तपस्वी पुरुष थे| कृषि व पशुपालन उनका पसंदीदा विषय था| जागीरदारी उन्मूलन के बाद उन्होंने अपनी कृषिभूमि,गायें, घोड़े आदि दान कर दिए थे|

योगिराज अरविन्द के शिष्य ठाकुर मंगलसिंह का देशभक्त जमनालाल बजाज, पंडित हीरालाल शास्त्री, महाराव उम्मेदसिंह कोटा, महाराजा उम्मेदसिंह जोधपुर, स्वामी करपात्री, सदाशिव माधवराव गोलवलकर, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद आदि से अत्यंत ही आत्मीय स्नेह का सम्बन्ध था |

राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जीण माता, खाटूश्यामजी व रैवासा पीठ के नजदीक पहाड़ी के ऊपर व तलहटी में बने इन महलों में होटल व टूरिज्म की अपार संभावनाएं है| महलों के साथ ही रघुनाथ जी का मंदिर बना है | वर्तमान में तलहटी में बने महल के बाहरी प्रांगन में एक निजी विद्यालय संचालित है और Rupgarh Fort व महलों का स्वामित्व पूर्व विधायक नंदकिशोर महरिया के पास है उम्मीद है आने वाले समय में महरिया परिवार इस विरासत का जीर्णोद्धार कर इसका उद्दार करेंगे |

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