जब रणमल के बेटे ने बाघिन को मारा

जब रणमल के बेटे ने बाघिन को मारा

चितौड़ के गद्दार चाचा और मेरा द्वारा महाराणा मोकल की हत्या का समाचार जैसे ही मंडोर में रणमल को मिला, रणमल अपने भांजे की हत्या से बहुत क्रोधित हुये और उसने महाराणा मोकल को जलांजलि देकर अपने सिर से पगड़ी उतार फैंटा बाँध लिया, और प्रण किया कि जब तक वह मोकल की हत्या का बदला मेवाड़ के इन गद्दारों से नहीं ले लेंगे, तब तक सिर पर पगड़ी नहीं बांधेंगे| यह प्रतिज्ञा कर इसे पूरा करने के लिए रणमल तुरंत चितौड़ के लिए चल पड़े और वहां पहुँच कर महाराणा कुम्भा को नजराना किया|

महाराणा मोकल के हत्यारे चाचा और मेरा व महपा पंवार अपने सहयोगियों व परिवारों सहित पाईकोटड़ा के पहाड़ों में छुपे हुये थे| रणमल ने अपने चुने हुए 500 वीर साथ लिए और इन गद्दारों को सजा देने के लिए पहाड़ों की ओर चले| यह पहाड़ी क्षेत्र भीलों का क्षेत्र था और पूर्व में रणमल के हाथों एक भील की हत्या हो गई थी, जिसकी वजह से भील रणमत के विरोधी थे और उन्होंने इन विद्रोहियों की सहायता की| भीलों की सहायता पाकर चाचा और मेरा रणमल को गच्चा देते रहे, रणमल के 6 माह तक पहाड़ी क्षेत्र में भटकने के बावजूद इन विद्रोहियों का कोई सुराग हाथ ना लगा| आखिर रणमल एक दिन उसी भील के घर गया, जिसकी उसके हाथों हत्या हुई थी और उसकी विधवा से अपने अपराध की क्षमा मांगी| उसे अपनी बहिन कहा और भीलों को अपना भाई कहा, तब भीलों ने रणमल के हाथों हुआ अपराध भूलकर उसे मातृभूमि मेवाड़ के पक्ष में सहयोग देने का वादा किया|

अपने वादे के अनुसार भील, रणमल व उसके 500 हथियारबंद सवारों को लेकर चाचा-मेरा आदि विद्रोहियों के छुपने की जगह चलने को तैयार हो गये, पर उन्होंने रास्ते में एक स्थान पर एक नाहरी (बाघिन) ब्याई होने के कारण अभियान एक माह स्थगित करने का आग्रह किया| भील जानते थे कि प्रसवकाल के बाद नाहरी अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर काफी हिंसक रहती है अत: इस वक्त उस क्षेत्र से जाना खतरे से खाली नहीं होगा| यह सुन रणमल भील से बोले- “हमें किसी नाहरी का भय नहीं, आगे बढ़ और हमें रास्ता पता|” भील आगे चलते हुए उस जगह रुक गया जहाँ से कुछ नाहरी ने बच्चे दिए थे और बोला- “आगे नाहरी है|” तब रणमल ने अपने बेटे अरडकमल को कहा-“बेटा ! जाकर सिंहण को ललकार|” तभी नाहरी लपककर आई, अरडकमल उससे भीड़ गया और थोड़ी ही देर में अपनी कटार से उसका पेट चीर कर उसे वहीं ढेर कर दिया|

इस तरह अपने पिता के अभियान के रास्ते में रूकावट बनी बाघिन को मार कर अरडकमल राठौड़ ने अपने बल, पराक्रम, और वीरता प्रदर्शित की|

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