लोकतंत्र में रामराज्य दिवा-स्वप्न

लोकतंत्र में रामराज्य दिवा-स्वप्न

आज देश का हर नागरिक चाहता है कि देश में रामराज्य स्थापित हो। देश की सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी हर चुनाव में जनता को रामराज्य स्थापित करने का स्वप्न दिखाती है। हर पार्टी रामराज्य स्थापित करने का वादा करती है। महात्मा गांधी ने तो आजादी के आन्दोलन में देश की जनता से रामराज्य स्थापित करने के नाम पर ही समर्थन जुटाया था। महात्मा गांधी की हर सभा व हर काम राम के नाम से शुरू होता था। गांधी का भजन रघुपति राघव राजा राम आज भी जन जन की जुबान पर है। जनता द्वारा रामराज्य की कामना और नेताओं द्वारा रामराज्य स्थापित करने की बात करने से साफ है कि शासन पद्धतियों में रामराज्य सर्वश्रेष्ठ थी और आज भी है। एक ऐसी राजतंत्र शासन पद्धति जिसमें जनता को सभी लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हो, जनता का राजा से सीधा संवाद हो, जातिगत व्यवस्था होने के बावजूद कोई जातिगत भेदभाव नहीं हो, सभी के मूलभूत अधिकारों व सुरक्षा के लिए राजा व्यक्तिगत रूप से प्रतिबद्ध हो, राज्य के संसाधनों पर सभी नागरिकों का समान अधिकार हो, श्रेष्ठ होगी ही। रामराज्य में ये सब गुण थे, तभी तो आज लोग रामराज्य का स्वप्न देखते है।

लेकिन क्या वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में रामराज्य की स्थापना संभव है? शायद नहीं ! क्योंकि रामराज्य के लिए सबसे पहले देश में एक क्षत्रिय राजा का होना अनिवार्य है, जो वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं है। आज देश में संसदीय शासन प्रणाली है जिसमें प्रधानमंत्री सर्वेसर्वा होता है। प्रधानमंत्री से ऊपर राष्ट्रपति होता है पर असली शासनाधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है, राष्ट्रपति के पास नहीं। अतः सीमित अधिकारों वाले राष्ट्राध्यक्ष को राजा की संज्ञा नहीं दी जा सकती। शासन के अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है। जनता पांच वर्ष के लिए शासन करने हेतु प्रधानमंत्री को सत्ता सौंपती है। लेकिन वह भी प्रधान मंत्री ही होता है, राजा नहीं। जब जिस देश में राजा ही नहीं, उसमें रामराज्य कैसे स्थापित हो सकता है? जबकि हमारे वेदों में भी लिखा है कि आदर्श शासन व्यवस्था एक क्षत्रिय राजा ही दे सकता है। योगीराज अरविन्द ने कहा है कि जिस देश में क्षत्रिय राजा नहीं, ब्राह्मणों को उस देश का त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि क्षत्रियविहीन राजा के बिना सुशासन स्थापित नहीं हो सकता। विश्व में राजनीति के अबतक सबसे प्रसिद्ध आचार्य चाणक्य ने भी लिखा है कि जिस देश का राजा क्षत्रिय नहीं हो, उस राजा के खिलाफ क्षत्रियों को बगावत कर राजा को बंदी बना लेना चाहिए। इससे साफ जाहिर है कि एक क्षत्रिय राजा ही सुशासन दे सकता है। प्रजा का भला क्षत्रिय राजा के राज में ही संभव है, क्योंकि राम क्षत्रियों के पूर्वज व आदर्श है, सो कोई भी क्षत्रिय राजा कैसा भी हो अपने पूर्वज व आदर्श राम का कुछ तो अनुसरण करेगा ही, और उसके द्वारा थोड़ा सा ही अनुसरण करना सीधा जनहित में होगा।

लेकिन आज देश में उपस्थिति सभी राजनैतिक दल व उनके नेता रामराज्य देने की कल्पना तो करते है, स्वप्न भी दिखाते है, लेकिन राम का अनुसरण करने के बजाय रावण का अनुसरण ज्यादा करते है। हाँ ! राम के नाम पर या राम नाम की खिलाफत कर कई राजनीतिक दल जनता की भावनाओं का दोहन कर वोट प्राप्त करने के लिए राजनीति करते है। देश में ऐसा समय भी आया है, जब राम का नाम लेकर नेता सत्ता की सीढियों पर चढ़ गए, लेकिन राम को भूल गए। मेरा मतलब राममंदिर निर्माण से नहीं, राम का अनुसरण करने से है। महात्मा गांधी ने राम का नाम लेकर लोगों को खुद से जोड़ा। आजादी के बाद लोकतांत्रिक रामराज्य का सपना दिखाया। लेकिन आजादी के बाद उन्हीं की पार्टी ने राम व उनकी शासन व्यवस्था का अनुसरण कर जनता को सुशासन देने की बात करना तो दूर, राम नाम लेने वालों को ही साम्प्रदायिक घोषित कर दिया। अदालत में लिखित हलफनामा देकर राम के अस्तित्व को ही नकार दिया। ऐसे दलों से रामराज्य स्थापना की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आज ज्यादातर राजनैतिक दलों में तथाकथित बुद्धिजीवी धर्म के ठेकेदारों का वर्चस्व है, जिन्होंने सदियों से राम के नाम पर अपना जीवनयापन किया, अपनी धर्म की दूकान चलाई। आज वे रावण को महिमामंडित करने में लगे है। जिस उद्दण्ड परसुराम को राम ने सबक सीखा कर उसकी उद्दंडता पर अंकुश लगाया और जनता के मन में बैठे उसके आतंक का अंत किया, जो अपनी माँ की हत्या का अपराधी है, उसे भगवान के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है। आचार्य द्रोण जैसे श्रेष्ठ योद्धा को छोड़ अश्व्थामा जैसे अनैतिक व्यक्ति का महिमामंडन किया जा रहा है। आज ऐसे लोगों की जयन्तियां मनाई जा रही है। ऐसे माहौल में रामराज्य की कल्पना भी कैसे की जा सकती है?

बाल्मीकि द्वारा लिखी रामायण के बाद धर्म के ठेकेदारों ने अपने हिसाब से कई तरह से रामायण लिखी। बाल्मीकि का लिखा गायब किया गया और नई कहानियां जोड़ी गई। रावण जो आतंक का पर्याय था, को महिमामंडित करने के लिए उसे उस वक्त का सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी व ज्ञानवान पंडित बताया गया। इनकी लेखनी का कमाल देखिये एक तरफ रावण को व्याभिचारी, आतंकी, राक्षक, लम्पट, कपटी, क्रूर, स्वेच्छाचारी, अनैतिक लिखा गया वहीं दूसरी और उसे शास्त्रों का ज्ञाता, ज्ञानवान, धर्म का मर्म समझने वाला लिखकर महिमामंडित करने की कोशिश की गई। आप ही सोचिये कोई व्यक्ति धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञानी हो, वो ऐसा क्रूर आतंकी हो सकता है? जिसकी क्रूरता के चलते आज भी उसके पुरे खानदान को राक्षक कुल समझा जाता हो और उसे बुराई का प्रतीक। जबकि उसके कुल में विभीषण जैसा ज्ञानी और धर्मज्ञ उसका भाई था, जाहिर करता है कि रावण का खानदान राक्षक नहीं, मानव ही था, लेकिन उसकी क्रूरता ने उसे राक्षक का दर्जा दिया। ऐसे ऐसे अनैतिक लोगों का आज महिमामंडन हो रहा है, उनकी जयन्तियां मनाई जा रही है, जो भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को उनका ही अनुसरण करने की प्रेरणा देगी। जब लम्पट, क्रूर, आतंकी, उद्दण्ड, माँ के हत्यारे आने पीढ़ियों के आदर्श होंगे व उनका अनुसरण होगा, उस हाल में रामराज्य की कल्पना कैसे की जा सकती है?

आज राजनैतिक दल एक तरफ धर्मयुक्त रामराज्य की स्थापना का स्वप्न दिखाते है, दूसरी और धर्म को अफीम का नशा बताकर, या धार्मिक व्यक्ति को साम्प्रदायिक बताकर, या धर्म व जाति के आधार पर जनता को बांटकर उनके वोटों से सत्ता प्राप्त करना चाहते है, तब रामराज्य तो कतई स्थापित नहीं हो सकता। रावण राज्य जरुर स्थापित हो जायेगा। देश की शासन व्यवस्था का वर्तमान माहौल देखने पर रावण राज्य की झलक अवश्य दिखाई पड़ रही है। सरेआम बच्चियों के साथ बलात्कार, आतंकी घटनाएं, चोरियां, डाके, भ्रष्टाचार, व्याभिचार, अनैतिकता, गरीब का शोषण, जातिय उत्पीड़न, धार्मिक दंगे, बेकाबू महंगाई, नेताओं द्वारा देश की संपदा लूट कर विदेशों में ले जाना, चरित्रहीन व भ्रष्ट नेताओं का नेतृत्व रावण राज्य की, क्या झलक नहीं दिखाते?

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One Response to "लोकतंत्र में रामराज्य दिवा-स्वप्न"

  1. Kuldip Krishan   October 25, 2014 at 10:27 am

    अधिकारवाद के युग मे रामराज्य दिवास्वप्न समान है

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