आखिर क्यों भारी है फैशन की दुनियां पर “राजपूती पारंपरिक पौशाकें” ?

आखिर  क्यों भारी है फैशन की दुनियां पर “राजपूती पारंपरिक पौशाकें” ?
ज्ञान दर्पण.कॉम पर पिछले लेख में पढ़ा कि- कैसे फैशन की दुनियां में नित नए डिजाईनस के परिधान आते है उसके बावजूद राजपूत महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली विशेष पारंपरिक “राजपूती पौशाक” का कोई मुकाबला नहीं है | आखिर क्यों भारी है फैशन की दुनियां में “राजपूती पारंपरिक पौशाकें” ?
व्यक्ति के पहनावे से उसकी संस्कृति व व्यक्तित्व की पहचान होती है| परम्परागत परिधानों का जीवन में अपना एक अलग ही महत्व है| राजस्थान में राजपूत महिलाएं अपना एक अलग ही तरह का विशेष परिधान पहनती है जिसे राजस्थान के लोग राजपूती परिधान के नाम से जानते है, यह परिधान राजपूत संस्कृति का परिचायक व प्रतीक भी है| इस परिधान का राजस्थान में अपना ही अलग महत्वपूर्ण स्थान है, यह दिखने में जितना सुन्दर है उतना ही पूर्ण है, आज के फैशन में साड़ी पहनने के कई स्टाईल है| 5 मीटर के कपड़े से बनने वाली साड़ी (ब्लाउज अलग से) से भी शरीर के पुरे भाग ठीक से नहीं ढकते जबकि राजस्थानी राजपूती सूट जो 4 मीटर कपडे में सिला जाता है (ओढ़नी अलग से)| जिसे पहनने के बाद शरीर का कोई अंग नहीं दिखता और यही वजह है कि राजस्थान में सभी महिलाएं इसे पहनना पसंद करती है|

अगर बात की जाए कि राजपूत महिलाओं के अलावा अन्य जातियों की महिलायें और अन्य राज्यों की महिलायें ये पोशाके पहनना क्यों पसंद करती है ? तो वह है इस परिधान का “रोयल लुक”| औरत की सुन्दरता उसके वस्त्रों से ही झलकती है| और हर औरत चाहती है कि वह सुन्दर, आकर्षक दिखे| औरत की यह मुराद ये राजपूती परिधान इसे अपनाने वाली महिला की पूरी करता है| राजस्थानी भाषा में इस परिधान को बेस, सूट, घाबा, पौशाक, बरी (शादी का जोड़ा) इत्यादि नामों में पुकारा जाता है|

इस परिधान की एक ख़ास बात और है कि सभी सूट एक जैसे ही सिले जाते है| सिर्फ कपड़ा व कपड़े पर छपे डिजाइन व रंग अलग-अलग होते है, इसे सिलने का स्टाइल सिर्फ एक ही है, कहने का मतलब है जैसे सलवार सूट में अलग-अलग डिजाइन सिलने के तरीके है कई किस्म के डिजाइन है, वो इस परिधान में नही है | इसके बावजूद राजपूती पौशाकें फैशन पर भारी है|

कैसे बनती है ये पूरी पौशाक :

इस परिधान के चार भाग है –

1.कुर्ती- एक मीटर कपड़े में सिली जाने वाली यह कुर्ती आम कुर्तियों की तरह ही होती है घुटनों से काफी ऊपर किसी टॉप की तरह लेकिन यह हाफ स्लीव होती है इसमें बाजू नहीं लगाईं जाती| कुर्ती के गले,कंधे व निचले हिस्से की सिलाई के हर जोड़ पर गुणा (पाइपिंग) लगाया जाता है|

2.कांचली -इसे कुर्ती के भीतर पहना जाता है जो आधा मीटर कपड़े में सिली जाती है यह कोहनी तक बाजू वाली होती है ,इस पर भी सिलाई के हर जोड़ पर गुणा (पाइपिंग) लगाया जाता है|
3.घागरा(लहंगा)- ढाई मीटर कपड़े में बनने वाले लहंगे को कलियों या बिना कलियों का भी सिला जा सकता है| इस घेरदार लहंगे के निचले हिस्से में मंगजी लगायी जाती है व साथ ही नीचे के घेरे की सिलाई के जोड़ पर गुणा (पाइपिंग) लगायी जाती है|
4.लूगड़ी(ओढ़नी)- ढाई मीटर की लूगड़ी जो गोटे से सुन्दर सजाई जाती है|

अन्य राज्यों व विदेशियों को भी आकर्षित करती है ये शाही पौशाक-
राजस्थान की महिलाओं को ही क्यों ये परिधान अन्य प्रान्तों व विदेशी महिलाओं व लोगों को भी खूब आकर्षित करते है| इसके उदाहरण कई बार सामने आते है जैसे-
१-मेरी माता जी आजतक यही पारम्परिक परिधान पहनती आ रही है| पहली बार जब हम फरीदाबाद शहर में आये तब जब भी माता जी घर से बाहर निकलते बाजार में, पार्क में बहुत सी दुसरे प्रान्तों की औरतें उनका परिधान देखकर उनके पास आती और इस परिधान की प्रशंसा करते हुए अपने लिए भी मंगवाकर देने या बनवाने का अनुरोध करती| कई महिलाओं ने तो माताजी से ये परिधान लेकर ही माना|
२- मेरी चाचीजी इटली में रहती है और वहां भी यही परिधान पहनती है, एक बार मैंने उनसे पुछ लिया कि- इटली में तो इस परिधान को देखकर लोग आपको बहुत घूरते होंगे| तब उन्होंने मुझे बताया कि जो वहां के लोग राजस्थान के लोगों का बहुत आदर करते है और खासकर जयपुर का नाम सुनकर तो बहुत खुश होते है| जो इस राजस्थानी परिधान को पहचानते है वह इसे पहनने वाली की बहुत इज्जत करते है जिन्हें नहीं पता वे पुछ लेते है और जयपुर राजस्थान का नाम आते ही उनका हमारे प्रति व्यवहार में आदर और बढ़ जाता है|

:- राजुल शेखावत

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8 Responses to "आखिर क्यों भारी है फैशन की दुनियां पर “राजपूती पारंपरिक पौशाकें” ?"

  1. डॉ॰ मोनिका शर्मा   October 10, 2012 at 1:40 am

    पारंपरिक एवं गरिमामयी इन पौशाकों के प्रति आकर्षण सदैव बना रहेगा …..

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  2. विष्णु बैरागी   October 10, 2012 at 1:57 am

    अच्‍छी,व्‍यावहारिक जानकारी।

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  3. प्रवीण पाण्डेय   October 10, 2012 at 2:28 am

    सच कहा आपने, भारतीय परिधानों की तो बात ही निराली है।

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  4. Gajendra singh shekhawat   October 10, 2012 at 2:06 pm

    इस पोशाक को सिलने में दक्षता भी स्वयं इन्ही को ही होती है।और शादी के वक्त लड़की के गुणों के आंकलन में "बेस की सिलाई आना"भी एक महत्त्व पूर्ण गुण माना जाता है।

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  5. अल्पना वर्मा   October 10, 2012 at 6:42 pm

    बेशक!
    राजस्थानी पोशाक का अपना ही गज़ब का आकर्षण है और यहाँ के आभूषणों का भी.
    यहाँ भी ग्लोबल विलेज में भारत के पवेलियन में सबसे अधिक राजस्थानी सामान की ही मांग रहती है.

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  6. samraat   October 13, 2012 at 11:39 am

    lekh ki parstuti bhi rajputi posag ki sundarta jesi zalak rhi hai……rajputi posag aajkal kahi or lok bhi pehnte hai pr vo chahe kitna bhi kosis kre khami nazar aa hi jati hai…..pr bde afsos ke sath kehna pdta hai ki rajput mahilaye bhi aaj modernta ke name pr sari or faishon wale dress pehnte hai …..pr jo sundrta is posag pehnane se aayegi vo sayad hi kisi or se….

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  7. Beendani Rajasthani Wear   February 14, 2017 at 12:39 pm

    रॉयल राजपूती पोशाके हमारी विशेष पहचान है, इसे पहने देख किसी को भी लगता है की ये महिला किसी खास रॉयल जाती विशेष से है. सम्पूर्ण, शालीन और परंपरागत परिधान. हमें गर्व है की हम बहुत रिज़नेबल कीमत पर अपनी इ-कॉमर्स वेबसाइट http://www.beendani.in पर से बेच कर अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपनी तुच्छ योगदान कर रहे है.

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  8. Beendani Rajasthani Wear   February 14, 2017 at 12:39 pm

    रॉयल राजपूती पोशाके हमारी विशेष पहचान है, इसे पहने देख किसी को भी लगता है की ये महिला किसी खास रॉयल जाती विशेष से है. सम्पूर्ण, शालीन और परंपरागत परिधान. हमें गर्व है की हम बहुत रिज़नेबल कीमत पर अपनी इ-कॉमर्स वेबसाइट http://www.beendani.in पर से बेच कर अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपनी तुच्छ योगदान कर रहे है.

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