राजपूत नारियों की साहित्य साधना : प्रेम कुंवरी

यह सर्वथा अज्ञात और साहित्यिक क्षेत्र में अचर्चित राजपूत कवयित्री है| महाराजा जयसिंह आमेर की महारानी चन्द्रावती द्वारा अपनी आत्मा के कल्याणार्थ संकलित करवाई गयी पद्य कृति में इनके २८ छंद संकलित है| यह पद्य महाराव मनोहरदास शेखावत के ब्रजभाषा में रचित पद्यों के संकलन के पश्चात् लिखित है| ग्रंथ में लिखा है- प्रेमकुंवर बाई कृत पद्य| यद्धपि यह तो अन्य साहित्यिक स्त्रोतों से स्पष्ट नहीं होता कि प्रेमकुंवरी का जन्म, माता-पिता, विवाह आदि किस कुल में किस संवत में हुआ, परन्तु महाराव मनोहरदास की रचना की समाप्ति के बाद हि इनकी रचना लिपिबद्ध होने और बाई संबोधन से यह प्रत्यय होता है कि वह शेखावत घराने की राजकुमारी रही होगी| इस दिशा में अन्वेषण की आवश्यकता है|

प्रेमकुमारी द्वारा रचित कविता बृज भाषा में है| इन कवित्तों में रचयित्री ने अपने जीवन का सर्वस्व ईश्वर को वर्णित किया है| कर्मों के शुभाशुभ का कारण भी प्रभु कृपा हि माना है| लेखिका ने अपना सर्व-समर्पण उसी परम-पिता की चरण सेवा में अर्पित कर दास्य भाव प्रकट किया है| कवित्तों के अध्ययन से प्रतीत होता है कि वह भी विवाहोपरांत शीघ्र हि विधवा हो गयी थी| वह एक सुपठित नारी थी और भाषा तथा छंदों पर उसका अच्छा अधिकार था| उसके कवित्त भक्ति और करुणा से ओतप्रोत है| कुछ बानगी इस प्रकार पाठ्य है…

जन कीनौ तुंही जिय दीनौ तुंही, अब लाज गहौ प्रतिपालन की|
जब बूंद हुती ग्रभ मैं जलकी, तब हूँ सब चिंत करी जन की||
इह जानत आहिं न भूलि हौ, साहि सकुच है आपुन की|
गुन चाहि सवै तूं अनंद बढ़े, अति “प्रेम” गरीब नवाजन की||
अपने कर माही कछु करतार करौ, मुकरौ सब हि तुम ही|
जन कौ कछु दोसन दीजै प्रभु, यह घाट कुघाट रच्यो तुम हीं||
सब कर्म कुकर्म औ हानिरलाभ, मिटे नहीं क्यों है लिख्यो तुम हीं|
तुम जानति आहि कहूं कहा साहिब, पैमकुंवारी के हो तुम ही||
हौ जु अग्यान कू बूझी गवारि न सेवा न जानत साहिब जू|
कौन कौं कहूं मन की जड़ता, सत छाडि असत हि धावत जू||
प्रभुता अपनी तन देखि प्रभु, अब पैमकुंवारी निवाजहू जू|
सुधरे तुमतै सब या सठ की, जाके कोऊ नहीं तुम छाडिव जू||

प्रेमकुमारी के शब्द-प्रयोगों से यह भी प्रतिभासित होता है कि उसे फ़ारसी भाषा का भी ज्ञान ठ तथा वह अध्ययनशील महिला थी| ईश्वर के प्रति उसकी एकनिष्ठ श्रद्धा और प्रगाढ़ आस्था निम्नांकित कवित में पूर्णतया अभिव्यंजित है-

काहू कौ भरोसौ धन धाम मात नात को है,
काहू कै भरोसौ भरतार जू के प्यार को|
काहू कै भरोसौ गढ़ कोट बंधु त्रियन कौ,
काहू कै भरोसौ आछे सेवक के काज को||
काहू कै सहाइक कै संगीनी को राज कौ,
काहू कै भरोसौ ग्यान बुद्धि तंत्र मंत्रिन कौ|
मोहि न भरोसौ काहू दुजै कौ जग मांह,
येक ही भरोसौ मेरे सरन सहाई कौ||
उपर्युक्त वर्णन के अंतर्साक्ष्य से स्पष्ट है कि वह राजकुलोत्पन्न नारी थी और दुर्ग, किलों के स्वामियों के बड़े घराने में जन्मी थी|

लेखक : श्री सौभाग्यसिंह शेखावत,भगतपुरा

राजपूत नारियों की साहित्य साधना की अगली कड़ी में किशनगढ़ के राठौड़ नरेश राजसिंह की कवयित्री राणी ब्रजकुंवरी का परिचय प्रकाशित किया जायेगा|

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6 Responses to "राजपूत नारियों की साहित्य साधना : प्रेम कुंवरी"

  1. बड़े ही रतन हुये हैं राजपूताने में.

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  2. कई रतन दिये हैं राजपूताने ने.

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  3. प्रवीण पाण्डेय   October 28, 2012 at 3:23 am

    बहुत ही अनमोल संग्रह प्रस्तुत कर रहे हैं आप, यह श्रंखला चलती रहे..

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  4. GYanesh Kumar   October 29, 2012 at 5:03 am

    शेखावत जी अपना तो इतिहास भरा पड़ा है रत्नो से एक नही हजारों रत्न भरे पड़े हैं जरुरत है खोजने की खोजनेवालों की वैसे भी यह काम अगर सरकारी स्तर पर हो तो उससे आज के समय आशा नही है।
    आपका प्रयास सराहनीय है इसी प्रकार अनमोल रत्नों की पहिचान हो पाए

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  5. dheerendra bhadauriya   October 29, 2012 at 3:04 pm

    बहुत खूब, संग्रहणीय प्रस्तुति के लिये रतन जी बधाई,,,,,,

    RECENT POST LINK…: खता,,,

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  6. RealEstateDealStreet.com   October 29, 2012 at 10:55 pm

    Is baar Bhakti Ganga Gyan ke Darpan par. Excellent!

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