राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर साहित्यकार श्री सौभाग्य सिंह जी की चिंता

राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर साहित्यकार श्री सौभाग्य सिंह जी की चिंता
श्री सौभाग्य सिंह शेखावत राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार है| राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं सूचि में शामिल नहीं करने व केंद्र सरकार द्वारा मान्यता नहीं देने के पर चिंता व्यक्त करते हुए शेखावत अपनी 1991 में छपी पुस्तक “राजस्थानी साहित्य संस्कृति और इतिहास” में राजस्थानी भाषा की महत्ता व भाषा को मान्यता नहीं मिलने के कुछ दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए लिखा-

राजस्थान प्राचीन समै सूं इज भारतीय संस्कृति, भारतीय इतिहास अर साहित रै रख-रखाव नै पोखण रै तांई आपरै लोही रौ पाणी अर हाड मांस रौ खात दियौ है। राजस्थान री धरती रा कण-कण में भारतीय संस्कृति री सौरम, इतिहास री गाथां-बातां भरी पड़ी है। राजस्थानी भासा रा साहित में कांई गद्य अर कांई पद्य दोनों में भारतीयता री मरोड़, भारतीय मिनख रौ मिजाज, जीवण रै ऊंचै मान-मोल रौ अखूट खजानौ भरियौ पड़ियौ है । इण प्रांत रौ जेहड़ौ ठसकौ रैयौ है उणी प्रकार अठा रा मिनखां रौ ठरकौ, जोमराड़ पणौ, मांठ-मरोड़ अर मान म्रजादा रैयी है|

राजस्थान री धरती पर, अठा रा भाखर अर रोही रूखां रै आसरै हजारां लाखां सैकड़ां तांई भारत री संस्कृति फळती पसरती रैयी। राजस्थान रौ इतिहास राजस्थान रै भाखरां री चोटियां अर टीबा टीळां माथै बणिया कोट किलां, खेड़ां खेतों में सुपी गडी अणगिणत देवळियां अर लाख-पसाव करोड़-पसाव री दान दुगाणी री लूठी परम्परावां में आज भी बोलै, साख भरै| कौल बोल, सरणागत पाळण, जूझार, भौमियां, मान-म्रजादा, कंवल-पूजा, पत-प्रतिस्ठा, अनड़पण आद री अलेखा गौरव गुमान री बातां राजस्थानी साहित री आपरी न्यारी निरवाळी गिणत राखै। भारत रै प्रांता री भासावां में राजस्थानी री आपणी ठावी ठौड़ रैयी है| राजस्थानी राजस्थान री राज-काज, कार-ब्यौहार अर जन री भासा रैयी है। इण री साख जूना सिलालेखां, तांबापत्रां अर रुक्का परवानां अर लोक-कण्ठा में गाजता-गूंजता सुरां में मिळे है।

राजस्थान रा सासको राजस्थानी संस्क्रति, साहित अर इतिहास री प्राण रै मोल रुखाळ करी। भारत में अंगरेजां रौ पगफेरौ हुवां पछै अठा री सासन प्रणाली अर पढ़ाई-लिखाई में तरतर पलटाव आतौ गयौ I उत्तर प्रदेस रा लोगां रै राजस्थान में पैसा रा,प्रवेस रै पछै राजस्थानी भासा री ठौड़ हिन्दी रौ राजकाज अर भणाई गुणाई में प्रभाव, फैलाव बधियौ अर राजस्थानी गांव-गुवाड़ां रा लोगां री भासा बण नै रैयगी । जे राजकाज में राजस्थानी रौ प्रयोग नीं रैयौ तौ आवण वाळा समै में राजस्थानी री आप री मोटी गिणत भी कम व्है जासी| राजस्थानी भासा री गिणत रै साथै इज राजस्थानी साहित, संस्क्रति अर इतिहास नै भी ठाढौ धक्कौ झेलणौ पड़सी अर राजस्थानी भासा रै सागै इज संस्क्रति भी पाताळां बैठ जासी।

2 Responses to "राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर साहित्यकार श्री सौभाग्य सिंह जी की चिंता"

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (26-12-2015) को "मीर जाफ़र की तलवार" (चर्चा अंक-2202) पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Kavita Rawat   December 26, 2015 at 2:33 pm

    काश सौभाग्य सिंह जी की पुकार सरकार तक पहुँच पाती!!

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