यशोधर्मन

यशोधर्मन

यशधर्मन जयसिंह मिले थे।
हूणों के भी हृदय हिले थे ।

Raja Yashodharman यशोधर्मन अवन्ती (मालवा) के शासक थे। यह मालव वंश (परमार) क्षत्रिय थे। यशोधर्मन मध्य भारत के एक शक्तिशाली राजा थे। इनका राज्य काल वि.सं. ५५७ से ६०७ (ई.स. ५०० से ५५०) के लगभग था। गुप्त वंश की शक्ति क्षीण हो जाने पर मध्यभारत के इतिहास में यशोधर्मन उल्का की भाँति चमक उठे। इनके सैनिक अभियान और विजय का वर्णन दशपुर (मन्दसोर) अभिलेख में लिखा है। इन्होंने उन प्रदेशों को भी जीता जिन पर गुप्त सम्राटों का आधिपत्य नहीं था। इन्होंने हृणों को भी युद्ध में पराजित किया। इनका राज्य लोहित्य (ब्रह्मपुत्र) से लेकर महेन्द्र पर्वत तक और गंगा से स्पृष्ट हिमालय से लेकर पश्चिम में समुद्र तट तक था|

यशोधर्मन ने वि.सं. ५८५ (ई.स. ५२८) के लगभग हूण राज़ा तोरमाण को परास्त किया था। हूण मूलतः आर्य थे और बाद में वे मध्य एशिया में चले गए थे। वैदिक धर्मानुसार न चलने के कारण ये मलेच्छ कहलाए। हुणों ने सम्पूर्ण मध्य एशिया और भारत की राजनीति को प्रभावित किया। हूण बड़े शूरवीर थे। गुप्त शासकों की शक्ति क्षीण होने पर लगभग पाँचवी ईस्वी शदी में टिड्डी-दल की तरह हूण पश्चिमोत्तर और मध्य भारत में छा गए थे। इनका नेता तोरमूण था जिसकी राजधानी साकल (सियालकोट) थी। उसने मध्य भारत को जीत लिया था। भारत आने पर तोरमाण और उसके आश्रितों ने शैव धर्म अपना लिया था। तोरमाण के पश्चात् उसका पुत्र मिहिरकुल हुणों का राजा बना। तोरमाण और मिहिर कुल अत्यन्त क्रूर शासक थे तथा निर्दोष लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे। उनकी भयानक आवाज जहाँ भी सुनाई देती थी, लोग कॉप जाते थे। उन्होंने अपनी राक्षसी क्रूरता से लोगों का वध किया, आग लगाई तथा सर्वनाश किया। वह बौद्धों का घोर शत्रु था। उसने अधिक संख्या में बौद्धों को मरवा डाला और बौद्धविहारों को जलवा दिया था। मिहिर्कुल इतना पराक्रमी था कि उसने भगवान शिव के अतिरिक्त और किसी के समक्ष सिर नहीं नवाया।

यशोधर्मन ने वि.सं. ५८५ (ई.स. ५२८) के लगभग मिहिरकुल को परास्त किया। मिहिरकुल ने पराजित होकर कश्मीर में शरण ली। इस तरह यशोधर्मन ने हूणों के अत्याचार से देश को मुक्त कराया। मिहिरकुल को राजा यशोधर्मन ने मुलतान के आस-पास पराजित किया था।
लेखक : छाजूसिंह, बड़नगर

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