रेल विभाग लगा है राणा सांगा स्मारक हटाने की जुगत में

भारत की स्वतंत्रता के लिए देश के लगभग राजाओं को एक झंडे के नीचे लाकर बाबर से लड़ने वाले राणा सांगा का स्मारक रूपी चबूतरा जहाँ राणा का अंतिम संस्कार किया गया था अब तक उपेक्षित था| स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा के चबूतरे का रख रखाव करने में आजतक ना सरकार ने कोई कदम उठाया ना राणा के उतराधिकारियों ने अलवर जिले के बसवा गांव में रेल पटरियों के पास बने इस स्मारक की मरम्मत कराने पर ध्यान दिया|

हाँ ! यदि स्मारक के पास राणा को भवन बनाकर छोड़ जाते तो उनके वर्तमान उतराधिकारी उसकी साज सज्जा पर अवश्य ध्यान देते क्योंकि भवन हेरिटेज होटल बना कमाई का जरिया बनता, लेकिन स्मारक से कोई कमाई नहीं की जा सकती सो उतराधिकारी भी क्यों ध्यान दे?

खैर…..अब तक भले स्मारक उपेक्षित था, उसका रख रखाव नहीं हो पाया लेकिन कम से कम उस जगह स्थापित तो था लेकिन अफ़सोस अब यह स्मारक रूपी चबूतरा भी वहां से हटने की कगार है| जिस देश की सरकार किसी अनजान इंसान की कब्र तक को हटाने की हिम्मत नहीं कर पाती उसी सरकार का रेलवे विभाग रेल मार्ग चौड़ा करने के लिए राणा के चबूतरे को 15 मीटर दूर खिसकाना चाहते है| जबकि रेल मार्ग चौड़ाई दूसरी और की भूमि अधिग्रहित करके भी चौड़ी की जा सकती है, लेकिन रेल के अधिकारी दूसरी और के किसान की भूमि बचाकर राणा को विस्थापित करना चाहते है|

देखते है राष्ट्रवाद के नाम का दम भरने वाली सरकार राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा सांगा का स्मारक बचाती है या कथित विकासवाद को राष्ट्रवाद के नाम से जोड़कर राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा का स्मारक हटाती है?

सरकार के साथ उन उन संगठनों की भूमिका भी देखते है जो जाति के नाम पर गाल फुलाते है तो कई संगठन राष्ट्रवाद व हिन्दुत्त्व के नाम पर गाल फुलाते है या राणा सांगा के स्मारक को बचाने हेतु आगे आते है ????

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