राह पकड़ तू चल अनवरत

राह पकड़ तू चल अनवरत झंझावातों से डरना मत।
पूर्वजों की यश कीर्ति ,गौरव को ऐ राही ऐसे खोना मत ।।

प्रभु स्वयं अवतरित हुए जिस कुल में,उसके दाग लगाना मत ।
जौहर की आग में कूद पड़ी जो उनका दूध लजाना मत ।।

स्वाभिमानी,गौरव,अमर वीर ,प्रताप का वंशज भूल मत ।
अपना सर्वस्व सुख त्याग कर प्रजा हित ताउम्र रहा रत ।।

समय बदल गया -राज बदल गया, किन्तु कर्त्तव्य न बदला भूल मत ।
तलवार छोड़ कलम पकड़ व्यर्थ समय को टाल मत ।।

इस युग की मृग तृष्णा के इन झुलोनो में झूल मत ।
क्षत्रिय वंश की आदर्श परिपाटी का, ना बना अब मखोल मत ।।

सधे कदम बिना रुके, बढ़ने से बने कारवां भूल मत |
अनावश्यक व्यर्थ प्रपंचों को देना तू अब तूल मत।।

लेखक : गजेन्द्र सिंह ककराना

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