पन्ना धाय

पन्ना धाय

गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने जनवरी १५३५ में चित्तोड़ पहुंचकर दुर्ग को घेर लिया इससे पहले हमले की ख़बर सुनकर चित्तोड़ की राजमाता कर्मवती (Karmvati)ने अपने सभी राजपूत सामंतों को संदेश भिजवा दिया कि- यह तुम्हारी मातृभूमि है इसे मै तुम्हे सौपती हूँ चाहो तो इसे रखो या दुश्मन को सौप दो | इस संदेश से पुरे मेवाड़ में सनसनी फ़ैल गई और सभी राजपूत सामंत मेवाड़ की रक्षार्थ चित्तोड़ दुर्ग में जमा हो गए | रावत बाघ सिंह ने किले की रक्षात्मक मोर्चेबंदी करते हुए स्वयम प्रथम द्वार पर पाडल पोल पर युद्ध के लिए तैनात हुए | मार्च १५३५ में बहादुरशाह के पुर्तगाली तोपचियों ने अंधाधुन गोले दाग कर किले की दीवारों को काफी नुकसान पहुचाया तथा किले निचे सुरंग बना उसमे विस्फोट कर किले की दीवारे उड़ा दी राजपूत सैनिक अपने शोर्यपूर्ण युद्ध के बावजूद तोपखाने के आगे टिक नही पाए और ऐसी स्थिति में जौहर और शाका का निर्णय लिया गया | राजमाता कर्मवती के नेतृत्व में १३००० वीरांगनाओं ने विजय स्तम्भ के सामने लकड़ी के अभाव बारूद के ढेर पर बैठ कर जौहर व्रत का अनुष्ठान किया | जौहर व्रत संपन्न होने के बाद उसकी प्रज्वलित लपटों की छाया में राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर शाका किया किले के द्वार खोल वे शत्रु सेना पर टूट पड़े इस युद्ध में इतना भयंकर रक्तपात हुआ की रक्त नाला बरसाती नाले की भांति बहने लगा | योद्धाओं की लाशों को पाटकर बहादुर शाह किले में पहुँचा और भयंकर मारकाट और लूटपाट मचाई | चित्तोड़ विजय के बाद बहादुर शाह हुमायूँ से लड़ने रवाना हुआ और मंदसोर के पास मुग़ल सेना से हुए युद्ध में हार गया जिसकी ख़बर मिलते ही ७००० राजपूत सैनिकों ने आक्रमण कर पुनः चित्तोड़ दुर्ग पर कब्जा कर विक्रमादित्य को पुनः गद्दी पर बैठा दिया |

लेकिन चितौड़ लौटने पर विक्रमादित्य ने देखा कि नगर नष्ट हो चूका है और इस विनाशकारी युद्ध के बाद उतना ही विनाशकारी झगड़ा राजपरिवार के बचे सदस्यों के बीच चल रहा है | चितौड़ का असली उत्तराधिकारी , विक्रमादित्य का अनुज उदय सिंह , मात्र छ: वर्ष का था | एक दासी पुत्र बनबीर ने रीजेंट के अधिकार हथिया लिए थे और उसकी नियत और लक्ष्य चितौड़ की राजगद्दी हासिल करना था | उसने विक्रमादित्य की हत्या कर , लक्ष्य के एक मात्र अवरोध चितौड़ के वंशानुगत उत्तराधिकारी बालक उदय की और ध्यान दिया | बालक उदय की धात्री माँ पन्ना (Panna Dhay) ने, उसकी माँ राजमाता कर्मावती के जौहर (सामूहिक आत्म बलिदान ) द्वारा स्वर्गारोहण पर पालन -पोषण का दायित्व संभाला था तथा स्वामी भक्तिव अनुकरणीय लगन से उसकी सुरक्षा की | उसका आवास चितौड़ स्थित कुम्भा महल में एक और ऊपर के भाग में था| पन्ना धाय को जब जानना खाने से निकलती चीखें सुनाई दी तो उसने अनुमान लगा लिया कि रक्त पिपासु बनबीर राजकुमार बालक उदय सिंह की तलाश कर रहा है| उसने तुरंत शिशु उदय सिंह को टोकरी में सुला पत्तियों से ढक कर एक सेवक को उसे सुरक्षित निकालने का दायित्व सोंपा | फिर खाट पर उदय सिंह की जगह अपने पुत्र को लिटा दिया | सत्ता के मद में चूर क्रुद्ध बनबीर ने वहां पहुँचते ही तलवार घोंप कर पन्ना के बालक को उदय समझ मार डाला | नन्ही लाश को बिलखती पन्ना के शिशु राजा और स्वामिभक्त सेवक के पास पहुँचने से पहले ही , चिता पर जला दिया गया |

पन्ना कई सप्ताह देश में शरण के लिए भटकती रही पर दुष्ट बनबीर के खतरे के चलते कई राजकुलों ने जिन्हें पन्ना को आश्रय देना चाहिए था नहीं दिया | वह देशभर में राजद्रोहियों से बचती , कतराती तथा स्वामिभक्त प्रतीत होने वाले प्रजाजनों के सामने अपने को जाहिर करती भटकती रही | आखिर उसे शरण मिली कुम्भलगढ़ में , जहाँ यह जाने बिना कि उसकी भवितव्यता क्या है | उदय सिंह Udai Singh किलेदार का भांजा बनकर बड़ा हुआ | तेरह वर्ष का होते होते मेवाड़ी उमरावों ने उसे अपना राजा स्वीकार कर लिया और उनका राज्याभिषेक कर दिया इस तरह १५४२ में उदय सिंह मेवाड के वैधानिक महाराणा बन गए |
स्वामिभक्ति तथा त्वरित प्रत्युत्पन्नमति , दोनों के लिए श्रधेया नि:स्वार्थी पन्ना धाय जिसने अपने स्वामी की प्राण रक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान दे दिया को उसी दिन से सिसोदिया कुल वीरांगना वीरांगना के रूप में सम्मान मिल रहा है | इतिहास में पन्ना धाय का नाम स्वामिभक्ति के शिरमोरों में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है | अपने स्वामी की प्राण रक्षा के लिए इस तरह का बलिदान इतिहास में पढने को और कहीं नहीं मिलता |

नमन है भारतभूमि की ऐसी स्वामिभक्त वीरांगना को |

Panna Dhay of Chittore, Maharana Udai Singh, Banveer, Mewad, Chiitore Fort, Maharana Vikrmadiya

32 Responses to "पन्ना धाय"

  1. ललित शर्मा   April 2, 2010 at 7:52 pm

    पन्ना धाय इतिहास में अमर हो गयी।
    आज भी हम इनसे प्रेरणा लेते हैं।

    Reply
  2. इस ऐतिहासिक लेख के लिए धन्यवाद!
    शेखावत जी आप हमारे ब्लॉगों पर आये ना आयें!
    आपकी इच्छा मगर हम तो बिना बुलाए अतिथि हैं!
    अक्सर आ ही जाते हैं!
    चर्चा में भी तो आपकी पोस्ट लगा ही देते हैं!

    Reply
  3. Ratan Singh Shekhawat   April 3, 2010 at 1:45 am

    ऐसा नहीं है शास्त्री जी कि मैं आपके ब्लोग्स पर आना नहीं चाहता दरअसल मैं दिन भर फिल्ड में होता हूँ इसलिए नेट पर सुबह शाम ही थोडा बैठ पाता हूँ पोस्ट लिखने के लिए भी समय बहुत मुश्किल से निकल पाता है इसलिए दुसरे ब्लॉग बहुत कम पढ़ पाता हूँ |

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  4. ताऊ रामपुरिया   April 3, 2010 at 4:25 am

    बहुत ही ओजस्वी और प्रेरक प्रसंग.

    रामराम

    Reply
  5. नरेश सिह राठौङ   April 3, 2010 at 5:40 am

    ताऊ और समीर जी मजे हुए आदमी है अपने बारे में थोड़ा थोड़ा यदा कदा बताते रहते है| ताऊ तो भूत है क्यों की कभी वो एम् पी में तो कभी राजस्थान में होते है | पाना धाय के बारे में एक छोटा सा पाठ राजस्थान की पुस्तकों में दिया गया है लेकिन कहानी के रूप में है | ज्यादा विस्तार से तो यहाँ इस पोस्ट में ही पढ़ने को मिला है |

    Reply
  6. महेन्द्र पटेल   April 3, 2010 at 11:28 am

    पन्ना का त्याग अपूर्व था| ऐसा त्याग पहले कभी न किसी ने किया है और ना ही कोई करेगा|
    जय पन्ना धाय|
    धन्यवाद|

    Reply
    • kundan   September 4, 2012 at 11:28 am

      sach kaha sir apne

      Reply
    • kundan   September 4, 2012 at 11:30 am

      Sach kaha sir apne, na koi aisa kiya, aur ab toh kisi se aisa karne ki ummid hi bekar hai, ab toh mooh me ram bagal me churi wali baat hai, iss samay itna tyag ki baatein toh sirf kitabo me hi milti hai

      Reply
  7. Shekhar kumawat   April 3, 2010 at 11:31 am

    YAHI TO WO BAT HE JIS KE KARAN LOG AAJ BHI PANNA KE TYAG KA PARICHAY DETE HE IS DUNIA ME

    WO KISSA KABHI NAHI BHULAYE JANE WALA HE

    दूर बहट कर एक विशाल पर्वत को रोज देखता वो कोई और नहीं मीरा की तपस्वी और पन्ना की त्याग की भूमी गढ़ चित्तोड़ हें |

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    Reply
  8. Shekhar kumawat   April 3, 2010 at 11:33 am

    दूर बहट कर एक विशाल पर्वत को मे रोज देखता वो कोई और नहीं मीरा की तपस्वी और पन्ना की त्याग की भूमी गढ़ चित्तोड़ हें |पने जन्म भूमी के जबरदस्त इतिहास के कारन आज तलक में अपने आप को गोरवान्वित महसूस करता हूँ

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    Reply
  9. राज भाटिय़ा   April 3, 2010 at 1:35 pm

    हम ने भी बचपन मै इस कहानी को पढाथा, आप का धन्यवाद

    Reply
  10. प्रवीण पाण्डेय   April 3, 2010 at 3:44 pm

    पहली बार कहानी पढ़कर रोंगटे खड़े हो गये थे ।

    Reply
  11. पन्ना धाय का चरित्र अद्भुत है। कुछ इस तरह का मन में आता है कि धरती पर ऐसे भी लोग हुये थे!

    Reply
  12. raghvandra rathore   April 21, 2010 at 6:39 am

    Panna dhai ne mewar ke liya jo balidaan diya woh to sabe jante hai…Paar kya Marwar ke Maharaja Ajit Singhji ke liya, Mukam singhji Balunda ke Rani Bagheliji ne jo balidaan diya tha..Kya Unko log jante hai ???..uska mention to Marwar ke Itihas me bhe nahi kiya hai !!

    Reply
  13. ePandit   May 9, 2012 at 10:42 am

    पन्ना धाय का बलिदान इतिहास में स्वर्णअक्षरों में लिखा है। युगों तक पीढ़ियाँ पन्ना धाय के इस त्याग से प्रेरणा पाती रहेंगीं।

    Reply
  14. Gauri   July 4, 2012 at 2:18 am

    Brother Ratan Singh agar sach pucho USA me rehate huve bhi apke Blog pe akar na jane mai kitna apne Purvajo ke baare sikh rahi hu. " Mera Novel " Saat Janam ke Baad" mein mujhse etani sahyata mil rahi hai ki mai apko bata nahi sakati. Mai sab logo aur sab jati dharam ko ezzat aur maan deti hu lakin EK baat ka dukh hai ki savntrata ke samay hamare Rajputo Yudhas ka naam nahi deti yeh sarkar. Kiyon? Balki arkshn ke naam per ham Rajputo ko kitna kamjor kar rakha hai , Agar Desh Bach sakta hai es waqat to Rajputp ko sangthan karna hoga aur agar Hindu Dharam ke alava koi aur dharam apni tarf ham rajputo ko bhatkata hai to humen kathor awaj ki avshkata hai, especially jo dhram convert karta hai us dharam ko humen rokna hogga agar woh shanti se reh sakte hai to theek hai aur kissi Hindu ladaki ka shadi ke baat na to dharam badlana chahyiye na hi naam. mai chahumgi ki aap humen un logo ke naam bataye jinhone bharat bhumi ki azadi ke liaye kaam kiya. Kya ek Gandhi ji he tha jinhone Desh azad karvaya? Kaya ek Pundit nehru hi thae jinhone Desh ko azad karaya? kiyon nahi atta hamare rajputo ka naam? Kashmir Rajputo ki Ryast thi us dharati ko rajputo ke havale kiya jana chahaiye agar hamari sarkar kashmir ko bacha nahi sakati.

    Reply
  15. brijesh rajput   August 10, 2012 at 11:40 am

    sumjh me nai aa raha ki kya likhu soch raha hu is bat ki khushi manau ki m bhi rajput hu ya apne aap ko kosu ki m to bas jati se rajput hu real rajput to vo the jinohne rajputana ka kad intna uncha kar diya ki log dekhte rah gaye…….

    Reply
  16. brijesh rajput   August 10, 2012 at 11:43 am

    sumjh me nai aa raha ki kya likhu soch raha hu ki m khus ho jau kyoki m rajput hu ya apne aap ko kosu ki m to bas jati se rajput hu real rajput to vo the jinhone rajputan ki kahani apne khoon or talwro se likhi thi………

    Reply
  17. sneha kumar   September 28, 2013 at 2:42 pm

    wat a great sacrifice ! she was a gud mother and a great maidservant ! her scrifice cant be xpressed

    Reply
  18. sneha kumar   September 28, 2013 at 2:43 pm

    wat a great sacrifice ! she was a gud mother and a great maidservant ! her scrifice cant be xpressed

    Reply
  19. Anil Vishnoi   October 21, 2013 at 7:07 pm

    can any body please tell me what is the history of Panna Dai after Udai Singh became the king of mewar. How did Udai singh behave with Panna Dai..Did he respect her or reward her…or just dumped her like Akbar did with his guardian Bairam Khan..

    Reply
    • Namita   November 2, 2016 at 8:08 pm

      Panna daai is above all these things.she just left the kingdom after udai singh was crowned the king.

      Reply
  20. KG Gochar   October 25, 2013 at 5:20 am

    salute the panna dhai gurjar

    Reply
  21. KULDEEP SINGH RAJPUROHIT   October 25, 2013 at 9:16 am

    maharana pratap serial me panadhay ki jo sachai batai ja rahi hai usase aap kitna sahmat hai

    Reply
  22. Gaharilal gurjar   December 11, 2013 at 5:08 pm

    वीर गुर्जर पन्नाधाय

    Reply
  23. Saurabh Sharma   October 20, 2014 at 10:21 am

    i salute panna dhai with the bottom of my heart.

    Reply
  24. Saurabh Sharma   October 20, 2014 at 10:23 am

    i salute panna dhay with the bottom of my heart.

    Reply
  25. Swati Agrawal   January 17, 2015 at 10:07 pm

    aapka bahut dhanyavaad ye kahani yahan likhne k liye.. bachpan mein school mein padhi thi aur uske baad kabhi bhool nahi saki… panna dhaay vaastav mein ek mahan stri thi…

    Reply
  26. virender bhati   November 28, 2015 at 4:21 pm

    Veer Gujjar

    Reply
  27. Unknown   March 8, 2016 at 9:51 am

    वीर गुर्जर शिरोमणि देश भक्त अपने सुपुत्र चन्दन का बलिदान देने वाली माता को शत् शत् नमन

    Reply
  28. Unknown   May 17, 2016 at 6:33 am

    jai veer gurjari panna dhai

    Reply
  29. komal singh   September 1, 2016 at 2:51 pm

    Panna dhay ki balidani gatha sun kar kaphi abhibhoot hua.dhany hai aise log.

    Reply

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