पाबू -1

भाद्रपद मास की बरसात सी झूमती हुई एक बारात जा रही थी | उसकी बारात जिसने विवाह पहले ही सूचना दे दी थी कि- ‘ मेरा सिर तो बिका हुआ है , विधवा बनना है तो विवाह करना !’ उसकी बारात जिसने प्रत्युतर दिया था – जिसके शरीर पर रहने वाला सिर उसका नहीं है , वह अमर है | उसकी पत्नी को विधवा नहीं बनना पड़ता | विधवा तो उसको बनना पड़ता है जो पति का साथ छोड़ देती है |’

ढोली दुहे गा रहा था –
धरती तूं संभागणी ,(थारै) इंद्र जेहड़ो भरतार |
पैरण लीला कांचुवा , ओढ़ण मेघ मलार ||
रंग आज आणन्द घणा, आज सुरंगी नेह |
सखी अमिठो गोठ में , दूधे बूठा मह ||

गोरबंद और रमझोलो से झमक झमक करते हुए ऊँटों और घोड़ों वाली वह बारात जा रही थी , सूखे मरुस्थल की मन्दाकिनी प्रवाहित करती हुई , आनंद और मंगल से ठिठोली करती हुई | परन्तु कौन जनता था कि उस सजी सजाई बारात का वह अलबेला दूल्हा एक दिन जन जन के हृदय का पूज्य देवता बनेगा ?
कौन जानता था कि सेहरे और पाग की कलंगी और तुर्रों से सजे हुए उस दुल्हे के मन में , जरी गोटे से चमचमाते अचकन बागों में छिपे उसके हृदय में भी एक अरमान था -एक प्रतिज्ञा थी – एक जीवन था -एक तडफन थी -एक आग थी -मेरा ज्ञानार्जन ,मेरा विवाह ,मेरा कुटुंब पालन और मेरे जीवन के समस्त व्यापार एक आर्त की पुकार पर बलि होने के लिए है |
कौन जानता था कि उस मौर के समान मीठी बोली वाली ,हिरन के समान कातर नयन वाली, वायुरहित स्थान की लौ सी नासिका वाली, नंदन वन के किसी चंपा की लम्बी डाली जैसे हाथों वाली , चक्रव्यूह की लज्जा और सीता के समान शील वाली देव बाला सी, उमरकोट के बगीचों की अप्सरा सी, रूपमती दुल्हिन गठजोड़े के लिए मिलेगी ?
कौन जानता था कि स्वर्ग के सोंदर्य को लज्जित करने वाला ऐसा आकर्षक विलास भी गोरक्षा की प्रतिज्ञा के समक्ष श्रीविहीन होकर कोने में प्रतीक्षा करता रह जायेगा ?

कौन जानता था कि शहनाइयों की गमक ,मांगलिक और मधुर आभूषणों की ठुमक , मनुहारों के उल्लास भरे वातावरण की झमक-झमक में जिस समय झीने घूँघट में छिपे अनुपम और सोंदर्य के किनारों से हृदय-समुद्र की उताल तरंगे पछाड़ खाने को प्रस्तुत होगी , उस समय भाग्य का कोई क्रूर हरकारा भरे हुए प्यालों को ठुकरा कर , जीवन की मधुर हाला को आँगन में ही बिखरने को तैयार हो जायेगा ?
कौन जानता था कि चारणी भी चील का रूप धारण कर याद दिलाने आएगी – ‘ राही ! विधाता ने तुम्हारे लिए जो मार्ग निश्चित किया था वह तो कोई दूसरा ही मार्ग है | इस लौकिक पुष्प में जिस सोंदर्य की खोज में भंवरे बन कर आये हो वह अलौकिक सोंदर्य यहाँ नहीं है | दुल्हे ! तेरी बारात तो सजकर यहाँ आई है परन्तु तेरे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही है | तू इस स्वागत से आत्मविभोर हो रहा है परन्तु इससे भी अधिक सुन्दर स्वागत की तैयारियों के लिए किसी अन्य स्थान पर दौड़ धूप हो रही है – देखो , गगन की गहराइयों में , स्वर्ग की अप्सराए तुम्हारे लिए वर मालाएँ लेकर खड़ी है !’
बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व. श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित
क्रमश:…………

6 Responses to "पाबू -1"

  1. चंदन कुमार झा   December 4, 2009 at 4:08 pm

    बहुत सुन्दर !!! अगली कड़ी की प्रतिक्षा रहेगी ।

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  2. मनोज कुमार   December 4, 2009 at 5:22 pm

    अच्छी रचना। बधाई।

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  3. राज भाटिय़ा   December 4, 2009 at 5:58 pm

    बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना

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  4. ललित शर्मा   December 4, 2009 at 6:07 pm

    रंग आज आणन्द घणा, आज सुरंगी नेह |
    सखी अमिठो गोठ में , दूधे बूठा मह ||

    रतन सिंग जी राम राम

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  5. Udan Tashtari   December 4, 2009 at 7:16 pm

    स्व. श्री तनसिंह जी की कवितायें तो बहुत पढ़ी यही कहीं..आज यह पढ़्कर आनन्द आया. आभार…जारी रहिये.

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  6. नरेश सिह राठौङ   December 17, 2009 at 3:16 pm

    काव्य शैली मे लिखा लेख बहुत बढिया लगा ।

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