31.3 C
Rajasthan
Sunday, October 2, 2022

Buy now

spot_img

पाबू -2

पाबू भाग १ का शेष ……………..
कौन जनता था कि विवाह के ढोल-धमाकों में भी कर्तव्य की क्षीण पुकार कोई सुन सकता है | मादकता के सुध बुध खोने वाले प्यालों को होटों से लगाकर भी कोई मतवाला उन्हें फेंक सकता है , वरमाला के सुरम्य पुष्पों को भी सूंघने के पहले ही पैरों तले रोंद सकता है ?
कौन जानता था कि मिलन का यह अनुपम अवसर उपस्थित होने पर ब्राह्मण कहता ही रहेगा -अभी तो तीन फेरे ही हुए है ,चौथा बाकी है ,उस समय गठजोड़े को छोड़कर सुहागरात की इन्द्रधनुषीय सतरंगी शय्या के लोभ को ठोकर मारकर ,भोग-एश्वर्य के दुर्लभ स्वाति-नक्षत्र के समय युगों का प्यासा चातक पिऊ पिऊ करता हुआ ,प्यास को ही पीकर ,रागरंग के मादक अवसर पर निमंत्रण भरे इशारों की उपेक्षा कर , कंकण डोरों को बिना खोले ही कर्तव्य मार्ग का बटोही मुक्त हो जायेगा ?
और वह चला गया -क्रोधित नारद की वीणा के तार की तरह झनझनाता हुआ ,भागीरथ के हठ की तरह बल खाता हुआ , उत्तेजित भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा के समान कठोर होकर, पर कौन जानता था कि नारद की वीणा का वह क्रोधित तार स्वरों की उत्तेजना में ही टूट जायेगा ,भागीरथ के बल खाते हट को न झुकने की इतनी कीमत चुकानी पड़ेगी ? भीष्म की प्रतिज्ञा को आलिंगन-बद्ध भोगों को बिना भोगे ही विदा करना पड़ेगा ?
कौन जानता था कि चांदे और ढेमे के बीच वह शूरमा पाबू संसार में अपने पीछे लड़ने के इतिहास का अनिर्वचनीय उदहारण रखकर ,सितारों की ऊँचाइयों को नीचा दिखाने वाली केशर कालवी पर सुन्दर स्वागत का साक्षत्कार करने के लिए अनंत की गहराइयों में सशरीर ही पहुँच जायेगा और तब दिशाएँ वियोगिनी बनकर ढूढती रह जाएगी ,मानवता विधवा बनकर सिसकती रह जाएगी ?
कौन जानता था कि जिसने अग्नि की पूरी परिक्रमाएँ ही साथ नहीं दी ,जिसके हथलेवे का हाथ पकड़ने से पहले ही छोड़ दिया गया , जिसके महावर की लगी हुई मेहँदी ने सुखकर अपनी अरुणिमा का परिचय भी नहीं दिया , जिसकी आँखे किसी का रूप देखने से पहले लज्जा के कारण अपने घूँघट को ऊँचा तक नहीं उठा सकी , वही दुल्हन अपने नए ससुराल में उसी वर से दुबारा पाणिग्रहण कराने के लिए हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गस्थ पति से चिरमिलन के लिए चल देगी ?
वह चली गयी -उमरकोट के राणा सूरजमल की कोख की जीती जागती ज्योति चली गयी ,परम ज्योति से मिलने के लिए ; केशर कालवी चली गई , विस्मृति की कालिमा में खोने के लिए ; लेकिन स्मृति बाकी रह गई ; पाबू की अमर स्मृति जो आज भी कोलू के पास मरुस्थल के टीलों पर आत्मविभोर हो वीणा वादन कर रही है ; राजस्थान का जनगण उसी की स्मृति का कथाओं और गीतों की लोरों में , रावणहत्थों की धुन के साथ पड़ और पड़वारों में पूजन करता है | पड़ लगती है ,रतजगे होते है , पाबू का यशगान होता है – कि पाबू भी एक क्षत्रिय था |

-ये था बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व. श्री तन सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ” बदलते दृश्य” में राजस्थान के लोक देवता पाबू जी राठौड़ पर आलेख |
-पाबू जी के बारे में एतिहासिक जानकारी देते हुए पिछले दिनों नरेश जी ने राजपूत वर्ल्ड पर एक श्रंखला लिखी थी वह आप यहाँ जाकर पढ़ सकते है |
-केशर कालवी – यह पाबू जी की घोड़ी का नाम था |
-पाबू जी द्वारा अपने विवाह में फेरों के उपरांत बिना सात फेरे पूरे किये ही बीच में उठकर गोरक्षा के लिए जाने व अपना बलिदान देने के बाद राजस्थान में राजपूत समुदाय में अब भी शादी में चार ही फेरे लिए जाते है |

Related Articles

7 COMMENTS

  1. @रतन सिग जी- वैदिक काल मे भी चार फ़ेरा ही होया करता, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के संकल्प का, पाछै ई सात फ़ेरां की रिवाज फ़िलम वाला चला दी, फ़ेरां पाछै फ़ेरपाटा को रिवाज आ ग्यो। बढिया पोस्ट, जरा ताऊ नै भी ले के आओ कई दिन हो ग्या। आभार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Stay Connected

0FansLike
3,505FollowersFollow
20,100SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles