नकली बूंदी

नकली बूंदी
केवल बीस पच्चीस घुड़सवारों को लेकर महाराणा लाखा ‘‘बूंदी’’ फतह करने को चल पड़े। सूरजपोल से निकल कर उन्होंने बूंदी पर आक्रमण कर दिया। चित्तौड़ दुर्ग की दुन्दुभियों ने विजयराग अलापा। नौबत पर विजयाभियान का डंका पड़ा और नकीबों ने चित्तौड़पति के जयघोष से आकाश गूंजा दिया।

“हर-हर महादेव” के कुल-घोष के साथ ही घोड़ों के ऐड लगा दी। टापों की रगड़ से उत्पन्न काली मिट्टी का बादल पीछे और घोड़े आगे दौड़े जा रहे थे। बाल रवि की चमकीली किरणों ने उज्ज्वल तलवारों को और भी अधिक चमका दिया। अब केवल दो सौ हाथ दूर बूंदी रह गई थी। एक, दो और तीन ही क्षण में मिट्टी की बूंदी मिट्टी में मिलाई जाने वाली थी।

‘सप’ करता हुआ एक तीर आया और महाराणा के घोड़े के ललाट में घुस गया। धवल ललाट से रक्त की पिचकारी छूट पड़ी। घोड़ा चक्कर खाकर वहीं गिर गया। महाराणा कूद कर एक ओर जा खड़े हुए। दूसरा तीर आया और एक सैनिक की छाती में घुस गया।

सैनिक वहीं गिरकर ढेर हो गया। सब घोड़े वहीं रोक दिए गए।

“हैं ! यह क्या ? ये तीर कहाँ से आ रहे हैं ? यहाँ कौन अपने शत्रु हैं ?’ महाराणा ने सम्हलते हुए पूछा। यह तीर तो बूंदी में से आ रहे हैं। एक सरदार ने शीघ्रतापूर्वक घोड़े से उतरते हुए कहा।

“बूंदी’ में से कौन तीर चला रहा है ? जाकर पता लगाओ।“ और एक सरदार घोड़े से उतरा और बूंदी की ओर चला पता लगाने के लिए, महाराणा का दूत बनकर। उसने जाकर देखा- एक युवक अपने साथियों सहित मोर्चा बाँधे खड़ा था। वह शास्त्रास्त्रों से सुसज्जित था और हवा में उड़ रहे केसरिया वस्त्र के पल्ले को धनुष पर चढ़ाए हुए तीर की पंखुड़ियों में से निकाल रहा था।
“हैं ! कुम्भाजी तुम ! यहाँ किसलिए आए?
“बूंदी की रक्षा करने के लिए।’’
“क्या ये तीर तुमने चलाए थे?’
“हाँ”
‘‘मेवाड़ का छत्र भंग करना चाहते थे ?’’
‘‘छत्र भंग करना नहीं चाहता था इसीलिए घोडे के ललाट में तीर मारा।’’
“चलो महाराणा साहब के पास ।’
“महाराणा साहब से निवेदन करो कि बूंदी विजय का विचार त्याग दें तो हाजिर होऊँ ।’’

तुम्हें मालूम है, महाराणा साहब ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक बूंदी विजय नहीं कर लूंगा तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा। बूंदी यहाँ से दूर भी है और उसको सरलता से विजय भी नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर महाराणा के दृढ़-प्रण और अमूल्य प्राणों की रक्षा भी अत्यावश्यक है। इसीलिए यह नकली बूंदी बनाई गई है। इसको विजय कर महाराणा अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर अन्न-जल ग्रहण कर लेंगे। असली बूंदी फिर धीरे-धीरे तैयारी करके विजय करली जाएगी। इसीलिए तुम यहाँ से हट जाओ और महाराणा साहब को अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने दो।’
“मेरे लिए तो यह असली बूंदी से भी बढ़कर है। महाराणा साहब से निवेदन कर दो कि पाँच हाड़ों के मरने के उपरान्त ही इस ‘‘बूंदी’’ को विजय कर सकोगे।”

“कुम्भाजी ! अन्तिम निर्णय करने के पहले और सोच लो।’
और सरदार ने आकर सब वृत्तान्त महाराणा साहब से कह दिया।
“यह कुम्भा हाडा कौन है ?” महाराणा ने आश्चर्य से पूछा।
“अन्नदाता ! अपनी सेना में कुछ समय पहले कुछ हाडा आकर भर्ती हुए थे, कुम्भा उन्हीं हाडों का नायक है।‘‘
‘‘यह मेरा चाकर है ?‘‘
“हाँ अन्नदाता।’’

महाराणा ने वहीं से उच्च स्वर में कहा-कुम्भाजी ! मैं तुम्हारी वीरता और मातृभूमि के प्रेम से बहुत प्रसन्न हूँ और पाँच घोड़ों की जागीर देता हूँ। तुम शीघ्र बाहर निकल आओ और मुझे अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेने दो।’
“यदि कोई दूसरा अवसर होता तो अन्नदाता की आज्ञा को सिर पर उठाता पर इस समय विवश हूँ।’
“तुम्हें मालूम है, यह मेरी प्रतिज्ञा का प्रश्न है।’
‘‘अन्नदाता ! यह हाडों की प्रतिष्ठा का प्रश्न है।’’
“पर यह तो नकली बूंदी है। मैं जब असली बूंदी विजय करने आऊँ तब देखँगा तुम्हारी प्रतिष्ठा।’’
“अन्नदाता ! जो नकली बूंदी के लिए नहीं मर सकता। वह असली बूंदी के लिए भी नहीं मर सकता। अन्नदाता जब असली बूंदी विजय करने पधारेंगे तब वहाँ अपनी प्रतिष्ठा रखने वाले और कई हाडा मिल जाएँगे।
‘‘कुम्भाजी, तुम नमकहरामी कर रहे हो।’’
‘‘अन्नदाता का नमक खाया है इसलिए अन्नदाता इस सिर के मालिक हैं, इज्जत के नहीं। यह प्रश्न केवल मेरी इज्जत का नहीं, हाडा वंश की इज्जत का है, इसलिए अन्नदाता मुझे क्षमा करेंगे।’

महाराणा ने सरोष नेत्रों से अपने सैनिकों की ओर देखा और वे दूसरे घोड़े पर सवार हो गए। मिट्टी की बूंदी पर वे आक्रमण करना ही चाहते थे कि कुम्भा ने पुकारा- अन्नदाता, ठहरिए ! आप कम सैनिकों के साथ आए हैं इसलिए कदाचित इस बूंदी को भी विजय नहीं कर सकेंगे। एक प्रतिज्ञा पूरी न होने पर दूसरी प्रतिज्ञा करने का अवसर कहीं न आ जाय इसलिए आप किले में से कुमुक और सैनिक मंगा लीजिये। बूंदी की भूमि इतनी निर्बल नहीं है जो आसानी से विजय की जा सके।’’
महाराणा वहीं ठहर गए।

चित्तौड़ दुर्ग के कंगूरों पर से लोग नकली बूंदी विजय देख रहे थे। उन्होंने देखा- एक घुड़सवार घोड़ा दौड़ाता हुआ दुर्ग की ओर जा रहा था। सब लोग आश्चर्यचकित थे।

एक घड़ी बाद लोगों ने फिर देखा- सैकड़ों घोड़े और हाथी सजधज कर नकली बूंदी की ओर जा रहे थे। नकली बूंदी से कुछ ही दूर एक पूरी सेना एकत्रित हो गई थी। उस सेना ने नकली बूंदी का घेरा दिया। फिर हाथियों को बूंदी विध्वंस करने के लिए छोड़ा। पीछे से घुड़सवारों ने आक्रमण किया। ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष चित्तौड़ दुर्ग तक सुनाई दे रहा था। लोग अब भी आश्चर्यचकित थे- नकली बूंदी में यह लड़ाई कैसी ? कोई उसे वास्वतिक युद्ध समझ रहा था और कोई युद्ध का केवल अभिनय।
घड़ी भर घमासान संग्राम हुआ। अन्त में महाराणा की प्रतिज्ञा और हाड़ों की प्रतिष्ठा की रक्षा हुईय पर कुम्भा और उसके साथी तिल-तिल कट कर गिर चुके थे।

लेखक : स्व. आयुवान सिंह शेखावत

One Response to "नकली बूंदी"

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.