नदी की व्यथा

नदी की व्यथा

शांत वातावरण में मदमस्त बहती जा रही थी
हिलोरे लेती सजती रहती…
कभी उफनती ,तो कभी शांत …
बस बहती जा रही थी |

सौलह श्रृंगार कर,वन सौन्दर्य लिए..
मै भी कभी नवयुवती थी |

तुम्हारा यूँ प्रतिदिन निहारना ..
मुझे भाने लगा..
किसी देवी भांति,पूजा करना…
मुझे भाने लगा |

सच कहूँ तुम्हारे प्रेम वेग में
बहती जा रही थी |

पर आज…

तुम्हारा यूँ अचानक बदलना..
मन को कुछ खटका |

ना समझना यह कि तुमने मेरा आँचल मेला कर डाला
नदी हूँ मै नहीं कोई गन्दा नाला |

कैसे पथिक हो प्यास बुझा के गन्दा कर डाला
मै नदी हूँ हर गन्दगी धुल जाती, मुझ में |

मेरा वजूद मेरा सौन्दर्य है मुझ से
पलट कर न देखना, कर लो खुद पर इतनी कृपा |

मेरा भाव हो या मेरा सौन्दर्य
बह जाते है इसमें तुमसे कई |

राजुल शेखावत

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8 Responses to "नदी की व्यथा"

  1. Rajput   October 16, 2012 at 1:52 am

    बहुत शानदार .

    भूपेन हजारिका की कविता याद आती है .
    गंगा बहती हो क्यों
    नैतिकता नष्ट हुयी,
    मानवता भ्रष्ट हुयी निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों….

    Reply
  2. Arvind Mishra   October 16, 2012 at 2:24 am

    भावमयी कविता

    Reply
  3. Pagdandi   October 16, 2012 at 8:02 am

    Y man ke bhav sirf Nadi ke hi nahi Aurat ki bhi yahi vaytha h baisa … bhut hi gahrai liye h aapke shabd …. ese hi likhte rahe ….badhai

    Reply
  4. D.S.Shekhawat   October 17, 2012 at 2:51 am

    bhut hi sunder rachna hai,atmik abhivakti hai,badhai ho…

    Reply
  5. chandan singh bhati   October 17, 2012 at 4:03 am

    bahoot sundar

    Reply
  6. Dheeraj Rathore   October 17, 2012 at 4:11 am

    बहुत शानदार

    Reply
  7. Aditi Poonam   October 17, 2012 at 4:29 pm

    एक्बेह्तारीन सार्थक अभिव्यक्ति ,राजुल जी

    Reply
  8. Anonymous   June 25, 2014 at 1:23 pm

    atti uttam rachna

    Reply

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