आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान का संगम

आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान का संगम
क्षत्रिय चिन्तक देवीसिंह, महार (Devi Singh, Mahar) अपने ज्यादातर उदबोधनों में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में आत्मीयता के भाव की कमी के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए, आधुनिक शिक्षा (Modern Education) में यह बहुत बड़ी कमी बताते है। मैंने जब भी महार साहब को सुना है शिक्षा में भाव की कमी पर वे अवश्य बोले है। पर आधुनिक शिक्षा में भाव कैसे पैदा हो? भावपूर्ण आधुनिक शिक्षा प्रणाली कैसी हो? आत्मीयता का भाव जगाने वाली शिक्षा प्रणाली का मोड्यूल कैसा हो? यह पहली बार जाना फरीदाबाद के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान जीवा समूह Jiva Ayurveda (Jiva Public School, Faridabad) के चेयरमैन ऋषिपाल चैहान की जुबान से। कुछ माह पहले मौसम विभाग, भारत के महानिदेशक डा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ (Dr.L.S.Rathore) से शिक्षा पर चर्चा शुरू करते ही ऋषिपाल चैहान ने ‘भाव की कमी’ को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ी कमी बताई। ऋषिपाल चैहान बताते है कि यदि आधुनिक शिक्षा में भाव की कमी ना हो, तो इस शिक्षा का बहुत बड़ा फायदा लिया जा सकता है।

ऋषिपाल चैहान सिर्फ भाव की कमी पर ही प्रकाश नहीं डालते वरन इस कमी को महसूस करने के बाद उन्होंने अपने शिक्षण संस्थान जीवा में दी जानी वाली आधुनिक शिक्षा को भाव प्रधान व संस्कारमय बनाने की ओर भी काफी ठोस कार्य किये है। जीवा पब्लिक स्कूल के हर छात्र के जहन में यह बात शुरू से बिठा दी जाती है कि उसके अभिभावक कड़ी मेहनत से कमाया धन उनकी पढ़ाई पर खर्च कर रहे है। अतः उनके अभिभावकों द्वारा विद्यालय को चुकाई फीस तभी वसूल हो सकती है, जब छात्र वहां से कुछ सीख कर जायेंगे। इस तरह जीवा समूह अपने छात्रों के मन में यह भाव पैदा कर देता है और इसी भाव के वशीभूत छात्र यह समझकर कि उसे अभिभावकों द्वारा चुकाई फीस के बदले सीख कर जाना है, छात्र मनोयोग से विद्यालय में सिखाई जानी वाली शिक्षा ग्रहण करता है। साथ ही छात्रों के मन में अभिभावकों, शिक्षकों, सहपाठियों के प्रति आत्मीयता के भाव को कई कार्यक्रमों के माध्यम से बढाने व संस्कार निर्माण हेतु प्रयास किये जाते है। जहाँ छात्र प्रतिदिन स्वाध्याय करते है, जिससे कि वे अपनी कमियों, अपनी गलतियों को जान सकें एवं सुधार सकें। इस प्रकार के भाव से समाज में एक सकारात्मक भाव भी उत्पन्न होता है, जो आज के समय में बहुत आवश्यक है। यहाँ छात्र एक डायरी में प्रतिदिन अपनी गतिविधियाँ व अनुभव लिखते हैं। जिसमें वे अपने तथा समाज के प्रति किये कार्यों को भी दर्ज करते है। जीवा में छात्रों को प्रतिदिन दिनचर्या का पालन करने को प्रेरित किया जाता है ताकि छात्र अपने दैनिक कार्य स्वयं सुचारू ढंग से कर सके।

जीवा में छात्रों को किसी विषय को रटाने के बजाय सिखाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। क्योंकि रटे हुए किताबी ज्ञान से परीक्षा में अंक तो ज्यादा लिए जा सकते हैं, पर व्यवाहारिक जीवन में रटा हुआ ज्ञान नहीं, बल्कि सीखा हुआ ज्ञान ही काम आता है।

प्रायः देखा गया है कि अक्सर अभिभावक बच्चे को उसकी पसंद, प्रकृति, प्रवृति आदि के विपरीत उसे विषय दिलवा देते है। छात्र की जिस विषय में रुची होती है, उसके विपरीत विषय पाने के चलते वह पिछड़ जाता है, या उतना आगे नहीं बढ़ पाता। जितना अपनी पसंद के विषय को पढ़कर बढ़ सकता था। उदाहरण के तौर पर सेना मंे जाने के इच्छुक किसी युवक को बिजली विभाग में पदस्थापित कर दिया जाए, तो वह उतने अच्छे परिणाम नहीं दे सकता जितना वह सेना में दे सकता था। पर इस तरह की समस्या को हल करते समय अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी समस्या आती है कि वे अपने बच्चे की पसंद, प्रकृति, प्रवृति के बारे में कैसे जाने? इस विषय पर चर्चा करते हुए चैहान बताते है कि उनके शिक्षण संस्थान में छात्र के ‘Multi Nature’ अर्थात प्रकृति एवं प्रवृति को जांचा जाता है। उसी आधार पर छात्रों को कैरियर बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके लिए संस्थान ने शिक्षा को Ayurveda से जोड़ रखा है। वे हर छात्र का आयुर्वेद के हिसाब से वात, पित्त, कफ आदि की अपने अनुभवी आयुर्वेदाचार्यों से जांच करवा कर उसे कंप्यूटर में बच्चे की प्रोफाइल में जुड़वा देते है। इसके लिए जीवा शिक्षण संस्थान ने एक खास सॉफ्टवेयर बनवा रखा है। जिसमें छात्र की हर क्षेत्र में पसंद, आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त, कफ, प्रकृति, प्रवृति आदि की पूरी रिपोर्ट होती है। जिसके माध्यम से अभिभावक अपने बच्चे की हर क्षेत्र में रुची के साथ यह भी जान सकते हैं, कि बच्चे को स्वास्थ्य की दृष्टि से घर में किस तरह का भोजन दिया जाय ताकि बच्चे का सर्वागीण विकास हो सके।

आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान का संगम, आत्मीयता के भाव जगाने वाले कार्यक्रम, संस्कार निर्माण और शिक्षा को आयुर्वेद से जोड़ कर शिक्षा का जो मोड्यूल जीवा समूह के शिक्षण संस्थान में प्रयुक्त हो रहा है, शिक्षा का ऐसा मोड्यूल ही सही मायने में राष्ट्र निर्माण में सहायक हो सकता है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र के निर्माण, विकास के लिए भाव पूर्ण, संस्कारवान, शिक्षित नागरिक पहली आवश्यकता है।

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