मेरे बचपन का सावन

मेरे बचपन का सावन

सावन आ गया हमेशा की तरह पुरे एक साल बाद , हर बार की तरह अपनी खूबसूरती को समेटे …पर फिर भी कहीं न कही एसा लगता है , कि हर बार कुछ कमी रह जाती है अब सावन भी पहले जैसा नहीं रहा है .शायद होगा भी पर मेरे गाँव में तो अब वैसा सावन नहीं आता है ,जैसा जब मै छोटी थी तब आता था अब मै ये तो नहीं कहुगीं कि हमारे ज़माने मे एसा होता था क्योंकि मै कोई दादी या नानी नहीं बनी अभी ,बस यही कोई १५ साल पहले की बात कर रही हूँ.जब सावन का पता तब चलता था जब खेतों के किनारे और रास्तो मे से “सावन की डोकरियां” [एक मखमली कीड़ा जो सुर्ख लाल होता है ] पकड़ पकड़ के घर पर लाते थे, बहुत ही मखमली होते थी वो सच मे जैसे कोई एक रेड कारपेट यानि छोटा सा मखमली लाल गलीचा आ गया हो हाथो में .तब पता चलता था कि हाँ जब ये सावन की डोकरियां आती है तब सावन आता है .जब सारी सहेलियां सावन के सोमवार के व्रत करती थी और स्कूल मे ये वार्तालाप का विषय होता था कि आज कहां जाना है उपवास खोलने क्योंकि सावन के सोमवार का उपवास हम रावले की सभी लडकियां गाँव की चारो दिशाओं में जाके खाना खाती थी .एक सोमवार को उतर दिशा यानि की माता अन्नपूर्णा का मंदिर, दूजा सोमवार रावला बेरा [राजपूतो का पुश्तेनी कुआं ] और इसी तरह चारों सोमवार चारों दिशाओ में जाके खाना खाते थे, उस दिन खास बनता था “चिलड़ा” [मालपुए ] जिस का इंतजार अगले सोमवार तक करना पड़ता था और सावन के बाद तो कभी कभी ही मिलते थे ….बस एसा होता था तो लगता था कि सावन है .एक बात और जब जीजा [बड़ी बहन ] की सगाई हुई तो ससुराल से लहरिया आता था [कुछ कपडे और मिठाई ] तब सुनते थे की सावन आया है और हाँ,काकोसा काकीसा, भाभा और भाभीसा खेतो में जाके नीम के पेड़ पे झुला भी झूलते थे ,और जब काकीसा तैयार होती थी तो सब जेठानियां उनपे हँसती थी ,सब चिड़ाते थे ,पर उनका झुलाना जरुरी भी होता था क्योंकि उनका ससुराल में पहला सावन जो होता था .तब पता चलता था कि सावन है …..
और अब जब पता है कि सावन क्या है तो अब वो सावन ही नहीं आता …………..
बस आती है तो याद उस सावन की……
अब तो काकीसा और भाभीसा भी कहती है कि अब वो जमाना ही गया ……………..
क्यों गया वो सावन कब लौटेगा वो मेरे बच्चपन का सावन …….
लो सावन आ गया पुरे एक साल के इंतजार के बाद आया है –

पहले जब आता था तो भीगा भीगा आता था
झोला भर के घेवर लाता था, बागो मै झुला झुलाता था
पर अब ……
अब तो वो खुद भी अपना छाता नहीं खोलता है
पूछो तो , ज्यादा बारिश नहीं थी ये बोलता है
फिर खुद ही अपनी आँखों मै भर के पानी पूछता है…….
ये बाग अब सूनें क्यों है ,क्यों नहीं झूलते नए नवेले जोड़े यहाँ?
क्यों नहीं आती तीज के सत्तू की खुशबू रसोई से ,
क्यों नहीं महकती घर की बहुओं के हाथो मै मेहंदी अब
क्यों नहीं आती वो सावन की डोकरिया हमें गुदगुदाने
क्यूँ क्यूँ अब नहीं होता है सावन का स्वागत लाल बांधनी[चुनडी] की साडी से
उन लहरियों के सात रंगों से .
इतनी आहे ना भराओ सावन से की वो आना ही छोड़ दे ,
हमने छोड़ दी है सारी रस्मो को निभाना ,
कही वो अपना आने का वादा ना तोड़ दे ……….
केसर क्यारी (उषा राठौड़)

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