भक्तों की मनसा पूर्ण करती – मनसा माता

भक्तों की मनसा पूर्ण करती – मनसा माता

उदयपुर (शेखावाटी) तहसील मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर खोह- गुड़ा ग्राम के पहाड़ो में मनसा माता Mansa mata पीठ स्थित है| मनसा देवी का मंदिर जीवन के तामझाम व कोलाहल से दूर प्रकृति माँ की गोद में “खोह“ से लगभग 5 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में गगन चुंबी पर्वत श्रंखलाओं की गोद में विराजमान है|

उदयपुर वाटी क्षेत्र में प्रसिद्ध तीर्थस्थल लोहार्गल शाकम्भरी माता Shakmabhri Mataमंदिर और माँ मनसादेवी प्रमुख दर्शनीय स्थल व आस्था के केन्द्र है, उल्लेखनीय है की लोहार्गल एवं शाकम्भरी किसी परिचय का मोहताज नहीं है, सावन -भादों मास में यहाँ के पर्वत पूर्ण रूप से श्रंगारित रहते है या यूँ कहूँ कि हरियाली से आच्छादित किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं लगते तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| यहाँ के प्राकृतिक वातावरण में आने वाले व्यक्ति प्रकृति माँ के सामीप्य व् चित की शांति का अनुभव करतें है| सावन मास में कावड़िये यहाँ के कुण्डों से पवित्र जल ले जाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करतें है|

टीबाबसई के “बाबा रामेसर दास जी महाराज” ने यहाँ वर्षों साधना की है, पहले वो अपना आश्रम यहीं बनाना चाहते थे, फिर उन्होंने टीबा बसई में अपना आश्रम बनाया| कहतें है यहाँ पर स्थाई रूप से जो भी रहने की कोशिश करता है,उसे कुछ ऐसे संकेत मिल जाते है,जिससे कुछ दिनों बाद इस पवित्र स्थान को स्वतः ही छोड़ना पड़ता है, क्योंकि जिस अभीष्ट की प्राप्ति के लिए साधक यंहा पर आता है उसकी प्राप्ति शीघ्र ही उसे हो जाती है,तो भला वह क्यों रुकेगा? मंदिर के गर्भ गृह के पास “लान्कड़ बाबा”(भेरू मंदिर)स्थित है| जिनके दर्शन के बिना माँ के दर्शन का कोई फलाशिर्वाद प्राप्त नहीं हो सकता |अत: यहाँ आने वाले सभी श्रद्धालु बाबा लान्कड़ के मंदिर में भी अनिवार्य रूप से शीश नवाते है|

सरल व् घुमावदार रहस्यमयी चढ़ाई पर चढ़ते हुए यात्री की उत्सुकता बढती जाती है| एवं थकान का अहसास भी नहीं होता है| दो पहाड़ों के बीच में एक दर्रानुमा मार्ग से माँ ‘मनसा माई की जय ” के जयकारे लगाते हुए हुए भक्त माँ के दरबार में शीश नवाते है, चारों तरफ हरियाली से आच्छादित पेड़ व् सकरे दर्रे में से कलकल बहता शीतल जल का झरना बरबस ही आने वालों का मन मोह लेता है, विगत सालों में माँ के भवन निर्माण एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं का विकास हुआ है, यहाँ पर माँ के प्रसाद बनाने का पूरा साजो सामान उपलब्ध है, लोग अपनी मांगी मुराद पूरी होने पर यहाँ आकर ‘सवामनी”( दाल-चूरमा ) का भोग लगाते है, प्राकृतिक रूप से बहने वाले शीतल जल के झरने द्वारा बनाया हुआ परसाद सुपाच्य व् सवादिष्ट बनता है|

माँ के प्राकट्य के बारे में बताते है की लगभग ५०० साल पूर्व से यहाँ पर लोगों का आगमन शुरू हुआ, पूर्व में यहाँ पहाड़ों में गडरिये पशुओं को चराते थे| ये क्षेत्र जंगल की लकड़ी व् पशुओं के चारे का उत्तम चारागाह था| कहते है कि एक दिन एक गडरिये के सामने माँ साक्षात् प्रकट होकर बोली “में यहाँ पर प्रकट होउंगी, इसलिए तुम डरना मत”! भीषण गर्जना के साथ पहाड़ों को चिर कर माँ का स्वरूप निकलने लगा| गडरिया डर के मारे चिल्लाने लग गया,जिसके फलस्वरूप मनसा का आकर छोटा रह गया, पहाड़ी की कंदराओं के बीच में अंगुली के आकर में माँ की ममतामयी मूर्ति है| इतना भीषण जंगल होते हुए भी आज तक किसी भी भक्त के साथ किसी अप्रिये घटना का घटित नहीं होना माता का चमत्कार ही है| शेखावाटी के प्रवासी लक्ष्मी पुत्र अपने बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए जब भी अपने पैत्रक गाँव आते है , तो माँ के दरबार में बच्चों व् नवविवाहित जोड़ों की धोक लगाते है,”मनसा सेवा समिति” के नाम से संस्था बनी हुई जिसमें इनका योगदान है| “सेवा समिति” यहाँ की व्यवस्थाओं का संचालन करती है |

श्री सतपाल सिंह शेखावत पूर्व सरपंच गुड़ा ने अथक परिश्रम करके यहाँ के दुर्गम रास्तों,कुंडो का निर्माण,जल व्यवस्था आदि को पूर्णतया समर्पित भाव से स्वयं उपस्तिथ रहकर पूर्ण करवाया है|उनके इस कार्य की जितनी सराहना की जाय कम है| यहाँ पर पानी के समुचित प्रबंध के लिए दो विशाल बाँधों का निर्माण भी हुआ है,जिससे साल भर पीने के पानी के रूप में काम लिया जाता है,यहाँ के पहाड़ों में औषधियों के भंडार है, जड़ी बूटियों के जानकर वैध रोगों के निदान में इनका उपयोग करतें है,
माँ मनसा के दरबार में आने का सबसे उपयुक्त समय सावन-भादवा है,यंहा पर पहुँचने के लिए सीधी उदयपुरवाटी व् गुढा से निजी बस सेवा उपलब्ध है| उदयपुरवाटी राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में सीकर,नीमकाथाना,कोटपुतली सड़क पर स्थित है|

मंदिर का विगंहम दृश्य


पहाड़ों के ऊपर से देखने पर मंदिर का दृश्य



लेखक :गजेन्द्र सिंह शेखावत

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