Maharani Jawahar Bai Rathore महारानी जवाहरबाई राठौड़

Maharani Jawahar Bai Rathore महारानी जवाहरबाई राठौड़
Maharani Jawahar Bai Rathore of Maharana Sanga, Chittorgarh

गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने चितौड़ के किले को अपनी असंख्य सेना के बल पर घेर रखा था। उस वक्त मेवाड़ की राजगद्दी पर मेवाड़ के इतिहास का सबसे कमजोर, अयोग्य, कायर, क्षुद्रमति, विलासी राणा विक्रमादित्य आसीन था। अपने सरदारों के साथ उसका व्यवहार व आचरण ठीक नहीं था, जिसकी वजह से ज्यादातर सामंत अपने अपने ठिकाने लौट गए व कुछ सामंत बहादुरशाह के पास चले गए। इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार ‘‘अपने छिछोरेपन के कारण वह सरदारों की खिल्ली उड़ाया करता था, जिससे वे अप्रसन्न होकर अपने अपने ठिकानों में चले गये और राज्यव्यवस्था बहुत बिगड़ गई।’’ ओझा के अनुसार ‘‘महाराणा के बुरे बर्ताव से अप्रसन्न होकर उसके सरदार नरसिंहदेव और मेदीनिराय (चंदेरी का) आदि बहादुरशाह से जा मिले।’’ इस तरह मेवाड़ के कई सरदार राणा के व्यवहार से आहत होकर अपनी मातृभूमि के साथ गद्दारी करते हुए बहादुरशाह को चितौड़ पर चढ़ा लाये।

महारानी कर्मवती ने इस विकट स्थिति में दिल्ली के बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया और सहायता का आग्रह किया। भारतीय संस्कृति में राखी के महत्त्व को समझते हुए हुमायूँ सहायता के लिए आगरा से चला, लेकिन ग्वालियर में उसे बहादुरशाह का सन्देश प्राप्त हुआ, जिसमें लिखा था कि वह हिन्दुओं के खिलाफ जेहाद कर रहा है। सो उसके जेहाद में अड़चन ना बने। बस फिर क्या था, राखी का महत्त्व पर जेहाद भारी पड़ा और हुमायूँ ग्वालियर से आगे नहीं बढ़ा।

हुमायूँ से सहायता की उम्मीद क्षीण होने के बाद महाराणी कर्मवती ने मेवाड़ के सरदारों से अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक भावुक पत्र के माध्यम से आव्हान किया। महारानी के आव्हान का परिणाम हुआ कि राणा विक्रमादित्य के व्यवहार से नाराज मेवाड़ के सरदारों के मन में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी। और वे अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ उत्सर्ग करने को वीरों की तीर्थस्थली चितौड़ आ पहुंचे। परिस्थिति की विकटता को देखते हुए विक्रमादित्य और उदयसिंह को सरदारों ने रक्षार्थ बूंदी भेज दिया और प्रतापगढ़ के महारावत बाघसिंह को युद्ध संचालन का भार सौंपा।

आखिर दोनों सेनाओं के मध्य घमासान युद्ध हुआ। मेवाड़ के वीर सैनिक दुश्मन की कई गुना बड़ी सेना को काटते हुए शहीद होते रहे। किले की कई प्राचीरें द्वारा विस्फोट से उड़ा दी गई। आखिर शत्रु सेना का किले में प्रवेश सफल होते देख राजपूत नारियों ने रानी कर्मवती के नेतृत्व में अपने सतीत्त्व की रक्षा हेतु जौहर करना तय किया। तभी महाराणा संग्रामसिंह की विधवा रानी जवाहरबाई राठौड़ की ललकार सुनाई दी। रानी ने क्षत्रिय नारियों का आव्हान किया- ‘‘वीर क्षत्राणियों ! जौहर करके हम केवल अपने सतीत्त्व की रक्षा ही कर पायेंगी, इससे हमारी मातृभूमि की रक्षा तो नहीं होगी। हमें मरना ही है तो चुपचाप जौहर की ज्वाला में कूद कर मरने की बजाय, समर भूमि में उतर कर अपनी तलवार का जौहर दिखाते हुए, दुश्मन का खून बहाकर मृत्यु का वरण कर अपने जीवन के साथ मृत्यु को भी सार्थक बनाया जाये।’’ और महारानी जवाहरबाई राठौड़ के आव्हान के बाद देखते ही देखते असंख्य राजपूत वीरांगनाएं हाथों में तलवार लेकर युद्धार्थ उद्धत हो गई।
मलेच्छ सेना ने देखा चितौड़ किले में जौहर यज्ञ की प्रचण्ड ज्वालाएँ आसमान छू रही है। वे जौहर की ज्वालाओं का रहस्य समझ पाते। तभी उन्हें किले के मुख्य द्वार की ओर से बहकर आ रहा आग का एक दरिया सा नजर आया। रानी जवाहरबाई के नेतृत्व में घोड़ों पर सवार, हाथों में नंगी तलवारें लिए, रणचंडी के रूप में, शत्रु सेना का खून पीकर अपनी प्यास बुझाने को, वीर वधुओं का एक काफिला रणघोष करते हुए, उनकी ओर बढ़ रहा था। थोड़ी ही देर में वीरांगनाओं के इस काफिले का शत्रु सेना पर कहर ढा रहा था। महारानी जवाहरबाई मर्दाना वस्त्र धारण किये, घोड़े पर सवार होकर शत्रु सेना से लोहा लेते, हुए अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ मोर्चे पर युद्ध करते वीरगति को प्राप्त हुई। इस तरह रानी अपने सतीत्त्व व स्वत्व की रक्षा के साथ मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग कर शौर्य का एक अनुपम व अद्भुत उदाहरण पेश कर गई।

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