राणा उदयसिंह

राणा उदयसिंह
Maharana Udai Singh History in Hindi, History of Maharana Udaisingh

उदय और विक्रमादित्य थे, सबका यश जागेगा रे ।
संघ ने शंख बजाया भैया सत्य जयी अब होगा रे ।

राणा उदयसिंह मेवाड़ के राणा साँगा के पुत्र थे। उदयसिंह का जन्म वि.सं. 1579 भाद्रपद शुक्ला 12 (ई.स. 1522) में हुआ था। उदयसिंह के बड़े भाई राणा विक्रमादित्य को मारकर साँगा के बड़े भाई पृथ्वीराज (उडना राजकुमार) की पासवान (अविवाहित पत्नी) का पुत्र बणवीर मेवाड़ का राणा बना। बणवीर उदयसिंह को भी मारना चाहता था। वह जानता था कि उदयसिंह के जीवित रहते वह चैन से मेवाड़ की गद्दी पर नहीं रह सकेगा। वह नंगी तलवार लेकर उदयसिंह को मारने के लिए चला, लेकिन पन्नाधाय ने उसे पहले ही महल के बाहर छुपाकर भेज दिया। पन्ना ने विश्वसनीय आदमियों के साथ उदयसिंह को महलों से निकाल लिया | उदयसिंह की आयु उस समय चौहद वर्ष की थी।

उदयसिंह को पन्ना सुरक्षित जगह पर ले गई, लेकिन बणवीर के डर से किसी भी सरदार ने उसे संरक्षण नहीं दिया। अन्त में वह उसे कुम्भलगढ़ लेकर गई। कुम्भलगढ़ में उदयसिंह गुप्त रूप से रहने लगे। थोड़े दिनों बाद यह बात फैल गई कि उदयसिंह जीवित है। रावत खान (कोठारिया) ने कुम्भलगढ़ पहुँचकर रावत साँईदास चूण्डावत (सलूम्बर), केलवा से जग्गा, बागौर से रावत साँगा आदि सरदारों को बुलाया। इन सरदारों ने उदयसिंह को मेवाड़ का स्वामी मानकर राजतिलक किया। यह घटना वि.सं. 1594 (ई.स. 1536) की है। अखैराज सोनगरा की पुत्री के साथ उदयसिंह का विवाह कर दिया गया । उदयसिंह को चित्तौड़ की गद्दी पर बैठाने का विचार होने लगा। मारवाड़ के राव मालदेव से सहायता की प्रार्थना की गई। मारवाड़ में अखैराज सोनगरा प्रमुख सरदार था, इसलिए राव मालदेव ने सैनिक सहायता भेजी। अखैराज सोनगरा और कुँपा महराजोत के नेतृत्व में राठौड़ों की सेना उदयसिंह की सहायता के लिए आई। इस प्रकार सेना एकत्र होने पर उदयसिंह कुम्भलगढ़ से चित्तौड़ की तरफ चले। बणवीर ने भी उदयसिंह की इस चढ़ाई के समाचार सुनकर अपनी सेना को कुंवरसी तंवर के साथ भेजी। दोनों सेनाओं में माहोली (मावली) के पास युद्ध हुआ। युद्ध में बणवीर की पराजय हुई और कुंवरसी तंवर बहुत से सैनिकों के साथ रणखेत रहा। फिर यह सेना चित्तौड़ की तरफ बढ़ी। इस बार बणवीर के नेतृत्व में युद्ध हुआ। बणवीर की पराजय हुई और वह परिवार सहित जान बचाकर दक्षिण में चला गया। इस प्रकार वि.सं. 1597 (ई.स. 1540) में उदयसिंह का चित्तौड़ में राज्याभिषेक हुआ।

अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए कूच किया। जब अकबर की चित्तौड़ पर चढ़ाई का समाचार शक्तिसिंह द्वारा मिला तो मेवाड़ के सरदारों ने युद्ध से निबटने के लिए एक परिषद बुलाई। इस परिषद में जयमल मेड़तिया, रावत साँईदास चूण्डावत, ईसरदास चौहाण, राव बल्ल सोलंकी, डोडिया साँडा, रावत साहिब खान, रावत पत्ता चूण्डावत, रावत नैतसी आदि सरदार उपस्थित हुए। उन्होंने राणा उदयसिंह को सलाह दी कि गुजरात के सुल्तान से लड़ते-लड़ते मेवाड़ कमजोर हो गया है और अकबर के पास बहुत बड़ी सेना है इसलिए आपको परिवार सहित पहाड़ों की तरफ चला जाना चाहिए। अब यही उचित है कि हम लोग किले में रहकर अकबर से लड़े और आप रणवास समेत पहाड़ों में चले जाएँ। इस सलाह पर उदयसिंह जयमल मेड़तिया और पत्ता चूण्डावत को सेनाध्यक्ष नियुक्त कर कुछ सरदारों के साथ मेवाड़ के पहाड़ों में चले गये। किले में आठ हजार राजपूत रहे।

अकबर ने किले पर घेरा डालकर आक्रमण किया। घेरा कई महिनों तक चला लेकिन दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार न हो सका। एक दिन आधी रात के समय जयमल मशाल लेकर दुर्ग की मरम्मत करवा रहे थे। अकबर ने अपनी ‘संग्राम’ नामक बन्दूक से निशाना लगाकर गोली चला दी। दुर्भाग्य से गोली जयमल जी के जाँघ पर लगी, वह घायल हो गये। रात में ही जौहर रचाया गया और सुबह दुर्ग के दरवाजे खोल दिए गए। भयंकर आक्रमण हुआ। राजपूत जब तक जिन्दा रहे तब तक किले में मुसलमानों का प्रवेश नहीं हो सका। एक-एक करके राजपूत वीर रणखेत होते रहे। इस तरह से यह अन्तिम निर्णायक युद्ध. दो दिन और एक रात लगातार बिना रुके हुआ। अन्त में वि.सं. 1624 चैत्र बदि 13 (ई.स. 1568 फरवरी 25) को दोपहर के समय अकबर का दुर्ग पर अधिकार हो सका। यह युद्ध चित्तौड़ का तीसरा शाका’ था। इस युद्ध में लगभग आठ हजार राजपूत काम आए और लगभग तीस हजार रय्यत (प्रजा) कत्लेआम में मारी गई।
चित्तौड़ छूटने के बाद राणा उदयसिंह ज्यादातर कुम्भलगढ़ में रहे। वि.सं. 1528 में वह कुम्भलगढ से गोगुन्दा में आये, बाद में बीमार होने के कारण वि.सं. 1528 (ई.स. 1572 फरवरी) में उनका देहान्त हुआ।

कई इतिहासकारों ने उदयसिंह पर कायरता का आरोप लगाया हैं। उदयसिंह का युद्ध से पहले दुर्ग छोड़कर पहाड़ों में जाना कायरता पूर्ण कृत्य मानते हैं। कई इतिहासकारों ने उसे शानदार वंश की नाजोगी की सन्तान कहा है लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करते हैं तो ये आरोप निराधार हैं। उदयसिंह ने युद्ध परिषद के निर्णय को शिरोधार्य किया था। इस युद्ध से पहले भी चित्तौड़ में दो शाके हो चुके थे, जिनके कारण चित्तौड़ का काफी विनाश हो चुका था। भौगोलिक परिस्थिति के कारण चित्तौड़ अजेय नहीं था। उदयसिंह बड़े बुद्धिमान शासक थे, जिन्होंने अकबर के युद्ध से लगभग आठ वर्ष पहले उदयपुर नगर की स्थापना कर ली थी, जो पहाड़ों में सुरक्षित जगह थी, जिसे मेवाड़ की राजधानी बनाया जा सकता था। चित्तौड़ दुर्ग खाली करने से पहले उन्होंने धन-सम्पति व जरूरी कागजात सुरक्षित जगह पर पहुँचा दिए थे।

उदयसिंह कायर राजा नहीं थे, क्योंकि इस युद्ध से पहले भी उन्होंने कई युद्ध लड़े थे। वह मेवाड़ का राणा बने तब भी उन्होंने युद्ध किया था। राव मालदेव ने कुम्भलगढ़ पर आक्रमण किया तब उदयसिंह ने कुम्भलगढ़ पर मालदेव का अधिकार नहीं होने दिया। मालदेव से हरमाड़ा में भी युद्ध किया था। राव मालदेव कमजोर शासक नहीं थे। वह अपने समय के शक्तिशाली राजा थे। विक्रमादित्य के समय जो क्षेत्र दूसरों के अधिकार में चला गया था, उसे भी उदयसिंह ने छीना था। सामरिक दृष्टि से सुरक्षित स्थान गोगून्दा को उदयसिंह ने अपनी नई राजधानी बनाई।

नैणसी ने उदयसिंह को ‘महाप्रतापशाली राजा’ तथा ‘उग्र तेज वाला’ कहा है। वह राणा प्रताप का पिता होने के कारण ही प्रसिद्ध नहीं थे, वरन स्वतन्त्र रूप से उन्होंने गौरव अर्जित किया था। अपने प्रयत्न और यश से अपने प्रतापी पुत्र राणा प्रताप का मार्ग प्रशस्त किया था। केवल चित्तौड़ में बैठकर लड़ने से उन्होंने यह अच्छा समझा कि बाहर रहकर मेवाड़ के दूसरे गढ़ों को सुदृढ़ किया जाए। जब एक बड़ी सेना से दुर्ग घिर जाता है तो लड़कर मारे जाने या अधीनता स्वीकार करने के सिवा दूसरा कोई चारा ही नहीं रह जाता है।

उदयसिंह ने युद्ध की एक नई नीति अपनाई जिसे छापामार नीति कहते हैं। इस नीति का अनुसरण राणा प्रताप और राणा अमरसिंह ने किया था। उदयसिंह ने जो सम्पति सुरक्षित रखी थी उसके बल पर राणा प्रताप और अमरसिंह ने मुगलों से मुकाबला किया था। राणा प्रताप और अमरसिंह को सैनिक खर्चे के लिए कोई कमी नहीं थी। अमरसिंह ने जब शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) से सन्धि की थी, उस समय अमरसिंह ने एक कण्ठा भेंट किया था, उस समय उस लाल के कण्ठे की कीमत साठ हजार रूपए थी। चित्तौड़ से दूर पहाड़ों में सुरक्षित प्रदेश में उदयपुर नगर बसा कर उसने दूरदर्शिता का परिचय दिया। आने वाले समय में उदयपुर मेवाड़ की राजधानी बना।

लेखक : छाजू सिंह, बड़नगर

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