क्या हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप के पास धन की कमी थी ?

क्या हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप के पास  धन की कमी थी ?

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद स्वंतन्त्रता के पुजारी, आन-बान के प्रतीक, दुश्मन के आगे सिर ना झुकाने वाले महाराणा प्रताप मेवाड़ राज्य को मुगलों से आजाद कराने के लिए पहाड़ों में चले गये और वहां से मुग़ल सेना पर छापामार आक्रमण जारी रखा| कर्नल टॉड जैसे कुछ इतिहासकारों ने इस एक युद्ध के बाद ही महाराणा की आर्थिक हालात कमजोर आंक ली और कई मनघडंत कहानियां लिख दी| कर्नल टॉड ने लिखा “शत्रु को रोकने में असमर्थ होने के कारण उस (प्रताप) ने अपने चरित्र के अनुकूल एक प्रस्ताव किया और तदनुसार मेवाड़ एवं रक्त से अपवित्र चितौड़ को छोड़कर सिसोदिया को सिन्धु के तट पर ले जाकर वहां की राजधानी सोगड़ी नगर में अपना लाल झंडा स्थापित करने एवं अपने तथा अपने निर्दय शत्रु (अकबर) के बीच रेगिस्तान छोड़ने का निश्चय किया| वह अपने कुटुम्बियों और मेवाड़ के दृढ और निर्भीक सरदारों आदि के साथ, जो अपमान की अपेक्षा स्वदेश निर्वासन को अधिक पसंद करते थे,अर्वली पर्वत से उतरकर रेगिस्तान की सीमा पर पहुंचा| इतने में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उसको अपना विचार बदलकर अपने पूर्वजों की भूमि में रहना पड़ा| यद्यपि मेवाड़ की ख्यातों में असाधारण कठोरता के कामों का उल्लेख मिलता है तो भी वे अद्वितीय राजभक्ति के उदाहरणों से खाली नहीं है| प्रताप के मंत्री भामाशाह ने, जिसके पूर्वज बरसों तक इसी पद पर नियत रहे थे, इतनी सम्पत्ति राणा को भेंट कर दी कि जिससे पच्चीस हजार सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह हो सकता था| भामाशाह मेवाड़ के उद्धारक के नाम से प्रसिद्ध है|” (टॉड; राजस्थान; जिल्द.1, पृष्ट.402-3)

महाराणा के वित्तमंत्री भामाशाह द्वारा सम्पत्ति भेंट की बात लिखकर टॉड ने यह भ्रम फैला दिया कि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा की आर्थिक दशा ख़राब हो गई और भामाशाह की भेंट या जैसा कि भामाशाह के दान के बारे में प्रचारित है से महाराणा ने अकबर के साथ युद्ध जारी रखा| कर्नल टॉड की इस कहानी को राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा आदि कई इतिहासकार मात्र कल्पित कथा समझते है| वैसे भी ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि किसी भी राजा की मात्र एक युद्ध में कभी आर्थिक दशा नहीं बिगड़ती| महाराणा प्रताप के पूर्वजों यथा महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा आदि ने मेवाड़ के खजाने में अथाह धन जमा किया था और वह धन महाराणा को यथावत मिला था| हाँ यह बात हम स्वीकार करते है कि महाराणा को स्वयं के शासन में धन संग्रह का मौका मिला नहीं मिला, लेकिन यह तथ्य कपोल कल्पित है और सवर्था झूंठ है क्योंकि नवीन ऐतिहासिक शोधों से यह बात प्रमाणित है कि महाराणा के पास अकूत धन था और धन की कमी के कारण उनके स्वदेश छोड़ने कर अन्यत्र बसने का विचार एकदम निर्मूल है| कर्नल टॉड जैसे इतिहासकारों द्वारा इस तरह की भ्रान्ति फैलाई गई है|

ओझा जी के अनुसार “प्रतापी महाराणा कुम्भकर्ण और संग्राम सिंह ने दूर-दूर तक विजय कर बड़ी समृद्धि संचित की थी| चितौड़ पर महाराणा विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह की दो चढ़ाइयाँ हुई और महाराणा उदयसिंह समय बादशाह अकबर ने आक्रमण किया| बहादुरशाह की पहली चढ़ाई के पूर्व ही राज्य की सारी सम्पत्ति चितौड़ से हटा ली गई थी, जिससे बहादुरशाह और अकबर में से एक को भी चितौड़ विजय करने पर कुछ भी द्रव्य न मिला| यदि कुछ भी हाथ लगता तो अबुल-फज़ल जैसा खुशामदी लेखक तो राई का पहाड़ बनाकर उसका बहुत कुछ वर्णन अवश्य करता, परन्तु फ़ारसी तवारीखों में कहीं भी उसका उल्लेख न होना इस बात का प्रमाण है कि मेवाड़ की संचित सम्पत्ति का कुछ भी अंश उनके हाथ न लगा और वह ज्यों का त्यों सुरक्षित रही|

चितौड़ छूटने के बाद महाराणा उदयसिंह को तो सम्पत्ति एकत्र करने का कभी अवसर नहीं मिला| उसके पीछे महाराणा प्रतापसिंह मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा, जो बहुधा उम्रभर मेवाड़ के विस्तृत पहाड़ी प्रदेश में रहकर अकबर से लड़ता रहा| प्रतापसिंह के पीछे उसका ज्येष्ठ कुंवर अमरसिंह मेवाड़ का स्वामी हुआ| वह भी लगातार अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए अपने पिता प्रताप का अनुकरण कर अकबर और जहाँगीर का मुकाबला करता रहा|

महाराणा प्रतापसिंह और अमरसिंह के समय मुसलमानों से लगातार लड़ाइयाँ होने के कारण चतुर मंत्री भामाशाह राज्य का खजाना सुरक्षित स्थानों पर गुप्त रूप से रखवाया करता था, जिसका ब्यौरा वह अपनी एक बही में रखता था| उन्हीं स्थानों से आवश्यकतानुसार द्रव्य निकालकर वह लड़ाई का खर्च चलाता था| अपने देहांत से पूर्व उसने उपर्युक्त बही अपनी स्त्री को देकर कहा था कि इसमें राज्य के खजाने का ब्यौरेवार विवरण है, इसलिए इसको महाराणा के पास पहुंचा देना|

ऐसी दशा में यह कहना अनुचित न होगा कि चितौड़ का किला मुसलमानों के हस्तगत होने के पीछे तो मेवाड़ के राजाओं को सम्पत्ति एकत्र करने का अवसर ही नहीं मिला था| वि.स. 1671 में महाराणा अमरसिंह ने बादशाह जहाँगीर के साथ संधि की उस समय शहजादा खुर्रम से मुलाक़ात करने पर एक लाल उसको नजर किया, जिसके विषय में जहाँगीर अपनी दिनचर्या में लिखता है- “उसका मूल्य 60000 रूपये और तौल आठ टांक था| वह पहले राठौड़ों के राजा राव मालदेव के पास था| उसके पुत्र चंद्रसेन ने अपनी आपत्ति के समय उसे राणा उदयसिंह को बेच दिया था| वि.स. 1673 में शहजादा खुर्रम दक्षिण को जाता हुआ मार्ग में उदयपुर ठहरा| उस प्रसंग में बादशाह जहाँगीर अपनी दिनचर्या में लिखता है-“राणा ने शहजादे को 5 हाथी, 27 घोड़े और रत्नों तथा रत्नजड़ित जेवरों से भरा एक थाल नजर किया, परन्तु शहजादे ने केवल तीन घोड़े लेकर बाकी सब चीजें वापस कर दी| जहाँगीर के इन कथनों से महाराणा अमरसिंह के समय की मेवाड़ की सम्पत्ति का कुछ अनुमान पाठक कर सकेंगे| यदि महाराणा प्रताप के पास कुछ भी सम्पत्ति नहीं होती, तो उनका पुत्र महाराणा अमरसिंह संधि के समय इतने रत्नआदि कहाँ से प्राप्त कर सकता था|” (उदयपुर राज्य का इतिहास, भाग-1, पृष्ठ-400-1)

महाराणा प्रताप के बाद अमरसिंह द्वारा संधि के समय भेंट आदि में सम्पत्ति का प्रयोग और उसके बाद उनके पुत्र महाराणा कर्णसिंह के गद्दी के बैठने के बाद उसके द्वारा उजड़े मेवाड़ को वापस आबाद करने पर काफी धन खर्च किया गया| कर्णसिंह के बाद महाराणा जगतसिंह जो काफी उदार प्रवृति के माने जाते है ने उदयपुर ने लाखों रूपये खर्च कर जगन्नाथ मंदिर बनवाया, उसकी प्राण प्रतिष्ठा पर लाखों खर्च किये| एकलिंगनाथ मंदिर में रत्नों का तुलादान किया| एक करोड़ पचास लाख से ज्यादा रूपये खर्च कर राजसमुद्र तालाब बनवाया और कितने ही तुलादान किये| महाराणा जगतसिंह की दानशीलता इतिहास में प्रसिद्ध है|

ऊपर दिए खर्च के कुछ उदाहरणों से साफ़ जाहिर है कि बेशक महाराणा उदयसिंह, प्रताप और अमरसिंह को सम्पत्ति संचय का मौका ना ना मिला हो पर उनके पास सम्पत्ति की कभी कोई कमी नहीं रही| अतएव यह कहना अप्रसांगिक नहीं होगा कि यह सारी सम्पत्ति महाराणा कुंभा और सांगा की संग्रह की हुई थी जो महाराणा प्रताप के समय उनके मंत्री भामाशाह के उचित प्रबंधन में ज्यों कि त्यों विद्यमान थी| कर्नल टॉड ने सुनी सुनाई बातों के आधार जो कल्पित कहानियां लिख दी उन कहानियों ने महाराणा के पास के धन की कमी और भामाशाह द्वारा दान की भ्रान्ति फैला दी, जबकि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी महाराणा के पास सिर्फ जरुरत की ही नहीं बल्कि अकूत सम्पत्ति का संग्रह विद्यमान था|

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