महाराणा हम्मीर सिसोदिया, मेवाड़ (1336ई.)

Maharana Hammir Sisodia, Mewar
अलाउदीन खिलजी द्वारा सारे उत्तरी भारत की आधीन कर लिए जाने से भारतीयों में निराशा आ गई थी । 1303 ई. में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ जीत लिया था । इस देश की रक्षा के युद्ध में मेवाड़ के गुहिलवंश की वरिष्ठ शाखा जिसका राज्य चित्तौड़ पर था और जिसकी उपाधि रावल थी, का अन्त हो गया था ।
गुहिलवंश की कनिष्ठ शाखा जिसका राज्य हल्दीघाटी खमनौर के पास सिसौदा पर था और जिनकी उपाधि राणा थी के राणा लक्ष्मण सिंह भी अपने सात राजकुमारों सहित अलाउद्दीन की सेना से 1303 ई. में लड़कर काम आ गए थे । राणा लक्ष्मण सिंह के पुत्र अरिसिंह के पुत्र हम्मीर हुए जो अपने चाचा अजयसिंह की मृत्यु के बाद सिसौदा के राणा बने औरकेलवाड़ा को केन्द्र बना कर अपनी शक्ति बढ़ाने लगे । सिसौदा के शासक होने के कारण वे सिसौदिया कहे जाने लगे ।

1336 ई. में उन्होंने चित्तौड़ को दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद तुगलक के करद शासक वणबीर चौहान से लड़कर मुक्त करा लिया था । इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दिल्ली के सुल्तान की सेना ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया और सिंगोली के युद्ध में वह हार कर भाग गई ।

चित्तौड़ से प्राप्त महावीर प्रसाद की प्रशस्ति 1438 ई. के अनुसार हम्मीर ने तुरूष्कों (तुर्क मुसलमानों) को परास्त किया था । इस विजय पर हम्मीर को “विषमशील पंचानन” कहा गया । यह वही समय था जब कर्नाटक में राजा कृष्ण देवराय ने विजय नगर के हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी|

संदर्भ : राजेन्द्र सिंह राठौड़ बीदासर की पुस्तक “राजपूतों की गौरवगाथा” से साभार

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