राजा मानसिंह जोधपुर

राजा मानसिंह जोधपुर

जोधपुर के महाराजा मानसिंह का जन्म माघ शुक्ला ११ वि.स.१८३९, १३ फरवरी सन १७८३ को हुआ था| ये जोधपुर के तत्कालीन महाराजा विजय सिंह के पांचवे पुत्र गुमान सिंह के पुत्र थे| छ: वर्ष की छोटी आयु में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था तथा इनके पिता भी ३० वर्ष की अल्पायु में ही चल बसे थे| माता की मृत्यु के मानसिंह का लालन-पालन उनके पितामह राजा विजय सिंह की पासवान गुलाबराय ने बड़े लाड-प्यार से किया| राजा विजय सिंह पर पासवान गुलाबराय का बहुत ज्यादा असर था वे उसकी हर बात मानते थे, गुलाबराय चाहती थी कि राजा विजय सिंह अपने सबसे छोटे पुत्र शेरसिंह को अपना उतराधिकारी बनाये जो कि राजपूत कुल में चली आ रही परम्पराओं व नियम विरुद्ध था| और यही उतराधिकार की बात आगे चलकर जोधपुर राजघराने में बड़े बड़े षड्यंत्रों व पारिवारिक संघर्ष का कारण बनी और इसके चलते जोधपुर राजघराने के बहुत से सदस्य कालकलवित हुए|

नियमानुसार राजा विजय सिंह के बड़े बेटे के पुत्र भीमसिंह को उतराधिकार मिलना था पर गुलाबराय द्वारा शेरसिंह को उतराधिकारी बनाने की मुहीम के चलते विजय सिंह के पोत्र भीमसिंह ने उतराधिकार से वंचित रहने की आशंका के चलते महाराजा विजय सिंह की अनुपस्थिति में वि.स. १८४९ में जोधपुर किले पर कब्ज़ा कर अपने आपको जोधपुर का महाराजा घोषित कर दिया| इस स्थिति में मानसिंह अपने चाचा शेरसिंह के साथ भीमसिंह से सुरक्षित रहने के लिए जालौर किले में चले गए|

भीम सिंह के किले पर कब्ज़ा करने के बाद जोधपुर के सामंतों द्वारा विजयसिंह के बाद उसे जोधपुर की गद्दी मिलने का आश्वासन और सिवाना की जागीर मिलने के बाद किले पर कब्ज़ा छोड़ दिया|

आषाढ़ शुक्ला ३ वि.स.१८५० में विजय सिंह की मृत्यु के बाद भीमसिंह का आषाढ़ शुक्ला १२ वि.स. १८५० को पुन: जोधपुर की राजगद्दी पर राज्याभिषेक किया गया| इसके बाद मानसिंह पुन: जालौर किले में चले गए| उन्हें पालने वाली पासवान गुलाबराय की वि.स.१८४९ में ही एक षड्यंत्र के तहत हत्या कर दी गयी थी|

मानसिंह के जालौर किले में जाने के बाद पोकरण के ठाकुर सवाईसिंह ने राजा भीमसिंह को उनके खिलाफ भड़का दिया जिसके परिणाम स्वरूप भीमसिंह ने मानसिंह को मारने के लिए जालौर किले पर चढ़ाई के लिए सेना भेज दी और जोधपुर की सेना के साथ मानसिंह का लगभग बारह वर्ष तक संघर्ष चलता रहा जोधपुर की सेना द्वारा इतने लम्बे समय तक जालौर दुर्ग को घेरने के उपरांत मानसिंह सैनिक समस्या के साथ आर्थिक व खाद्य सामग्री की समस्या से लगातार झुझते रहे|

पोकरण के ठाकुर सवाईसिंह ने अपने जीते जी जोधपुर राजपरिवार में आपसी संघर्ष को कभी ख़त्म नहीं होने दिया| दरअसल सवाईसिंह के पिता व दादा की जोधपुर के राजा विजयसिंह ने हत्या करवाई थी सो सवाईसिंह उसकी बदला अपनी छद्म कूटनीति से ले रहा था वह चाहता था कि जोधपुर राजपरिवार इसी तरह आपसी संघर्ष में नेस्तनाबूद हो जाय|

आखिर कार्तिक शुक्ला ४ वि.स. १८६० में भीमसिंह की मृत्यु हो गयी तब राजपरिवार के जीवित बचे सदस्यों में राजगद्दी का अधिकार मानसिंह का बनता था सो जोधपुर के जिस सेनापति इंद्रराज सिंघवी ने मानसिंह को मारने के लिए जालौर दुर्ग घेर रखा था ने खुद ही दुर्ग में जाकर मानसिंह को भीमसिंह की मृत्यु का समाचार देते हुए उन्हें जोधपुर किले में चलकर शासन सँभालने हेतु आमंत्रित किया|

सेनापति इंद्रराज सिंघवी व ठाकुर सवाईसिंह के बीच अच्छी मित्रता थी दोनों आपस में धर्म भाई बने हुए थे और जोधपुर की शासन व्यवस्था में दोनों का ही तब तगड़ा दखल था| सवाईसिंह के साथ इंद्रराज सिंघवी की मित्रता होने के चलते मानसिंह अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं थे उन्हें किसी षड्यंत्र की आशंका थी सो मानसिंह ने जोधपुर के तत्कालीन सबसे शक्तिशाली सामंत आउवा के ठाकुर माधोसिंह को जालौर किले में बुलवाया और अपने काव्य रूपी शब्दों से उनका मन जीत लिया और तब पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद जोधपुर किले में आकर सत्ता संभाली|

पर तभी सवाई सिंह ने एक धुंकलसिंह नामक बच्चे को यह कहकर कि भीम सिंह मरते समय इसे गर्भ में छोड़ गए थे उतराधिकार के लिए आगे कर दिया| मानसिंह ने उसकी जांच पड़ताल करवा तब यह साबित हुआ कि ये सब सवाईसिंह की चाल है| और उसके बाद मानसिंह का जोधपुर राज्य की राजगद्दी पर माघ शुक्ला ५, वि.स.१८६० में राज्याभिषेक हुआ| मानसिंह ने जोधपुर राज्य पर चालीस वर्षों तक शासन किया पर अपने पुरे शासन काल में वे कभी चैन से नहीं बैठ सके| गृह कलेश व सवाईसिंह के षड्यंत्रों के चलते हमेशा उन्हें मारने की योजनाएं बनती रहती थी कभी भोजन में जहर देकर, कभी उनके बिस्तरों में सांप, बिच्छु आदि छोड़कर| मानसिंह को इन षड्यंत्रों से हमेशा सजग रहना होता था और षड्यंत्रकारियों को पकड़ने के बाद वे उन्हें कड़ी सजा दिए करते थे इन सजाओं में जिंदा किले से फैंक देना, तोप के आगे खड़ाकर उड़ा देना, जहर पीने के लिए विवश कर देना, हाथियों के पैरो तले कुचलवा देना, आम तरीके थे| आज भी मानसिंह की कठोर व निर्दयी दंड प्रणाली के किस्से लोक कथाओं में सुनने पढने को मिल जातें है| अपने खिलाफ षड्यंत्रों में शामिल अपने कई परिजनों को भी मानसिंह ने जिंदा नहीं छोड़ा था|

जैसा की ऊपर बताया जा चूका है मानसिंह अपने जीवन काल में कभी चैन से नहीं बैठ पाये| बाल्यकाल से ही गृह कलेश के चलते षड्यंत्रों व लड़ाई झगड़ों में उलझे रहे| चाहे वह जालौर दुर्ग में रहते हुए भीमसिंह द्वारा डाले घेरे में रहें हो या फिर जोधपुर के राजा बनने के बाद परिजनों, सामंतों के षड्यंत्र से बचने के संघर्ष में रहें हो उनका पूरा जीवन संघर्षमय ही रहा| और शायद इन षड्यंत्रों का ही नतीजा था कि उनकी दंड प्रक्रियाएं कठोर व निर्दयी रही| दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के लिए मानसिंह का एक सिद्धांत था वे कहते थे कि- “दोनों हाथों को शहद में डुबोकर उन्हें तिलों में दबा दो तब जितने तिल हाथों पर चिपकेंगे उतने ही तरीकों के धोखे यदि शत्रु को मारने के लिए करने पड़े तो कम है|”इतना होने के बावजूद राजा मानसिंह के व्यक्तित्व के इसके विपरीत एक तत्व या गुण और था जिसे जानने के बाद उनके विरोधाभासी स्वभाव का पता चलता है| कोई भी व्यक्ति भरोसा नहीं कर सकता कि इतना कठोर, निर्दयी, क्रूर शासक इतना धार्मिक, दयालु, दानी,कला व विद्याप्रेमी, उच्च कोटि का कवि साहित्यकार भी हो सकता है, राजस्थान का ऐसा कोई साहित्यकार या साहित्य में रूचि रखने वाला व्यक्ति नहीं होगा जो राजा मानसिंह के द्वारा की गयी साहित्य साधना व साहित्य के लिए किये कार्य को नहीं जानता होगा| मानसिंह ने अपने अच्छे व बुरे दोनों समय में कवियों, कलाकारों, साहित्यकारों को पूर्ण संरक्षण दिया| जालौर दुर्ग में घिरे रहने के कठिन समय में भी उनके पास उच्च कोटि के कई कवि साथ थे| यही नहीं मानसिंह खुद बहुत अच्छे कवि थे| उन्होंने हर मौके पर काव्य के माध्यम से ही अपने सुख, दुःख आदि को अभिवक्त किया|

मानसिंह ने लगभग साठ पुस्तकें लिखी, जोधपुर के किले में “पुस्तक प्रकास” नाम से पुस्तकालय की स्थापना की, कई लेखकों की रचनाओं व प्रतियों को कलमबद्ध कर सुरक्षित करवाया| “गुणीजन सभा” नाम से राजा ने एक सभा भी बना रखी थी जिसकी हर सोमवार रात्री को सभा होती थी जिसमें कवि, गायक, कलाकार, पंडित आदि सभी अपनी अपनी विद्या का प्रदर्शन करते थे साथी पंडितों के बीच शास्त्रार्थ होता था जिसमे राजा खुद भाग लेते थे|

राजा मानसिंह पर अपनी शोध पुस्तक “महाराजा मानसिंह जोधपुर” में डा.रामप्रसाद दाधीच लिखते है- ” मानसिंह की प्रकृति और स्वभाव का विश्लेष्ण करते समय हमें उनके जीवन और व्यक्तित्व के स्पष्टत: दो पृथक पक्षों को स्मरण रखना पड़ेगा| उनके जीवन का एक पक्ष है- राजा और शासक के रूप में वे कठोर, निर्दय,क्रूर और कूटनीतिज्ञ दिखाई देते है| उनके शासकीय जीवन की ऐसी अनेक घटनाओं का इतिहास ग्रन्थों में उल्लेख हुआ है| जिनसे यह सहसा धारणा बनती है कि जो व्यक्ति इतना अमानवीय है, वह इतना उच्च कोटि का भक्त और कवि कैसे हो सकता है?”

मानसिह के आचरण के रूप है- एक उनका प्रतिकारी हिंसक रूप और दूसरा है प्रशंसा और आभार पदर्शन का रूप| इसीलिए लोक में मानसिंह की “रीझ और खीझ” प्रसिद्ध है| जिस पर अप्रसन्न हो गए फिर उसके अस्तित्व को ही मिटा दिया और जिस पर मुग्ध हो गए उसे आकाश पर बिठा दिया”

अपने संघर्ष पूर्ण जीवन में शिक्षा ग्रहण करने के लिए परिस्थितियां अनुकूल ना होने के बावजूद मानसिंह ने ज्ञानार्जन का मोह नहीं छोड़ा, समय निकालकर उन्होंने कवियों,पंडितों आदि के साथ कई भाषाओँ व विषयों यथा- धर्म शास्त्र, कुरान, पुराण, ज्योतिष, आयुर्वेद, साहित्यशास्त्र, संगीत शास्त्र आदि का अध्ययन किया|

मानसिंह की विद्वता पर कर्नल टॉड अपनी पुस्तक Tod Volume-1- Page- 562 लिखते है- “हमारे वार्तालाप के मध्य मुझे इनकी बुद्धिमत्ता के प्रभावक प्रमाण प्राप्त हुए है| इन्हें ण केवल अपने प्रदेश का अपितु सम्पूर्ण भारत के अतीतकालीन इतिहास का सूक्ष्म ज्ञान है| इनका अध्ययन विशद है|”

Tod Volume-1- Page-561 पर कर्नल टॉड लिखता है- ” मानसिंह का जीवनवृत मानवीय, सहिष्णुता, साहस और धैर्य का एक ऐसा उदाहरण है जो अन्य किसी देश और युग में कठिनाई से मिलता है किन्तु विपदाओं की निरंतर अनुभूतियों ने उसे भी निर्दयी बना दिया| उसमें सिंह का भयंकर क्रोध ही नहीं था अपितु इससे भी घातक उसकी चालाकी भी उसमें थी|”

कर्नल टॉड जैसे प्रत्यक्ष इतिहासकार जो मानसिंह से प्रत्यक्ष मिला था जिसकी मानसिंह से अच्छी मित्रता थी के उपरोक्त कथन से सिद्ध होता है कि- मानसिंह में सहिष्णुता, साहस,धैर्य आदि मानवीय गुण थे किन्तु तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियां और षड्यंत्रों ने उन्हें क्रूर बना दिया|

राजा मानसिंह ने अंत:बाह्य परिस्थितियां अपने अनुकूल न होने के बावजूद अपने स्वाभिमान को खंडित होने से बचाने के लिए उदयपुर महाराणा भीमसिंह, जयपुर नरेश जगतसिंह से पूरी टक्कर ली व कभी झुके नहीं| मानसिंह द्वारा अपने स्वाभिमान के लिए की गयी जिद के कारण ही उदयपुर की राजकुमारी कृष्णाकुमारी को जहरपान करना पड़ा| अंग्रेजों से भी संधि करने के बावजूद वे कभी दबे नहीं|

  • धार्मिक आस्था :

मानसिंह की धर्म में गहरी आस्था थी| नाथ सम्प्रदाय के आयास देवनाथ उनके धर्म गुरु थे| मानसिंह ने जालौर किले में जोधपुर सेना द्वारा लम्बी घेराबंदी के बाद जब धन व रसद एकदम खत्म हो गयी तो निराश होकर आत्म समर्पण का निश्चय किया तब उनके धर्म गुरु देवनाथ ने उन्हें समर्पण करने से यह कहते हुए रोका कि- चार दिन रुक जाईये परिस्थितियां आपके अनुकूल होंगी|”

और चार दिन के भीतर ही जोधपुर महाराजा भीमसिंह का निधन हो गया और जोधपुर की राजगद्दी मानसिंह को मिल गयी| इसके बाद तो मानसिंह की नाथ सम्प्रदाय और अपने धर्म गुरु में आस्था अंधभक्ति के स्तर तक पहुँच गयी| जोधपुर आने के बाद मानसिंह देवदास को जोधपुर ले आये और उनके लिए महामंदिर नामक धर्मस्थल बनवाया| सत्ता का आश्रय पाकर जब नाथ धर्म गुरुओं ने जोधपुर में आतंक मचाया तब उनसे दुखी होकर जोधपुर के सामंतों ने मीरखां पिंडारी के हाथों षड्यंत्र रचकर देवदास को मरवा दिया| क्योंकि राजा मानसिंह नाथों के खिलाफ कुछ भी सुनने को राजी नहीं थे| वे उनकी अंधभक्ति में फंस चुके थे| और राज्य का बहुत सा धन नाथ योगियों पर खर्च डालते थे|

  • स्वतंत्र्य प्रेम :

राजा मानसिंह के देशप्रेम व स्वतंत्र्य प्रेम पर डा.रामप्रसाद दाधीच अपनी शोध पुस्तक “महाराजा मानसिंह जोधपुर’ के पृष्ठ संख्या 58 पर लिखते है -” मानसिंह के व्यक्तित्व की एक विशेषता उनके स्वतंत्र्य प्रेम और देशभक्ति को लेकर भी है| भारतवर्ष में ईस्ट इंडिया कम्पनी और अंग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर वे बहुत क्षुब्ध थे| देश का चतुर्दिक राजनैतिक वातावरण ऐसा था कि वे अपनी देशभक्ति, स्वतंत्र्य प्रेम और ब्रिटिश विरोध को प्रत्यक्षत: अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे| अपने राज्य की आंतरिक परिस्थितियों के कारण उन्हें विवश होकर अंग्रेजों से वि.स. १८६० पौष शुक्ला को संधि भी करनी पड़ी किन्तु शर्तों के ऊटपटांग होने के चलते मानसिंह ने उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया| वि.स. १८७४ में छतरसिंह के शासनकाल के समय पुन: अंग्रेजों से संधि हुई किन्तु मानसिंह ने कभी अंग्रेजों को कर नहीं चुकाया और उनके हस्तक्षेप को अपने आंतरिक शासन में कभी सहन ही नहीं किया|”

अंग्रेजों के दो बड़े शत्रु जसवंतराव होल्कर और नागपुर के अप्पाजी भोंसले को अंग्रेजों से हारने पर अंग्रेजों के विरोध के बावजूद मानसिंह ने अपने यहाँ शरण दी व सहायता दी| साथ ही वि.स. १८८८ में लार्ड विलियम बैटिक द्वारा अजमेर में आयोजित दरबार का मानसिंह ने बहिष्कार किया| अपने खिलाफ प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने के चलते मानसिंह को अंग्रेजों से संधि तो करनी पड़ी पर वे जिंदगीभर अंग्रेजों को छकाते और तबाह करते रहे|

मानसिंह के स्व्तान्त्र्यप्रेम पर इतिहासकार नाथूराम खडगावत अपनी पुस्तक “Rajasthan Roles in the Struggle” में लिखते है- “पूर्व ग़दर युग में महाराजा मानसिंह ही अकेले शासक थे जिन्होंने ब्रिटिश-शक्ति के हस्तक्षेप का भयंकर प्रतिरोध किया और अपने समय के अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति करने वालों को अपना हार्दिक सहयोग दिया|”

इतिहासकारों का मानना है कि यदि मानसिंह के राज्य की आंतरिक व्यवस्था उनके अनुकूल होती और सभी सामंत-सरदार उनका साथ देते तो शायद नक्शा कुछ और ही होता| भारत के उस वक्त के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह से भी मानसिंह की बहुत अच्छी मित्रता थी| मार्गशीर्ष शुक्ला १२, वि.स. १८७९ में महाराजा रणजीतसिंह ने राजा मानसिंह को एक पत्र में लिखा-

“We do not know any one else in HIndustan except your noble-self who can stand for his religion and words and for this sake we have sent this special messanger with the letter. We hope you will give us the best advice for the protection of Hindustan which will be followed upon.”

  • परिवार :

राजा मानसिंह ने कुल तेरह विवाह किये थे साथ ही इनकी छ: उपपत्नियाँ (पासवान) भी थी| इनकी रानियों से आठ पुत्र और दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुई जिनमें एक पुत्र छत्रसिंह व दो पुत्रियों को छोड़ सभी अल्पायु में ही कालकलवित हो गए थे| इकलौते पुत्र छत्रसिंह को भी इनके षड्यंत्रकारी सामंतों ने १७ वर्ष की आयु में ही युवराज का पद दिलवा शासन व्यवस्था उसके हाथों में दिलवा दी| और उसे कुसंग्तियों यथा नशा, विलासिता आदि में डाल दिया जिसकी वजह जल्द ही उसकी भी मृत्यु हो गयी|
षड्यंत्रों में इतने परिजनों को खोने के बाद यह राजा मानसिंह के लिए एक बड़ा आघात था |

  • अंतिम समय :

जीवनभर चले षड्यंत्रों में स्वजनों को खोने के बाद एक मात्र पुत्र को खोने व अपने धर्म गुरु नाथों की हत्या व गिफ्त्तारियों के बाद मानसिंह का जीवन व शासन के प्रति मोह भंग हो गया और उन्होंने सन्यास ले लिया वे विक्षिप्तों की तरह इधर उधर घुमने लगे, भोजन करना छोड़ दिया, शरीर पर राख लगा ली और जोधपुर के ही निकट पाल गांव चले गए और वहां से जालौर चले गए इसी दरमियान उन्हें बुखार रहने लगा| पोलिटिकल एजेंट लाडलो को जब यह बात पता चली तो वह उन्हें किसी तरह शासन व्यवस्था बिगड़ने की दलील देकर वापस लाया और वे जोधपुर आकर राइका बाग़ में आकर ठहर गए जहाँ से स्वस्थ्य गिरने के बाद वे मंडोर चले गए और मंडोर में ही भाद्रपद शुक्ला, ११ वि.स. १९०० को इनका निधन हो गया|

मंडोर जोधपुर से कुछ किलोमीटर दूरमंडोर जोधपुर बसने से पहले मारवाड़ राज्य की प्राचीन राजधानी थी| आज वहां कुछ खण्डहरों के अलावा एक बहुत बड़ा बगीचा है जिसमें संग्रहालय व जोधपुर के दिवंगत नरेशों की याद में देवल (स्मारक) बने है जो दर्शनीय है और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है|

21 Responses to "राजा मानसिंह जोधपुर"

  1. Rajput   March 24, 2013 at 2:40 am

    सच मे राजा मानसिंह का जीवन बहुत ही उतार चढ़ाव वाला रहा है , जीवनभर संघर्ष के बाद अंतिम दिनो मे इकलौते पुत्र की मौत ने बिलकुल तोड़ दिया।

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  2. प्रवीण पाण्डेय   March 24, 2013 at 3:14 am

    संघर्षों से भरा जीवन..

    Reply
  3. पूरण खण्डेलवाल   March 24, 2013 at 4:33 am

    राजा मानसिंह के संघर्षों को बयाँ करता और उनके स्वाभिमान को दर्शाता सुन्दर लेख !!

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  4. Ratan Singh Shekhawat   March 24, 2013 at 8:03 am

    मदन सिंह जी शेखावत की राजा मानसिंह जी के बारे में टिप्पणी
    @ जब अंग्रेज अधिकारी आते तो यह उन को सम्मान नही देते थे ,और यह प्रचारित कर रखा था कि राजा थोडा पागल है , कहते है कि एक दफा एक अंग्रेज अधिकारी के वहां बैठे रहते एक चारण आ गया ,जब उस ने सुभराज दी तो महाराजा ने खड़े होकर उस का अभिवादन स्वीकार किया। जब इस बात को लेकर अंग्रेज अधिकारीयों ने गवर्नर जनरल को रिपोर्ट भेजी की राजा पागल नही है, नाटक कर रहा है।
    जब इस का स्पष्टीकरण माँगा गया तो महाराजा ने लिखवाया कि "हमारे पूर्वजों के तो कटे हुए सिर भी चारणो के उद्बोधन पर बोल उठते थे ,मैं तो जिन्दा हूँ। " (बिरदाता सिर बोलियों )

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  5. अल्पना वर्मा   March 24, 2013 at 9:37 am

    बहुत विस्तार से राजा मान सिंह जी के बारे में आप ने लिखा है.एक विशिष्ट लेख बन गया है .

    Reply
  6. ताऊ रामपुरिया   March 24, 2013 at 12:09 pm

    राजा मानसिंह के बारें विस्तृत और तथ्यपरक जानकारी. राजा मानसिंह के बारे में पढकर यह धारणा और बलवती होती है कि मनुष्य में अच्छाई और बुराई दोनों साथ साथ निवास करती है जिनका इंसान बुद्धि अनुरूप जरूरत अनुसार उपयोग करता है. बहुत ही संग्रणीय आलेख.

    रामराम.

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  7. HARSHVARDHAN   March 24, 2013 at 3:00 pm

    राजा मानसिंह के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। बेहतरीन लेखन 🙂

    नये लेख : भगत सिंह, 20 रुपये के नये नोट और महिला कुली।
    विश्व जल दिवस (World Water Day)
    विश्व वानिकी दिवस
    "विश्व गौरैया दिवस" पर विशेष।

    Reply
  8. कई वर्ष पूर्व एक महाराजा ने अपनी जीप से हेलीकाप्टर को टक्कर मारकर दुर्घटनाग्रस्त कर दिया था, वे कौन थे. उनके बारे में जानने की इच्छा है.

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    • Ratan Singh Shekhawat   March 25, 2013 at 1:10 am

      राजा मानसिंह जोधपुर.
      वे भरतपुर राजपरिवार में डीग के पूर्व महाराजा मानसिंह थे जिन्होंने राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के हेलीकोप्टर को टक्कर मारी थी|
      बाद उसी दिन कुछ घंटे में ही पुलिस ने उन्हें मार डाला |

      ज्ञात हो भरतपुर का राजपरिवार जाट जाति का है|
      इस राजपरिवार के बारे में सुना है कि करोली के एक राजा ने सिनसिनी गांव की एक बहादुर जाट लड़की से शादी की थी जिसके पुत्र को लोहागढ़ की जागीर दी थी पर राजा की उपाधि नहीं दी , बाद में इनकी शक्ति बढ़ने व जयपुर राजा जयसिंह जी के साथ रहने के कारण राजा जयसिंह ने इन्हें बादशाह से राजा की उपाधि दिलवाकर इन्हें मान्यता दिलवा दी|
      जाट इतिहासकार इस राजपरिवार का करोली के उस यदुवंशी राजा से कनेक्शन के बारे में नहीं लिखते| मैंने कई पुस्तकें देखी जो जाट इतिहासकारों की लिखी है उनमें करोली से उत्पत्ति वाली बात नहीं लिखी उसके आगे का ही इतिहास लिखा है !
      मैं इस बार में प्रमाणित सामग्री जुटाने की कोशिश में जुटा हूँ मिलने पर इस जानकारी वाला लेख लिखूंगा !

      Reply
    • अल्पना वर्मा   March 27, 2013 at 10:13 pm

      यह जानकारी तो नयी और रोचक है कि राजस्थान में जाट शासक[राजा] भी हुए!

      Reply
    • Ratan Singh Shekhawat   March 28, 2013 at 12:43 am

      अल्पना जी
      राजस्थान में भरतपुर और धोलपुर की रियासतों के राजा जाट ही है ! वसुंधरा राजे धोलपुर के जाट पूर्व राजघराने में ही ब्याही हुई है !!

      Reply
  9. आपकी यह प्रवृष्टि आज दिनांक 25-03-2013 को सोमवारीय चर्चामंच-1194 पर लिंक की गयी है। सादर सूचनार्थ

    Reply
  10. आपकी यह प्रवृष्टि आज दिनांक 25-03-2013 को सोमवारीय चर्चामंच-1194 पर लिंक की गयी है। सादर सूचनार्थ

    Reply
  11. Ravindra   March 25, 2013 at 9:12 am

    बेहतरीन लेखन : http://blog.irworld.in/2013/03/two-best-screen-capture-and-recording.html

    Reply
  12. THAKUR PAVAN PRATAP SINGH JADAUN   March 25, 2013 at 3:02 pm

    हुकुम बहुत अच्छी जानकारी दी आपने , करोली के यदुवंशी जादौन राजपूतो के बारे में भी जानकारी प्रदान करने की कृपा करे ..

    Reply
  13. YASHVARDHAN SRIVASTAV   March 25, 2013 at 3:31 pm

    अच्छी जानकारी। सादर आभार

    मेरी नयी कविता :- रंगों की दिवाली

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  14. naren   April 7, 2013 at 6:49 pm

    Hamne bhi jat Rajao ka khshatiya connection dhundha par mila par mila nahi…shayad aap aage blog me likhe

    Reply
  15. Rawatsinh Chauhan   January 4, 2014 at 5:38 am

    bahut hi sunder aalekhan tha ratansinghji,muje bhomiya rajput or unke itihas ke bare me janna he asha karta hu jald hi us par kuch likhenge

    Reply
  16. Rawatsinh Chauhan   January 4, 2014 at 5:41 am

    hukum bahut hi badhiya aalekhan tha ,muje bhomiya rajput or unke itihas ke bare me janna he asha karta hu us par aap jald hi kuch likhenge

    Reply
  17. Dhirendra Singh jadaun   March 14, 2014 at 11:39 am

    karauli ke jadaun raja ke bete ne dagur jati ki jatani rakh li thi isi karan bharatpur ke jat apne ko yaduvanshiyo se jodate h ye sinsini ke jat kahlate h

    Reply
  18. hukamsingh rathore   January 30, 2016 at 2:09 am

    पासवान रौ जोधपुर रे महाराजा ने लिखियोड़ो प्रेम-पत्र
    राज श्री श्री श्री श्री श्री महलां मांय श्री सिद्ध श्री सर्वोपमा विराजमान,अनेक ओपमा लायक,सकल गुण निधान,गंगा जळ सा निरमल,गऊ-ब्रामण रा प्रीतपाल,दरसण रा पोषक,माथा रा मोड़,आतम रा आधार,सिर रा सेवरा,संसार रा सुख,सेजां रा स्वामी,मेहलां रा मांडण,हिवड़ै रा हार, उगता सूरज,वैद-पुराण रा ज्ञाता,समन्दा जैड़ा अथाह,प्यारी रा प्राणआधार,गोपियाँ बीचे कान्ह,तारां बीच में चाँद,फुलाँ बीच में गुलाब,श्री प्रीतम जी, श्री साहेब जी,उगता सूरज, पूनम रा चाँद,ढलकती नथ रा मोती,श्री जसराज,श्री गुणराज,जसराज,हिंदुपति पातस्या,छत्रपति महाराज,सुख करण,दुःख भंजन,जीव री जड़ी,आख्यां रा अंजण,रूप रा अनोप,गुणा रा गायक,मीठा बोला,मौजां रा बखसनहार,श्री साहेब जी,बाड़ी रा भंवर,केथकी रा कंथ,फुलाँ रा भारा, बावनी चनण,सोळे कला सुजाण,हीरा-पन्ना रा पारखी, चौसठ कला अर छत्तीस रांगा रा जाणकार,गुणां रा सागर, धरती जैड़ा धीमा,भाखर जैड़ा भारी,आप री तपस्या भारी जखो भी खरी मीट सूं जोवे वो बळ नें भस्म हो जावे,मन रा मोर,चीत रा चोर श्री हजुर रे श्री चरणां ढोलीये रे खिदमतगार री चरण धौक अरज होवे सुखसेजराय रौ मुजरो मालम होवे,संसार में सूरज रे ज्यू आपरा दरसण जे नित हुवे जद मन्न घणो निरपत हुवे,श्री साहेब जी मै तो घणा पुन्न किया,तपस्या करी,दान पुनः करियो,गवर री पूजा करी जद आप जैड़ा धणी मिलिया,चाकर माथै सुभ निजर रखाहिजो, मैं तो आपरे चरणां री दासी हूँ,आखे राजस्थान में आप जेड़ों कोई तपस्वी कोई नी,आप मन्ने ढोलिया री खिदमत वास्ते फुरमायो नी जद ओ पत्र लिखियो जे दस्खत ऊँचो नीचो हुयौ वे तो हजार गुणा माफ़ी बख्सावसी,मै तो काहीं जाणु नही राज चतुर सुजाण !!
    यहाँ ये ध्यान देने योग्य बात है की बीकानेर के अभिलेखागार में अनेकों रानियों-महारानियों,पासवान-पड़दायतों के प्रेम-पत्र मिलते है पर जोधपुर के महाराजा मानसिंह जी को जिस तरह का ये प्रेम पत्र उनकी पासवान सुखसेजराय नें लिखा है वैसा पत्र कहीं नही मिलता है! मूल पत्र जो जिसमें महाराजा और पासवान जी का चित्र बना है साथ में सलग्न है ! जो मेरे मित्र डॉ.महेंद्रसिंह जी तंवर नें मुझे उपलब्ध करवाया जिसका रूपान्तर पाठकों हेतू मैने किया है!
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    Guide Dr- Shakti Singh Rathore (गांव खाखड़कि,नागौर राज) हाल निवासी जोधपुर की टाइमलाइन से!

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