कुंवर विजयसिंह नंदेरा

कुंवर विजयसिंह नंदेरा

Kunwar Vijay Singh, Nandera
कुंवर विजयसिंह नंदेरा का जन्म 12 अक्टूबर 1930 को कल्यानोत कछवाह ठाकुर जयसिंह जी ग्राम नंदेरा (जिला दौसा, तत्कालीन जयपुर राज्य) के घर में हुआ. आपने सन 1951 में बी.ए. महाराजा कालेज जयपुर से व सन 1955 में एल.एल.बी. की परीक्षा ला कालेज जयपुर से उतीर्ण कर अपने ग्राम के प्रथम स्नातक होने का सौभाग्य प्राप्त किया. आप “क्षत्रिय युवक संघ” से सन 1947 से ही जुड़े व सन 1959 तक निरन्तर कार्यरत रहे. सन 1952 में जोधपुर के महाराजा हनुवन्त सिंह के देहान्त पर जयपुर में जो शोक जुलूस निकाला गया था व जिस पर गोली काण्ड हुआ था, उस जुलूस में राजपूत छात्रावास जयपुर से जो छात्र शामिल हुए थे उनका नेतृत्व श्री विजयसिंह नंदेरा, श्री सायरसिंह हरदास का बास व श्री सूरसिंह रेटा आदि छात्रों ने ही किया । इस गोली काण्ड में शहीद हुए भवानी निकेतन के छात्र श्री गोवर्धन सिंह के शव को आप ही श्री मोहरसिंह लाखाऊ व अन्य छात्रों के साथ लेकर उसके ग्राम हिन्दूपुरा गये व वहाँ जाकर दाह संस्कार करवा कर वापस लौटे।

सन् 1955 से सन् 1958 तक आप तहसील पंचायत बसवा के सरपंच रहे व इस अवधि में ग्रामीण क्षेत्र में सामाजिक कुरीतियों को मिटाने व शिक्षा के प्रसार हेतु महत्वपूर्ण कार्य किया। सन् 1957 में केन्द्रीय बैंक सहकारी लिमिटेड जयपुर के संचालक मण्डल के सदस्य निर्वाचित हुए व इसी अवधि में वृहत् कृषि ऋणदायी सहकारी समिति नंदेरा के उपाध्यक्ष रहते हुए सहकारी आन्दोलन में महतवपूर्ण योगदान दिया। सन् 1959 में पंचायत समिति बाँदीकुई के सदस्य चुने गये व आपके प्रयासों से बाँदीकुई में पशु चिकित्सा भवन का निर्माण हुआ।

आपके बहनोई का निधन हो जाने पर आपको सन् 1960 में गंगानगर जिला स्थित ग्राम तलवाड़ा झील जाना पड़ा क्योंकि आपके भानजे बहुत छोटी उम्र में थे व उनकी कृषि भूमि की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। आप सन् 1978 तक वहाँ रहे व अपने भानजों के कृषि फार्म का विकास किया जिसमें आज पाँच हजार मन चावल व दो हजार मन गेहू प्रतिवर्ष पैदा होता है। आपने तलवाड़ा झील स्थित उनकी चावल मिल की भी देखरेख की व भानजों के वयस्क होने पर उनका विवाह कर अस्सी हजार रुपये नकद उनको सम्भला कर वापिस नंदेरा लौटे। इसी अवधि में 16 जनवरी 1965 से 22 जनवरी 1978 तक आप तलवाड़ा झील ग्राम पंचायत के निर्विरोध निर्वाचित सरपंच रहे। आप 14 जनवरी 1967 से 30 जनवरी 1968 तक कृषि उपज मण्डी समिति हनुमानगढ़ के वाइस-चेयरमेन रहे।

श्री क्षत्रिय युवक संघ में रहते हुए आपने जयपुर एवं हाडौती क्षेत्र में संघ के कार्य विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भू-स्वामी आन्दोलन में आपने भूमिगत रह कर नागौर व चूरू जिले में आन्दोलन का संचालन किया। आपको इन क्षेत्रों में संघ के चार केन्द्र स्थापित कर आन्दोलन के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जिसके स्थान पर आपने नौ केन्द्रों की स्थापना कर उन्हें सफलता पूर्वक चलाया। ठा. जयसिंह नंदेरा इसी अवधि में बाँदीकुई, बसवा, महुवा व लक्ष्मणगढ़ क्षेत्रों में आन्दोलन के लिए कार्यरत रहे। ऐसा ही एक उदाहरण ठा. रिड़मल सिंह सापुणदा व कुंवर प्रतापसिंह सापुणदा का है, जो पिता-पुत्र दोनों समग्र रूप से आन्दोलन से जुड़े रहे।
सन् 1970 तक इनके भानजे कुछ वयस्क हो चले थे अत: आपने राजनीति के लिए समय निकालना प्रारम्भ किया। श्री कल्याणसिंह कालवी के राजस्थान स्वतंत्र पार्टी का महामंत्री बनने के बाद उनका सहयोग करने हेतु प्रदेश कार्यालय में, कार्यालय मंत्री रहे। किसानों के नाम पर किसान नेता कहलाने वाले लोग उस काल में केवल जातिगत नेतागिरी कर रहे थे। उनको सिद्धान्तनिष्ठ नेतागिरी की ओर उन्मुख करने के लिए आपने ‘हरित क्रान्ति या भ्रान्ति व कृषि मूल्य आयोग का किसानों पर खूखार हमला शीर्षक से दो पुस्तकें लिखीं जिनमें कृषि मूल्य आयोग में किसानों के प्रतिनिधि नहीं होने के कारण किसानों का किस प्रकार शोषण हो रहा है इसका विषद विवेचन किया गया था। इन पुस्तकों को आपने देश भर के किसान नेताओं के पास भेजा। इसके बाद ही कृषि मूल्य आयोग में किसानों के प्रतिनिधियों को लेने की बात उठी व उन्हें सदस्यता मिली. आपने सन 1972 के आम चुनावों में स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर बांदीकुई से विधानसभा का चुनाव लड़ा, किन्तु आपको सफलता नहीं मिली. इसके बाद आप राजस्थान स्वतंत्र पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे, किन्तु 1976 में लगी इमरजेन्सी व जयपुर के राजपरिवार के दमन के बाद स्वतंत्र पार्टी समाप्त प्राय: हो गई. तब आप व श्री कल्याणसिंह कालवी दिल्ली जाकर चौधरी चरणसिंह से मिले व उनकी सलाह पर जयप्रकाश नारायण द्वारा नवगठित जनता पार्टी में सम्मिलित हो गये। इसी पार्टी के टिकट पर आप सन् 1977 में हुए आम चुनाव में बाँदीकुई निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गये। आप विधानसभा की याचिका समिति के सदस्य व राजस्थान विश्वविद्यालय की सीनेट के भी सदस्य रहे।

सन् 1977 के विधान सभा चुनावों के बाद जब विपक्ष को बहुमत प्राप्त हो गया तो श्री कल्याणसिंह विधायक दल के नेता के चुनाव में श्री भैरोंसिंह के साथ हो गये किन्तु आपने अपनी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा व पार्टी के विधायकों को संगठित रखते हुए महारावल लक्ष्मणसिंह डूंगरपुर को पूर्ण समर्थन दिया। इस प्रकार मतभेद बढ़ जाने के कारण बाद में आप लोकदल में सम्मिलित हो गये व लोकदल के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे।
आपने राजपूत सभा जयपुर व अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा में भी सक्रिय रूप से कार्य किया व विभिन्न पदों पर रहे। आपसी विवादों के कारण, ‘जयपुर राजपूत सभा’ कई वर्षों से बन्द पड़ी थी, उस समय श्री रघुवीरसिंह जी जावली के प्रयासों से दोनो पक्ष जिनके बीच विवाद थे, निष्पक्ष चुनाव होने पर अदालतों से मुकदमे वापस लेने पर सहमत हो गये। तदनुसार श्री रघुवीरसिंह जावली, श्री मानधाता सिंह गीजगढ़ व श्री विजयसिंह नंदेरा की एक समिति बनी जिसने चुनाव सम्पन्न करवाये व सभा-भवन के ताले खुले। दिवराला सती काण्ड में आपने न केवल आन्दोलन में सहयोग दिया बल्कि दिल्ली में जाकर विभिन्न पार्टी नेताओं को आपने ही सबसे पहले यह समझाने की चेष्टा की कि दिवराला ग्राम में रूपकंवर के ग्राम कूकणवाली की तेरह राजपूत लड़कियाँ विवाहित हैं। जिस गाँव में लड़की के स्वयं के परिवार की इतनी महिलाएँ हों, क्या वहाँ पर किसी लड़की को जबरन जलाया जा सकता है? इसका लोगों पर प्रभाव हुआ व विरोध कम हुआ।

आपने भूस्वामी आन्दोलन की तरह ही दिवराला सती काण्ड के समर्थन में भी आन्दोलन चलाने हेतु कार्यकर्ता तैयार करने के उद्देश्य से अनेक शिविर भी लगाये, किन्तु उस आन्दोलन की संचालक ‘धर्म रक्षा समिति’ की ही आन्दोलन चलाने में कोई रुचि नहीं थी। अत: आन्दोलन प्रारम्भ ही नहीं हुआ व आप द्वारा किया गया प्रयास निष्फल चला गया।

आप जहाँ अत्यन्त मिलनसार थे ही वहीं सच्चे मित्र भी थे। आपने एक बार किसी का हाथ पकड़ कर तब तक नहीं छोड़ा जब तक उसने स्वयं ने ही हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की हो।
सन् 1975 में क्षत्रिय युवक संघ से श्री तनसिंह जी के निष्कासन व उसके साथ ही घटी अशोभनीय घटनाओं से बचा खुचा क्षत्रिय युवक संघ भी छिन्न भिन्न हो गया था। श्री आयुवानसिंह व श्री तनसिंह द्वारा लिखी पुस्तकें कहीं उपलब्ध नहीं थी। लोग इन पुस्तकों की खास तौर से ‘राजपूत और भविष्य’ व ‘ममता और कर्तव्य’ की माँग कर रहे थे. किन्तु इन पुस्तकों को छापने की व्यवस्था करने वाला कोई नहीं था ऐसी अवस्था में आपने ठाकुर रघुवीरसिंह जावली, ठाकुर कल्याणसिंह कालवी, ठाकुर मोहरसिंह लाखाऊ व ठाकुर सवाईसिंह धमोरा के साथ विचार विमर्श कर इन्हीं के सहयोग से आयुवानसिंह स्मृति संस्थान की स्थापना सन् 1978 में की, ताकि इन पुस्तकों का प्रकाशन हो सके व जो विचार क्रान्ति क्षत्रिय युवक संघ ने प्रारम्भ की थी उसमें अवरोध उत्पन्न नहीं हो। प्रथम स्मृति समारोह सन् 1979 में हुआ, तब से यह संस्थान निरन्तर कार्य कर रहा है। अब तक कई पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है व विचारधारा के प्रचार हेतु प्रतिवर्ष अनेक समारोह व शिविरों का आयोजन किया जाता है। कुंवर आयुवानसिंह की स्मृति में मुख्य समारोह प्रतिवर्ष जयपुर में आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर पुस्तक मेले का आयोजन भी किया जाता है जिसमें संस्थान की पुस्तकों के साथ ही विभिन्न प्रकाशकों व लेखकों की इतिहास पुस्तकें सस्ते दामों में उपलब्ध कराई जाती है, इस पुस्तक मेले में समाज बंधू लाखों रूपये की पुस्तकें खरीदते है|

क्षत्रिय युवक संघ जो छिन्न भिन्न हो चुका था, दो गुटों में विभक्त था, उनमें एकता स्थापित करने व अशोभनीय व्यवहार को रोकने के उद्देश्य से 1981 में जयपुर में ‘विचार संगम’ कार्यक्रम के अन्तर्गत एक शिविर का आयोजन किया गया जिसमें संघ के दोनों गुट सम्मिलित हुए किन्तु अगले वर्ष 1982 में जब पुन: इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो दोनों ही गुट नहीं आये। इस पर कुंवर विजयसिंह ने अपने ही बलबूते पर क्षत्रिय युवक संघ का कार्य पुनः आरम्भ करने का निश्चय किया ताकि स्वस्थ स्पर्धा का विकास हो व संघ की मूल विचारधारा, जिससे लोग दूर हटते चले जा रहे थे, का पुनः विकास हो सके। आपने 1982 में पहला पी.टी.सी. कैम्प कानोता में लगाया व इसके बाद जीवन पर्यन्त इसी कार्य में लगे रहे। आपने अपने जीवन का एक भी दिन, शक्ति का एक भी अणु, एवं हृदय का एक भी पवित्र भाव समाज की सेवा से बचाकर नहीं रखा।

सन् 1988 के आरम्भ में आपका स्वास्थ्य बिगड़ा। कुछ समय तक दवाइयाँ लेते रहने के बाद आप एसएमएस. अस्पताल जयपुर में भर्ती हुए जहाँ दो बार आपका आपरेशन हुआ किन्तु वास्तविक बीमारी का पता नही चल सका। आपका स्वास्थ्य गिरता चला गया व अन्त में 10 मई 1988 को इसी अस्पताल में आपका देहान्त हो गया। अन्तिम संस्कार ग्राम नंदेरा में किया गया। ‘आयुवानसिंह स्मृति संस्थान’ संस्थान के संस्थापक कुंवर विजयसिंह नंदेरा की स्मृति में प्रति वर्ष एक स्मृति समारोह आयोजित करता है। यह समारोह प्रतिवर्ष नवीन स्थान पर आयोजित किया जाता है जिससे विचारधारा व साहित्य का प्रचार नये क्षेत्रों में होने में सहायता मिलती है।

Kunwar Vijay Nandera
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One Response to "कुंवर विजयसिंह नंदेरा"

  1. Kavita Rawat   February 12, 2017 at 7:13 am

    बहुत अच्छी जानकारी …

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