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Thursday, September 29, 2022

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Kuchaman Fort History कुचामन का किला

Kuchaman Fort History वीरता और शौर्य का प्रतीक यह किला एक विशाल और ऊँची पहाड़ी पर बना है, जो गिरि दुर्ग का सुन्दर उदाहरण है । उन्नत प्राचीर और सुदृढ़ बुर्जों वाला यह किला प्राचीन भारतीय शिल्प शास्त्रों में वर्णित दुर्ग स्थापत्य के आदर्शों के अनुरूप निर्मित जान पड़ता है । नागौर जिले की नावां तहसील में स्थित कुचामन पूर्व जोधपुर रियासत में मेड़तिया राठौड़ों का एक प्रमुख ठिकाना था जो न केवल अपने शासकों की वीरता और स्वामिभक्ति प्रेरित बलिदान की घटनाओं के लिए ही प्रसिद्ध है अपितु अपने भव्य और सुदृढ़ दुर्ग के लिए भी विख्यात है। इस भव्य दुर्ग के निर्माता के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है । पर प्रचलित लोक मान्यता और स्थानीय इतिहास के अनुसार यहाँ के पराक्रमी मेड़तिया शासक जालिमसिंह ने वनखण्डी नामक महात्मा के आशीर्वाद से (जो उक्त पहाड़ी पर तपस्या करते थे) कुचामन के किले की नींव रखी, जिसका कालान्तर में उनके यशस्वी वंशजों द्वारा विस्तार एवं परिवर्द्धन किया गया। आपको बता दें किले में आज भी उस वनखंडी महात्मा का धुणा विद्यमान और प्रज्वलित है यही नहीं यहाँ के शासकों ने महात्मा का सम्मान रखते हुए उनके स्थान को किले में सबसे ऊपर रखा है, यानी राजा के महल, सैनिकों के रहने के आवास व किले की कोई भी ईमारत महात्मा के धुने यानी उनके स्थान से ऊपर नहीं बनाई गई है |

Kuchaman Fort के निर्माण को लेकर दूसरी संभावना यह है कि इस पहाड़ी पर गौड़ शासकों द्वारा निर्मित किले का जालिमसिंह ने जीर्णोद्धार एवं विस्तार कर उसे दुर्भेद्य दुर्ग बनाया । मुगल बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल में गौड़ों का प्रताप रवि अपने प्रकर्ष पर था, उनके पास बड़े बड़े मनसब और जागीरें थी, कुचामन के पास मारोठ गौड़ों की राजधानी थी, हो सकता है यहाँ गौडों की कोई अग्रिम चौकी के रूप में छोटा मोटा किला बना हो| औरंगजेब के राज्यारोहण के साथ ही गौड़ों के पराभव का सिलसिला प्रारम्भ हो गया । वीरवर जयमल के वंशज रघुनाथसिंह मेड़तिया के नेतृत्व में राठौड़ों ने शक्तिशाली गौड़ों के साथ अनेक युद्ध लड़े तथा अन्तत: शेखावतों की सहयता उन्हें परास्त कर 1658 ई. में रघुनाथसिंह मेड़तिया ने इस भू-भाग पर अपना अधिकार स्थापित किया । तत्पश्चात् यह भू-भाग जोधपुर रियासत के अधीन हो गया । ठाकुर जालम सिंह इन्हीं रघुनाथसिंह मेड़तिया के पोत्र थे, जालमसिंह के पिता को मिठडी की जागीर मिली थी|

जनश्रुति के अनुसार जिस पर्वतांचल में कुचामन बसा है वहाँ पहले कुचबन्धियों को ढाणी थी । सम्भवत: उसी के नाम पर यह कस्बा कुचामन कहलाया । कुचामन और उसके निकटवर्ती प्रदेश पर गौड़ क्षत्रियों का दीर्घकाल तक वर्चस्व रहा जिसकी पुष्टि कुचामन के पास हिराणी, मीठड़ी, लिचाणा तथा अन्य स्थानों पर विद्यमान गौड़ शासकों के शिलालेखों से होती है। उनकी राजधानी मारोठ थी जो कि एक प्राचीन नगर है । अनेक वर्षों तक गौड़ों द्वारा प्राधिकृत होने के कारण यह इलाका गौड़ाटी कहलाया। मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के इतिहास के अनुसार जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने 1727 ई० में जालिमसिंह मेड़तिया (रघुनाथसिंह के पौत्र) को कुचामन की जागीर इनायत की थी। ये जालिमसिंह जो अतुल पराक्रमी थे, जोधपुर रियासत की ओर से सरबलन्दखाँ के विरुद्ध अहमदाबाद की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए । स्थानीय इतिहासकार व जनश्रुतियों के अनुसार कुचामन के इस भव्य किले की नींव जालमसिंह ने ही रखी थी और किले का निर्माण कराया था, जिसका उनके वंशजों ने विस्तार कर इसे शानदार व भव्यता प्रदान की |

Kuchaman Fort की शान रियासतों के किलों से किसी भी दृष्टि से कम नहीं है | इसलिए यदि कुचामन के किले को जागीरी किलों का सिरमौर कहा जाय तो काई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके बारे में लोक में यह उक्ति प्रसिद्ध है – “ऐसा किला राणी जाये के पास भले ही हो, ठुकराणी जाये के पास नहीं।” मतलब इस तरह का बड़ा व भव्य किला राजाओं के पास तो हो सकता है पर किसी भी जागीरदार ठाकुर के पास नहीं है| जागीरदारों के किलों में सिर्फ कुचामन का किला ही है जो राजाओं के किलों की सी भव्यता व शान लिए हुए है| आपको बता दें कुचामन व्यापारिक रूट पर स्थित होने के कारण कुचामन जागीर की आय बहुत ज्यादा थी, ठिकाने की आर्थिक स्थित सुदृढ़ होने के कारण यहाँ के शासक जागीरदार इतना बड़ा व भव्य किला बनाने में सफल हुए|

Kuchaman Fort की तलहटी में उसके ठीक नीचे भव्य गढ़ है जहाँ से किले के ऊपर जाने के लिए घुमावदार मार्ग बना हुआ है । किले में पहुँचने के लिए इस घुमावदार मार्ग की उंचाई में गाड़ी सीधी नहीं चढ़ सकती अंत: किले तक पर्यटकों को ले जाने के लिए जीप उल्टी यानी बैक गियर में चलती है और उसी तरह उतरती है | कुचामन के इस विशाल किले में लगभग 18 बुर्जें है,  भव्य महल, रनिवास, सिलहखाना (शस्त्रागार) अन्न भंडार, पानी के विशाल टांके, देव मन्दिर इत्यादि बने हुए हैं। किले के भवनों में सुनहरी बुर्ज सोने के बारीक व सुन्दर काम के लिए उल्लेखनीय है । रानी के महल या रनिवास तथा कांच महल (शीश महल) भी अपनी शिल्प और सौन्दर्य के कारण दर्शनीय हैं। यहाँ का हवामहल राजपूत स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है।

Kuchaman Fort के मुख्य द्वार पंच पोल में घुसते ही किले की भव्यता व वास्तु शिल्प व सुरक्षा के प्रति जागरूकता का अहसास स्वत: हो जाता है, इस पञ्च पोल में जहाँ भव्य आवास बने हैं वहीँ इसके कई घुमाव सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण जान पड़ते है| पञ्च पोल से थोड़ा आगे जाने पर एक शानदार मीना बाजार बना है, जहाँ समय समय पर बाजार लगता था, जिसमें ठाकुरानियाँ व किले में रहने वाली अन्य महिलाएं अपनी जरुरत का सामान खरीद सकती थी| इस बाजार में अलग अलग व्यापरियों के बैठने के लिए अलग अलग कक्ष यानी कियोस्क बने हैं|

किले में जल संग्रह के लिए पाँच विशाल टांके हैं, जिनमें पाताल्या हौज और अंधेरया हौज (बंद टांका) प्रमुख हैं। किले की जल संग्रहण तकनीक देखने व प्रेरणा लेने लायक है, जिसकी खास बात है कि इस विधि से वर्षा जल का संचय कर वर्षभर की जरुरत का पानी संग्रह किया जा सकता है, यदि हम आज भी इस विधि का प्रयोग करें तो जल संकट की समस्या से निजात पा सकते हैं | किले के भीतर कुछ देवी देवताओं के मन्दिर भी हैं जिनमें देवी का प्राचीन मन्दिर मुख्य है । यहाँ एक अद्भुत शिव मंदिर है जिसमें पूरा शिव परिवार मौजूद है, मंदिर में नौ शिवलिंग एक साथ स्थापित है|

Kuchaman Fort का सिलहखाना बहुत बड़ा है तथा उसमें शीशा व बारूद रखने के पृथक कक्ष बने हुए हैं। भीतर चौक में घोड़ों की पायगें, शूतरखाना (उष्ट्रशाला) और हस्तिशाला भी विद्यमान है। किले में कैदियों के लिए चक्की कोठरी, काल कोठरी व कालापानी कोठरी विद्यमान है जिसे देखकर यहाँ के शासकों द्वारा अपराधियों को कठोर सजा देने के प्रति प्रतिबद्धता नजर आती है| पहाड़ी की तलहटी में कई महल बने हैं जिनमें सभा भवन की खूबसूरती, चित्रकारी देखने लायक है| इस भवन में सामने ठिकाने के जागीरदार की बैठने की जगह ऊंचाई पर बनी है जिसके दोनों और सीढियाँ बनी है, इस बड़े हाल में ऊपर बरामदों में बैठने की भी जगह बनी है जो शायद महिलाओं के लिए हो ताकि वे भी ठिकाने के सभासदों की बैठक देख व सुन सके| इस भवन की छत पर यहाँ के शासकों के पूर्वजों के चित्र बने हैं|

किले के उत्तर की ओर का टीला आज भी हाथीटीबा कहलाता है। अतीत में कुचामन के किले के नीचे पानी की विशाल नहर बहती थी जिसका सुरक्षा की दृष्टि से विशेष महत्त्व था। किले के पूर्व में एक छोटी सी डूंगरी पर भव्य सूर्य मन्दिर स्थित है जो बहुत आकर्षक है तथा सूर्यवंशीय राठौड़ों की पारम्परिक आस्था का परिचायक है । कुचामन अतीत में एक सुदृढ़ परकोटे के भीतर बसा हुआ था जिसके प्रमुख प्रवेशद्वारों में चाँदपोल (आथूणा दरवाजा) सूरजपोल, कश्मीरी दरवाजा, पलटन दरवाजा, होद का दरवाजा और बारी दरवाजा प्रमुख हैं।

वर्तमान में यह प्रदेश के बड़े व्यवसायी मेघराजसिंह शेखावत के स्वामित्व में है | हाल ही में किले व पहाड़ी की तलहटी में बने महलों की मरम्मत व पुनरोद्धार का कार्य प्रगति है, जिसकी खास बात यह है कि मरम्मत कार्य में निर्माण सामग्री के रूप में उसी तरह की सामग्री यथा चुना आदि का प्रयोग किया जा रहा है जो अतीत में प्रयोग किया गया| सीमेंट आदि का कहीं प्रयोग नहीं किया जा रहा| मरम्मत व पुनरोद्धार के बाद जहाँ यह ऐतिहासिक धरोहर संरक्षित होगी, वहीँ इन महलों में होटल बनने के बाद देश के विदेश के पर्यटक यहाँ रुक कर राजसी ठाट-बाट का आनन्द उठा सकेंगे|

यदि आप भी इस फोर्ट Kuchaman Fort को देखना व चढ़ाई पर उलटी चलती जीप में रोमांचक सफ़र का आनन्द लेना चाहते हैं तो कुचामन पधारिये आपका स्वागत है | कुचामन देश के विभिन्न शहरों से सड़क व रेल यातायात से जुड़ा है और किला दर्शकों के लिए खुला रहता है|

सन्दर्भ ग्रन्थ : राजस्थान के प्रमुख दुर्ग ; लेखक – डा. राघवेन्द्रसिंह मनोहर

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