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महाराज कीर्तिपाल चौहान

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कीर्तिपाल चौहान

राजस्थान में नाडोल के चौहान अधिपति आलन के पुत्र कीर्तिपाल चौहान जो इतिहास में कीतु के नाम से भी विख्यात थे, चौहान वंश में एक महान पुरुष हुए है| कीर्तिपाल चौहान अपनी 12 गांवों की जागीर को बढाकर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर, अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए, शक्तिशाली शासक के रूप में इतिहास पटल पर उभरे| कीर्तिपाल जालोर के सोनगरा चौहान वंश व जालोर के चौहान राज्य के संस्थापक व प्रवर्तक थे| कीर्तिपाल ने अपने बाहुबल से परमारों को परास्त कर जालौर और सिवाना दुर्ग पर विजय पताका फहराई| जहाँ उसके वीर वंशजों का एक शताब्दी तक वैभवशाली राज्य रहा| यही नहीं चौहान वंश के इस प्रतापी राजा से चौहानों की प्रसिद्ध शाखा सोनगरा का प्रादुर्भाव हुआ| जिसमें चाचिगदे, उदयसिंह, कान्हडदे जैसे प्रख्यात शासक हुए| कीर्तिपाल चौहान ने अपने नाम के अनुरूप चितौड़ जैसे सुदृढ़ किले पर चौहान ध्वज फहराकर अपने वंश गौरव की कीर्ति विस्तीर्ण करने में जो योगदान दिया वह चौहान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है| कीर्तिपाल द्वारा स्थापित जालोर के चौहान राज्य द्वारा केन्द्रीय सत्ता से टक्कर लेने की अनेक घटनाएँ इतिहास में दर्ज है| विरमदेव चौहान कीर्तिपाल का ही वीर वंशज था, जिसमें तत्कालीन भारत के सबसे शक्तिशाली बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी की शहजादी फिरोजा से शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया था|

नैणसी री ख्यात के अनुसार जालोर पर कुन्तपाल पंवार एवं सिवाना पर वीरनारायण पंवार का अधिकार था| कीर्तिपाल चौहान ने कुन्तपाल पंवार के प्रधान दहिया क्षत्रिय से मेलमिलाप करके जालोर पर आधिपत्य जमा लिया फिर उसने सिवाना भी हस्तगत कर लिया| यही नहीं कीर्तिपाल ने मेवाड़ के सामंतसिंह को सत्ताच्युत कर मेवाड़ भी हस्तगत कर लिया, जिसे बाद में वि.सं. 1230 में कुमारसिंह ने वापस कीर्तिपाल से ले लिया| “मारवाड़ रा परगना री विगत” में कीर्तिपाल द्वारा आबू पर विजय प्राप्त करने का उल्लेख हुआ है|वि.सं. 1235 (1135 ई.) में शहाबुद्दीन गौरी ने अणहिलवाड़े पर आक्रमण किया| आबू पर्वत के नीचे कायद्रों गांव में गौरी की गुजरात के सोलंकी, कीर्तिपाल के बड़े भाई केलण व कीर्तिपाल चौहान के साथ भयंकर लड़ाई हुई| जिसमें गौरी घायल हुआ और हार कर उसे पलायन करना पड़ा| सूंधा अभिलेख से पता चलता है कि कीर्तिपाल ने केसाहरदा की लड़ाई में तुर्कों को परास्त किया|

कीर्तिपाल चौहान का देहांत वि.सं. 1239 के लगभग होने का अनुमान है| एक कवित्त से पाता चलता है कि वे मुसलमानों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए-

सुरताण सबल सामहा आप प्राण अवर जीयो,
कीतू कंधार मछरिक कुल गहएव वड़े गरजीयो||

सन्दर्भ : डा. हुकमसिंह भाटी द्वारा लिखित “सोनगरा-सांचोरा चौहानों का वृहद इतिहास”

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