कवि कृपाराम जी और ” राजिया के दोहे”

नीति सम्बन्धी राजस्थानी सौरठों में “राजिया रा सौरठा” सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है भाषा और भाव दोनों द्रष्टि से इनके समक्ष अन्य कोई दोहा संग्रह नही ठहरता | संबोधन काव्य के रूप में शायद यह पहली रचना है | इन सौरठों की रचना राजस्थान के प्रसिद्ध कवि कृपाराम जी ने अपने सेवक राजिया को संबोधित करते हुए की थी | कवि कृपाराम जी तत्कालीन मारवाड़ राज्य के खराडी गांव के निवासी खिडिया शाखा के चारण जाति के जगराम जी के पुत्र थे | जगराम जी को कुचामण के शासक ठाकुर जालिम सिंह जी ने जसुरी गांव की जागीर प्रदान की थी वही इस विद्वान कवि का जन्म हुआ था | राजस्थानी भाषा डिंगल और पिंगल के उतम कवि व अच्छे संस्कृज्ञ होने नाते उनकी विद्वता और गुणों से प्रभावित हो सीकर के राव राजा लक्ष्मण सिंह जी ने महाराजपुर और लछमनपुरा गांव इन्हे वि.स, 1847 और 1858 में जागीर में दिए थे | अपने पुत्र विहीन राजिया को अमर करने के लिए ही विद्वान कवि ने उसे संबोधित करते हुए नीति सम्बन्धी दोहो की रचना की जिनकी संख्या लगभग १४० थी और अब भी १२३ दोहे उपलब्ध है जो राजिया के दोहे या राजिया रे सौरठे नाम से प्रसिद्ध है |
यहाँ उनके लिखे कुछ दोहे प्रस्तुत है …

उद्दम करो अनेक, अथवा अनउद्दम करौ |
होसी निहचै हेक , रांम करै सो राजिया ||

( मनुष्य चाहे कितना ही उधम करे अथवा न करे , किंतु हे राजिया ! निश्चय ही होता वही है जो ईश्वर करता है |

पढ़बो वेद पुराण , सोरौ इण संसार में |
बांता तणौ बिनाँण, रहस दुहेलौ राजिया ||

इस संसार में वेद-पुराण आदि शास्त्रों को तो पढ़ना आसान है किंतु हे राजिया ! बात करने की विशिष्ट विद्या का रहस्य सीखना-समझना बहुत कठिन है |

आछा जुद्ध अणपार, धार खगां सन्मुख धसै |
भोगै हुए भरतार , रसा जीके नर राजिया ||

जो लोग अनेक बड़े युद्धों में तलवारों की धारों के सम्मुख निर्भिख होकर बढ़ते है,वे ही वीर भरतार बनकर इस भूमि को भोगते है |

हीमत कीमत होय,विन हिमत कीमत नही |
करे न आदर कोय,रद कागद ज्यूं राजिया||

हिम्मत से ही मनुष्य का मुल्यान्कन होता है ,अत: पुरुषार्थहीन पुरुष का कोइ महत्व नही | हे राजिया ! साहस से रहित व्यक्ति रद्दी कागज की भांति होता है,जिसका कोई आदर नही करता |

साचो मित्र सचेत , कह्यो काम न करै किसौ |
हर अरजन रै हेत, रथ कर हाक्यों राजिया ||

जो सच्चा मित्र होता है,वह अपने मित्र के हितार्थ तत्परता से कौन सा कार्य नही करता ? श्री कृष्ण ने तो अपने मित्र अर्जुन के लिए रथ अपने हाथो से हांका था |

अवनी रोग अनेक,ज्यांरो विधि किधौ जतन |
इण परकत री एक,रची न ओखद राजिया ||

प्रथ्वी पर अनेक रोग है जिनके विधाता ने इलाज बनाये है | लेकिन हे राजिया ! इस प्रकृति ( स्वभाव ) का के इलाज की एक भी दवा नही रची |

हर कोई जोड़े हाथ,कामण सूं अनमी किसा |
नम्या त्रिलोकी नाथ,राधा आगळ राजीया ||

सभी लोग उसे हाथ जोड़ते है अतः स्त्री के आगे न झुकने वाला व्यक्ति भला कोन हो सकता है ? हे राजिया ! जब तीनो लोकों के स्वामी श्री कृष्ण भी राधा जी के आगे झुकते थे, तो साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है ?

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