जय जंगलधर बादशाह -1

जय जंगलधर बादशाह -1

उस दिन बादशाह औरंगजेब लम्बी बीमारी से उठ कर पहली बार दरबार में आया था | दीवाने ख़ास का वह दरबार खचाखच भरा हुआ था | बीमारी की थकावट और साम्राज्य की नित नई उत्पन्न होती समस्याओं के कारण बादशाह का चेहरा गंभीर था | बादशाह ने मयूर सिंहासन पर बैठकर ज्योंहि अपनी दृष्टि चारों और दौड़ाई,उसे एक विशेष दूत सामने आता हुआ दिखाई पड़ा | दूत ने दरबारी शिष्टाचार के अनुसार झुक कर अभिवादन किया | बादशाह ने गंभीर स्वर में पूछा –
” कहाँ से आ रहे हो ?”
“अजमेर से जहाँपनाह |”
और दुसरे क्षण उसने एक बंद लिफाफा बादशाह के हाथ में दे दिया | ये पत्र अजमेर के सूबेदार की और से बादशाह की सेवा में भेजा गया था | उस पत्र में कई बातें लिखी हुई थी,किन्तु बादशाह की दृष्टि एक वाक्यांश पर जाकर उलझ गई | वह वाक्यांश क्या था –
” उदयपुर के महाराणा राजसिंह का देहांत हो गया है और ……|”
उसने इस वाक्यांश को कई बार पढ़ा | उसकी गंभीर मुखाकृति प्रसन्नता की असाधारण मुद्रा में बदल गई | बहुत ही कम अवसरों पर उस कूटनीतिज्ञ बादशाह के आंतरिक भाव अनुभावों के रूप में प्रकट होते थे | पर उस दिन वह अपने चेहरे पर अठखेलियाँ करती हुई प्रसन्नता की रेखा को छिपा नहीं सका | सभी चतुर दरबारियों ने अनुमान लगा लिया था कि उस पत्र में कोई असाधारण प्रसन्नता सूचक संवाद अवश्य था | बादशाह कुछ देर तक उसी मुद्रा में बैठा -बैठा सोचता रहा फिर उसने कहा –
” अब दरबार बरखास्त किया जाता है |”
और उठकर वह अपने निजी कक्ष में चला गया |
उसी रात्री के दुसरे प्रहर में बादशाह के निजी कक्ष में शहर काजी और सुन्नी सम्प्रदाय के कुछ प्रतिष्ठित मौलवियों की एक गुप्त मंत्रणा हुई | उस मंत्रणा में वाद-विवाद बिलकुल नहीं हुआ | केवल भावी योजना को क्रियान्वित करने के दो -तीन सुझाव आये | बादशाह ने उन सब सुझावों का समन्वय करते हुए व्यवहारिक योजना की रूप रेखा सब को बतला दी | जब वे लोग मंत्रणा कक्ष से बाहर निकले,तब उनके चेहरों को किसी किसी अज्ञात प्रसन्नता की हिलोरें थपथपाकर प्रफुल्लित बना रही थी |
इस घटना के काफी समय पश्चात् कटक नदी के दक्षिणी किनारे पर सत्तर हजार मुसलमानी सेना पड़ाव डाले हुए थी | उस पड़ाव के दक्षिणी किनारे पर राजपूताने के राजपूत राजाओं की भी दस हजार सेना ठहरी हुई थी | इसी राजपूत सेना के मध्य में अवस्थित एक उच्च तम्बू में चिराग के मंद प्रकाश में सभी हिन्दू राजा बैठे हुए कोई गुप्त मंत्रणा कर रहे थे | उनके सामने कोई गंभीर समस्या उपस्थित थी | सब राजा लोग उसी का समाधान करने में खोये हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे |
” इस समय काबुल या कश्मीर की और से कोई विशेष उपद्रव भी नहीं है | अफरीदियों का विद्रोह इतना गंभीर नहीं है, जिससे इतनी पड़ी शाही सेना को भेजना पड़े | मारवाड़ और दक्षिण की सैनिक आवश्कताओं की अवहेलना करके इतनी बड़ी सेना को इस और भेजना बादशाह की किसी गूढ़ योजना का ही परिणाम हो सकता है |”
” मुझे तो कोई गूढ़ योजना क्या,यह बना बनाया कोई निश्चित षड्यंत्र मालूम होता है |”
” हाँ षड्यंत्र ही है,नहीं तो इस मुसलमानी क्षेत्र में सत्तर हजार सेना के साथ राजपूतों की केवल दस हजार को ही आने की क्यों आज्ञा दी जाती है ? यह पहला अवसर है,जब हम सब लोगों को एक बड़ी मुसलमानी सेना के साथ उत्तर में भेजा गया है | और हमारी सेनाओं को मुसलमान सेनापतियों की आज्ञा में दक्षिण को |”
” इससे पहले तो हमको कभी भी इस प्रकार से अपनी सेनाओं से पृथक नहीं किया गया |”
“यह तो ठीक है,किन्तु हमारे साथ क्या षड्यंत्र हो सकता है ? हम तो तख़्त के वफादार है |”
“किन्तु यह बादशाह अकबर नहीं,औरंगजेब है | वफ़ादारी और सच्चाई को यह मजहब की डोरी से नापता है | इसके लिए जो गैर मजहब के है वे सब नमकहराम,बेईमान,नालायक,काफिर है,जिनको सजा देना है,वह इस्लाम की सबसे बड़ी सेवा और पुन्य का काम समझता है |”
“इतने में आमेर के महाराजा रामसिंह ने तम्बू में प्रवेश किया | वे अपने आसन पर बैठ ही न पाए थे कि एक ने पूछा –
” क्या कोई नया सूत्र मालूम हुआ है ?”
“एक क्या सभी नए सूत्र मालूम हो गए है | हमारे साथ एक भीषण षड्यंत्र किया जा रहा है |”
“षड्यंत्र ? हमारे साथ कैसा षड्यंत्र ? हम तो मुगलिया खानदान के चाकर और तख़्त के वफादार सिपाही है |”
” वह वफादार सिपाही नहीं चाहता,वफादार अनुयायी चाहता है |”
“वफादार अनुयायी ?”
“हाँ ! वफादार अनुयायी,मजहबी अनुयायी |”
यह सुनते ही सब राजाओं के चेहरों का का रंग उड़ गया | वे परित्राण का कोई मार्ग पाने के लिए एक दूसरे का मुंह को भय मिश्रित मुद्रा में ताकने लगे | इतने में महाराजा रामसिंह आमेर ने आगे कहना प्रारंभ किया –
” बादशाह मेरे पिताजी (जयसिंह) से बहुत भयभीत रहता था | उनके जीवित रहते हुए वह हिन्दू धर्म में हस्तक्षेप नहीं कर सका,किन्तु उनके स्वर्गवासी होते ही उसने हिन्दू मंदिरों को भ्रष्ट करना आरम्भ कर दिया | वह महाराजा जसवंतसिंह जी से भी बहुत डरता था और इसीलिए उन्हें अपने से हमेशा दूर रखता था | उनको उसने विष देकर मरवा दिया और मारवाड़ खालसा कर लिया | अब वह उनके उत्तराधिकारी और कुटुंब को मुसलमान बनाने पर तुला हुआ है | अपने अब तक के अनुभव से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि हिन्दुओं के मंदिरों व धर्म स्थलों को भ्रष्ट करने मात्र से हिन्दू धर्म समाप्त नहीं होगा | उसने यह भी समझ लिया है कि सब हिन्दुओं को मुसलमान बनाना न लाभदायक है और न ही व्यवहारिक ही | इसीलिए वह हिन्दू धर्म के प्रेरणा के स्रोत नष्ट करके उनके परम्परागत राजनैतिक और सामाजिक नेताओं को मुसलमान बनाना चाहता है | ऐसा होने पर हिन्दू धर्म स्वत: मुरझा कर नष्ट हो जायेगा | इस कार्य में उसके सबसे प्रबल बाधा हिन्दू धर्म के परम्परागत रक्षक महाराणा राजसिंह जी थे | उनके रहते हुए बादशाह को यह कार्य करने का साहस नहीं हो रहा था किन्तु भगवान् ने अब उनको भी इस संसार से उठा लिया है | इसलिए अब हम हिन्दू जाति के नेता और रक्षकों को मुसलमान बनाना चाहता है और परसों ही जुम्मे को बनाना चाहता है |”

क्रमश:

महाराजा करणसिंह जी बीकानेर का चित्र भेजने के लिए भाजपा के युवा नेता अभिमन्युसिंह राजवी का हार्दिक आभार |

4 Responses to "जय जंगलधर बादशाह -1"

  1. प्रवीण पाण्डेय   March 29, 2011 at 5:40 pm

    रोचक।

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  2. ललित शर्मा   March 30, 2011 at 3:04 am

    औरंगजेब ने मजहबी शासन ही चलाया।

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  3. Gajendra singh Shekhawat   September 20, 2013 at 2:35 am

    ओरंगजेब धर्मान्ध क्रूर शासक हुआ है , वह विभिन्न हिन्दू मंदिरों को नष्ट करता हुआ जब सीकर जिले की "माँ जीण" के मंदिर की तरफ बढा तो माता ने उसकी आँखे खोल दी | शाही सेना को मुह की खाकर भागना पड़ा ।

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  4. Gajendra singh Shekhawat   September 20, 2013 at 2:37 am

    ओरंगजेब धर्मान्ध क्रूर शासक हुआ है , वह विभिन्न हिन्दू मंदिरों को नष्ट करता हुआ जब सीकर जिले की माँ जीण के मंदिर की तरफ बढा तो माता ने उसकी आँखे खोल दी | शाही सेना को मुह की खाकर भागना पड़ा ।

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