Jamwai Mata शेखावत, राजावत, नारुका कच्छवाहों की कुलदेवी

Jamwai Mata : ११ दिसंबर २०१२ को भानगढ़ जाते समय जमवा रामगढ़ बांध जिसका कभी जयपुर की प्यास बुझाने के लिए निर्माण किया गया था को पानी की कमी से सुखकर खुद प्यासे देख मन बहुत विचलित हुआ| वहां से आगे चलते हुए बांध की हालात और उसके जिम्मेदार प्रभावशाली लोगों द्वारा बांध के डूब क्षेत्र में भूमि का अतिक्रमण करने की बात सुन मन में द्वंद चल ही रहा था कि प्रदीप शेखावत ने गाड़ी जमवाय माता मंदिर के आगे गाड़ी रोकते हुए कहा- “हमारी कुलदेवी का मंदिर आ चुका है|”
गाड़ी से उतर कर ब्लॉगर ललित शर्मा व पत्रकार प्रदीप शेखावत के साथ मंदिर में देवी के दर्शन किये तभी मंदिर के पंडित जी भी आ गए| यथा अभिवादन व हमें प्रसाद आदि देने के बाद पंडित जी मंदिर के प्रति वन विभाग के अधिकारियों के रवैये की चर्चा करते हुए अपनी व्यथा सुनाने लगे जिसे सुन मन सोचने लगा कि एक मंदिर के प्रति वन अधिकारियों का गलत रवैया है जो इस प्रदेश का प्राचीनतम मंदिर है, जो कभी इस क्षेत्र पर शासन करने वाले शासकों और उस वंश की कुलदेवी का मंदिर है, जो हजार से ज्यादा वर्षों से जन आस्था का मंदिर है| दिमाग में ये बातें आते ही मन फिर विचलित हो गया|
  • क्या थी पंडित जी की व्यथा-पंडित जी के अनुसार- वन विभाग के अधिकारी मंदिर के नाम का बोर्ड तक नहीं लगाने देते जिससे पास गुजरने वाले अनजान यात्रियों को इस प्राचीन मंदिर की पहचान ही नहीं होती|
    -वन विभाग के अधिकारी मंदिर में कभी लाउडस्पीकर नहीं लगाने देते है| कहते है ये वन विभाग की जमीन पर बना है एक तरह से वन विभाग की जमीन पर अतिक्रमण है ये मंदिर|
    -यात्रियों के आराम के लिए निर्माणधीन एक बरामदे का निर्माण भी वन विभाग के अधिकारियों ने रुकवा दिया| कहते है ये वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की जमीन है यहाँ आप कुछ नहीं बना सकते|
    -जब वन विभाग के अधिकारी मंदिर के नाम का मंदिर की दीवार तक पर बोर्ड नहीं लगाने देते तो निर्माण कार्य क्या करने देंगे?
  • मंदिर का इतिहास –

Jamvay Mata के मंदिर की स्थापना मध्यप्रदेश के नरवर से आकर राजस्थान में कछवाह राज्य स्थापित करने वाले दुल्हेराय जी कछवाह ने की थी| दुल्हेराय जी का राजस्थान में आने का समय विभिन्न इतिहासकार वि.संवत ११५० से ११८० सन १०९३ से ११२३ के बीच मानते है| “अदम्य योद्धा महाराव शेखाजी” पुस्तक के लेखक कर्नल नाथू सिंह अपनी इस पुस्तक में दुल्हेराय का राजस्थान आने का समय वि.स.११२५ के आस-पास लिखते है|

मध्यप्रदेश के नरवर के शासक सोढ्देव के पुत्र दुल्हेराय का दौसा के पास मोरा के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री के साथ विवाह हुआ था| दौसा पर उस वक्त रालण सिंह चौहान व बडगुजरों का आधा आधा राज्य था| बडगुजर हमेशा रालण सिंह को तंग किया करते थे सो उसने अपने दामाद दुल्हेराय को बुलाकर उसकी सहायता से बडगुजरों को हराकर दौसा पर कब्ज़ा कर लिया और दौसा का राज्य दुल्हेराय को सौंप दिया उसके बाद दुल्हेराय ने भांडारेज के मीणा शासकों को हराकर भांडारेज भी जीत लिया| भांडारेज जीतने के बाद दुल्हेराय ने मांच के मीणा शासक पर हमला किया पर मांच के बहादुर मीणाओं ने दुल्हेराय को युद्ध में करारी शिकस्त दी| इस युद्ध में दुल्हेराय की सेना को काफी नुक्सान हुआ और स्वयं दुल्हेराय घायल होकर मूर्छित हो गए थे जिन्हें मीणा सैनिक मरा हुआ समझ छोड़ गए थे| इतिहासकारों के अनुसार युद्ध भूमि में ही मूर्छित दुल्हेराय को जमवाय माता ने दर्शन दिए व युद्ध में विजय होने का आशीर्वाद भी दिया| देवी की कृपा से दुल्हेराय मूर्छित अवस्था से उठ खड़े हुए और जीत का जश्न मनाते मांच के मीणों पर अचानक आक्रमण कर उन्हें मार भगाया और मांच पर अधिकार कर लिया|

Jamvay mata

मांच पर अधिकार के बाद दुल्हेराय ने मांच में एक चबूतरा बनाकर उस पर देवी जमवाय माता की मूर्ति की स्थापना की जो आज भी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है| इसके बाद दुल्हेराय ने मांच का नाम अपने पूर्वज राम व Jamvay Mata के नाम पर जमवा रामगढ़ रख अपनी राजधानी बनाया| मांच विजय के बाद दुल्हेराय ने खोह, गेटोर,झोटवाड़ा आदि मीणा राज्यों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया व अपनी राजधानी को जमवा रामगढ़ से खोह स्थान्तरित कर दिया| दुल्हेराय की माघ सुदी ७ वि.स.११९२ में मृत्यु होने बाद उनका पुत्र कांकल देव गद्दी पर बैठा जिसने आमेर के मीणा शासकों को हराकर खोह से अपनी राजधानी आमेर स्थान्तरित की जो जयपुर की स्थापना तक उनके वंश की राजधानी रही|

सिर्फ आमेर,जयपुर ही नहीं दुल्हेराय कछवाह वंश के वंशजों ने राजस्थान के और भी बड़े भू-भाग पर अपने अपने कई राज्य यथा- अलवर,खंडेला,सीकर,झुंझनू,खेतड़ी,दांता,खुड,नवलगढ़,मंडावा आदि स्थापित कर देश की आजादी तक राज्य किया| राजस्थान में दुल्हेराय के वंशज राजावत, शेखावत, नरूका, नाथावत,खंगारोत आदि उपशाखाओं के नाम से जाने जाते है|

देवी Jamvay Mata के मंदिर की दुल्हेराय जी द्वारा स्थापना करने के बाद उनके वंश के विभिन्न शासकों ने मंदिर में समय समय पर निर्माण कार्य करवा कर उसका विस्तार करवाया तथा देवी जमवाय माता को अपनी कुलदेवी के रूप में रूप ने स्वीकार करते हुए इसकी आराधना की| कछवाह वंश की सभी उपशाखाओं के शासक व आम वंशज जन्म, शादी, पगड़ी दस्तूर के बाद यहाँ जात देने आवश्यक रूप से आते थे तथा आज भी यह परम्परा सुचारू रूप से जारी है| इस तरह यह मंदिर कछवाह वंश के लोगों की अपनी कुलदेवी के रूप में आस्था का केन्द्र तो है ही साथ इस पुरे क्षेत्र में एक बहुत बड़ा जन-आस्था का प्राचीन समय केन्द्र भी है| इस मंदिर की प्राचीनता की पुष्टि इतिहास की पुस्तकों में तो है साथ ही मंदिर के बाहर लगा पुरातत्व विभाग का इस मंदिर की प्राचीनता को दर्शाते हुए लगा सूचना पट्ट भी पुष्टि करता है|

  • मंदिर- वन विभाग विवाद पर कुछ प्रश्न –पंडित जी के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह भूमि वन विभाग की है मंदिर के नाम जमीन का कोई रिकार्ड नहीं है| मतलब मंदिर वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण है|
  • – चुकिं यह मंदिर अति प्राचीन है| यहाँ के शासकों द्वारा स्थापित है निर्माण कार्य भी उस वक्त के शासकों द्वारा ही किया हुआ है| चूँकि शासकों द्वारा स्थापित होने की वजह से तत्कालीन प्रशासकों ने मंदिर भूमि का पट्टा आदि बनाने की जरुरत ही समझी होगी| यही वजह रही होगी कि तत्कालीन शासकों के रिकार्ड में भी भूमि की मंदिर के नाम पर प्रविष्टि ना हो|
  • – चूँकि मंदिर प्राचीन है तत्कालीन शासकों द्वारा बनाया गया है अत: किसी भी प्रकार से इसे किसी की भी भूमि का अतिक्रमण नहीं कहा जा सकता|
  • – चूँकि मंदिर वन विभाग के गठन से पूर्व का बना है अत: यदि मंदिर सहित परिसर की भूमि का इंद्राज वन विभाग के अधीन भूमि में हो गया तो इसे एक प्रशासनिक भूल मानकर भूमि मंदिर के नाम कर देनी चाहिए|
  • – चूँकि मंदिर वन विभाग के गठन के पूर्व में बना है तो क्या ऐसी दशा में भूमि पर अतिक्रमण मंदिर ने नहीं बल्कि मंदिर व मंदिर परिसर की भूमि पर अतिक्रमण वन विभाग ने सरकार के साथ मिलकर नहीं किया ?
  • – यदि मंदिर परिसर की भूमि को वन विभाग अपनी होने का दावा करता है और वन विभाग की भूमि पर निर्माण कार्य मना है तो फिर तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा यात्रियों के रुकने के लिए मंदिर के पास यात्री निवास का निर्माण कैसे संभव हुआ ?
  • – प्रदेश भर में ऐसे और भी कई धार्मिक स्थल है जो वन भूमि में वन विभाग के गठन के बाद बने है और उनमें आज भी जरुरत के हिसाब से निर्माण कार्य हो जाते है, उनके बोर्ड भी लगे है, उनमे बिजली कनेक्शन जैसी सुविधाएँ भी है तो फिर विभाग के अधिकारियों ने उन धार्मिक स्थलों को इस प्रकार की छूट किस कानून के तहत दे रखी है ?
  • क्या कहते है वन अधिकारी ?इस सम्बन्ध में जब जमवा रामगढ वन विभाग की इंचार्ज वन अधिकारी आकांक्षा चौधरी से मैंने बात की तो उन्होंने माना कि मंदिर की कुछ जमीन राजस्व रिकार्ड में है तथा कुछ भूमि वन विभाग की है|
    वन अधिकारी ने बताया कि कुछ माह पहले मंदिर की तरफ से कुछ लोग इस सम्बन्ध में मिलने आये थे जिन्हें मैंने समझाया कि आप मंदिर के लिए जितनी चाहिए उसका एक प्रोपोजल बनाकर लाइए जिसे मैं वाइल्ड लाइफ कार्यालय को मंजूरी के लिए आगे भेज दूंगी और विभाग से मंजूरी आते ही आप विभाग द्वारा तय लगभग नौ लाख बीस हजार रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से विभाग में भूमि का मूल्य जमा कर भूमि मंदिर के नाम करवा लीजिये| लेकिन इन लोगों ने बजाय इस तरह की क़ानूनी कार्यवाही करने के मुझे कुछ नेताओं से फोन करवाये तो मैंने नेताओं को भी यही बात बताई|
    वन विभाग की अधिकारी ने आगे कहा कि वह भी एक धार्मिक आस्था वाली नारी है किसी की भी धार्मिक आस्था पर चोट करना वह पाप समझती है पर उसकी भी कुछ जिम्मेदारियां है और वह कानून के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा सकती न किसी को उठाने की इजाजत देगी| मंदिर समिति को विभाग के नियमानुसार भूमि अपने नाम करवा लेनी चाहिए और फिर आराम से वहां अपनी धार्मिक गतिविधियाँ पुरी आजादी के साथ करनी चाहिए|जब मैंने तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा वहां बनाई गए यात्री विश्राम गृह के बारे में बात की तब उन्होंने बताया कि- यह स्थल भी वन विभाग की भूमि पर बना है और तत्कालीन राष्ट्रपति के परिवार को भी वहां निर्माण की इजाजत नहीं मिली थी पर बाद में उन्हें वहां बने कुछ पुराने कमरों की मरम्मत की इजाजत मिली जिसकी आड़ में वह निर्माण किया गया पर अब उस निर्माण कार्य के लिए भी प्रधान मंत्री कार्यालय से शिकायत आई हुई है जिसकी जाँच हो रही है| इस जाँच के बाद तत्कालीन वन अधिकारीयों पर गाज गिरना भी तय लग रहा है|

     

  • और भी है पक्षकारइस मुद्दे पर श्री राजपूत करणी सेना के संयोजक श्यामप्रताप सिंह राठौड़ ने बताया कि- “मंदिर का स्वामित्व जयपुर के पूर्व राजघराने के पास है यदि कोई भी व्यक्ति अपनी कुलदेवी के मंदिर के रखरखाव आदि के लिए कोई भी कार्य करवाना चाहे मसलन सफेदी भी करवाना चाहे तो उसे पहले पूर्व राजघराने से इजाजत लेनी पड़ती है जो एक आम श्रद्धालु के बस की बात नहीं होती|साथ उन्होंने बताया कि इस Jamvai Mata मंदिर पर पुरातत्व विभाग की भी नजर है कुछ समय पूर्व पुरातत्व विभाग ने मंदिर पर थोड़ा धन खर्चकर मंदिर के आगे पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी लगाया है|

    Jamwai Mata मंदिर मामले में इतने पक्षकारों के होने व पूर्व राजघराने द्वारा इस प्रकरण में दिलचस्पी न लेने के चलते भविष्य में यही लग रहा है कि- इस मंदिर को उचित रखरखाव व नाम पट्ट के लिए शायद अभी भी कई वर्षों तक इंतजार ही करना पड़ेगा| इस मंदिर में आस्था रखने वाले श्रद्धालु भी शायद चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएंगे|

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