इस राजा के पक्ष में भूतों ने ये किया था !

इस राजा के पक्ष में भूतों ने ये किया था !

उस समय अहमदाबाद पर महमूद बेग का शासन था,उसके राज्य में पाटण नाम का एक नगर उसका सूबेदार हाथीखान | पाटण नगर के अधीन ही एक गांव का तेजसिंह तंवर नाम का एक राजपूत रहवासी | तेजसिंह नामी धाड़ायती,दूर तक धाड़े (डाके) डालता, उसके दल में तीन सौ हथियार बंद वीर राजपूत | उसके नाम से करोडपति और लखपति कांपते थे | वह धनि व्यक्तियों के यहाँ डाका डालता और धन गरीबों में बाँट देता | गरीब ब्राह्मणों की कन्याओं के विवाह में खर्च करता,चारण कवियों को दिल खोलकर भेंट देता | धनि व्यक्तियों को देखते ही नहीं छोड़ता पर गरीबों का पूरा पालन करता | पाटण के सूबेदार हाथीखान और उसके बीच अक्सर तलवारें बजती रहती थी | एक दिन तेजसिंह अपने साथियों के साथ डाका डालकर बहुत दूर से आ रहा था,उसका दल काफी थका हुआ था,वह अपने दल के साथ आराम कर रहा था कि पाटण के सूबेदार हाथीखान ने अपने दलबल सहित उसे आ घेरा | कोई डेढ़ दो घड़ी तलवारे बजी और तेजसिंह अपने तीन सौ राजपूतों के साथ कट कर लड़ता हुआ मारा गया |

तेजसिंह और उसके सभी मृत राजपूत भूत बन गए | तेजसिंह की पत्नी अपनी पुत्री को लेकर अपने मायके चली गयी | पीछे से तेजसिंह का पुरा गांव उजड़ गया | उसके महल खंडर बन गए और उनमे रात पड़ते ही तेजसिंह के भूत बने साथी आ जाते,खाते,पीते,महफ़िल करते,दिन उगते से पहले चले जाते | उस गांव में भूतों के डर के मारे कोई नहीं जाता | एक दिन बात एक साधू उधर से गुजर रहा था शाम हो चुकी थी साधू ने तेजसिंह के खाली पड़े महल देखे,साधू ने सोचा पुरा घर खाली पड़ा है रात को यहाँ ठहरना ही ठीक रहेगा | और साधू ने तेजसिंह के टूटे महल के एक कोने में अपना आसन जमा लिया | थोड़ी सी रात गुजरते ही साधू को नंगारे की आवाज सुनाई दी ,देखा तो तेजसिंह की सवारी आती दिखाई दी थोड़ी देर में तेजसिंह का काफिला आ पहुंचा, घोड़े,सरदार, गाने वाले,नौकर सब थे उस काफिले में | महल में जाजम,गलीचे बिछाए गए,तेजसिंह गादी पर बैठ हुक्का पीने लगे उसका दरबार लग चूका था महफ़िल शुरू हो गयी थी | साधू एक कोने में बैठा ये सारा तमाशा देख रहा था कि तेजसिंह की नजर साधू पर पड़ी | तेजसिंह बोला- “बाबाजी प्रणाम ! इधर पधारिये डरने की कोई बात नहीं है |” साधू डरते डरते तेजसिंह के पास पहुंचे |

तेजसिंह ने आगे कहना शुरू किया – “बाबाजी आप जो देख रहे है यह सब भूतों की माया है मैं तेजसिंह तंवर हूँ ,हाथीखान के हाथों मारे जाने के बाद मैं और मेरे तीन सौ राजपूत भूत योनी को प्राप्त हुए शायद भगवान की यही इच्छा थी,मैंने कई समझदारों से पूछा -उन्होंने बताया कि आपकी मनुष्य योनी की जो पुत्री है उसका ब्याह कर कन्यादान करने पर ही आपको भूत योनी से छुटकारा मिलेगा और आपकी गति हो जाएगी | इसलिए हे साधू महाराज आप मेरा एक काम कर दीजिये,मैं आपको एक सन्देश दूंगा वह जाकर आप मेरे बताये व्यक्ति को दे देना |” बाबा बोले -” बच्चा तेरा सन्देश जरुर पहुँच जायेगा , बता सन्देश क्या है ? और किसे देना है ?”

तेजसिंह बोला- ” बाबाजी यहाँ से पचास कोस दूर एक महुवा नामक गांव है वहां के मालिक मल्लिनाथजी है उनका पुत्र जगमाल है वही मेरी बेटी के लायक वर है दुसरे किसी की तो भूत की बेटी से ब्याह रचाने की हिम्मत भी नहीं पड़ेगी ,वह वीर पुरुष है आप तो उसे जाकर मेरा ये सन्देश दे देना कि यहाँ आकर मेरी बेटी से ब्याह करले ताकि मेरी गति हो जाये |”

बाबाजी तो हाँ कर सो गए उन्हें भूतों ने उठाकर रात को महुवा गांव में छोड़ दिया,सुबह बाबा उठे और जगह का नाम पूछा तो उन्हें पता चला कि वे महुवा पहुँच चुके है,बाबाजी ने जगमाल को जाकर तेजसिंह का सन्देश दे पूरी बात बतायी | सन्देश पाकर जगमाल तो दो तीन बाद तेजसिंह के गांव उसके महलों में जा पहुंचा ,रात होते ही तेजसिन्घ अपने दल के साथ आ पहुंचा,जगमाल को देख उसे बहुत ख़ुशी हुई वह जगमाल से बांहों में लेकर मिला – “कुंवरजी मुझे आप पर ही भरोसा था | मेरी बेटी से ब्याह रचाकर मुझे आप ही गति दिलवा सकते थे |”

उसके बाद भूतनियां गयी और तेजसिंह की बेटी को सोते हुए उठा लायी | उसके बाद भूत और भूतनियों ने ब्याह की सभी रस्में शुरू की, लड़की को हल्दी लगायी, तेल चढ़ाया, ब्याह के कपडे पहनाएं, गीत गाये और तेजसिंह की बेटी को फेरों में बिठा दिया, तेजसिंह ने कन्यादान किया | तेजसिंह खुश हुआ अब उसको भूत योनी से गति मिल जाएगी उसने जगमाल से कुछ मांगने को कहा |

जगमाल बोला- “आपका आशीर्वाद चाहिए, भगवान् की दया से सब कुछ है मेरे पास, मुझे कुछ नहीं चाहिए पर राजपूत का बेटा हूँ अक्सर झगडे फसाद होते रहते है कभी बदला लेने तो कभी अपने नागरिको की रक्षा करने, इसलिए मैं चाहता हूँ जब किसी बड़े झगडे का काम पड़ जाये तो ये भूत बने आपके तीन सौ राजपूत मेरी मदद के लिए आ जाये |” तेजसिंह ने अपने सभी राजपूतों को इकठ्ठा किया और कहा- “मेरे वीरों ! जिस दिन भी तुम्हे ये जगमाल याद करे इसकी मदद को हाजिर हो जाना जो नहीं आया मैं उसको नमक हराम समझूंगा |”

सभी भूतों ने तेजसिंह के सामने कसम खाकर तेजसिंह को आश्वस्त कर दिया कि-” जगमाल के तीन ताली बजाते ही हम मदद को आ खड़े होंगे |” तेजसिंह की गति हो गयी | जगमाल अपनी वधु को लेकर घर आ गया | सुख से राज करने लगा अपनी प्रजा की रक्षा में लग गया |हाथीखान की नजर एक बार जगमाल के गांव की औरतों पर पड़ गयी वह मौका देख रहा था कि कब उसके गांव की औरतों को उठाया जाय,एक दिन हाथीखान के जासूसों ने खबर दी कि जगमाल बीकमपुर के भाटियों से बैर लेने गया हुआ है और उसके गांव की महिलाऐं तीज की सवारी निकालने को इकठ्ठा होगी | हाथीखान ने मौका देखा और तीज की सवारी के दिन गांव पर धावा बोल १४० औरतों को उठा ले गया | गांव के लोग हल्ला करते ही रह गए | जब जगमाल आया और उसे घटना का पता चला तो उसके कलेजे में आग लग गयी |उसी समय अपनी पगड़ी उतार सिर पर रुमाल बाँध लिया कि -जब तक हाथीखान से बदला नहीं लूँगा तब तक पगड़ी सिर पर नहीं रखूँगा |

अब जगमाल को बदला लिए बिना चैन नहीं पर हाथीखान जैसे सक्षम से बदला लेना भी कोई आसान काम नहीं | जगमाल की बैचेनी देख उसके प्रधान भूपजी ने चुपचाप योजना बनायीं उन्होंने जगमाल के अस्तबल के घोड़ों को बढ़िया प्रशिक्षण दिया तेज दौड़ने का |वो भी अहमदाबाद जाने वाले रास्तों पर | साथ ही भूपजी ने अपने दो जासूस अहमदाबाद में छोड़ दिए कि-” मौका देख मुझे वहां की खबर देना | हाथीखान तो सूबेदार है उससे क्या बदला लेना उसने जो हमारे साथ किया उसका सवाया जब तक नहीं किया तब तक हम कैसे राजपूत ?”

चेत्र का महिना आया अहमदाबाद में गणगोर के मेले की तैयारी शुरू | महमूदबेग की कुंवारी पुत्री गिंदोली रोज अपनी सहेलियों के साथ गणगोर लेने जाए | ये बात जासूसों ने भूपजी तक पहुंचाई | भूपजी पच्चीस तीस सवार ले जगमाल को बिना बताये अहमदाबाद चले गए वहां मौका देख एक गिंदोली को उठा घोड़े पर बिठा लिया | महमूदबेग के लोगों ने उनका पीछा किया पर उनके प्रशिक्षित घोड़ों की बराबरी नहीं कर सके | जाते जाते भूपजी कह आये – “मैं जगमाल का राजपूत हूँ , महुवा गांव से आपका सूबेदार हमारे गांव की औरते उठा लाया था उसकी का बदला लेने आपकी शहजादी को उठा ले जा रहा हूँ तुममे हिम्मत हो तो इसे छुड़ाकर ले जाना |”
और भूपजी सीधे गिंदोली को ले महुवा आ पहुंचे उस वक्त जगमाल गणगोर की सवारी की रक्षा में चल रहा था | भूपजी ने वही जगमाल को सब कुछ बताकर गिंदोली उसे सोंपी – “अहमदाबाद के बादशाह महमूदबेग की शहजादी हाजिर है | आपका बदला लेने के लिए मैं इसे उठा लाया हूँ |”

जगमाल बड़ा खुश हुआ उसने गणगोर लेने जाने वाली महिलाओं से गीत गाने को कहा | महिलाओं ने गिंदोली व जगमाल के ऊपर गीत बनाकर गाये | उस दिन के बाद से ही राजस्थान में अब तक गणगोर के दो दिन पहले गिंदोली के गीत गाये जाते है |

गिंदोली गुजरात सूं ,असपत री आण ,
राखी रंग निवास में,थे जगमल जुवान |

अब महमूदबेग एक बहुत बड़ी फ़ौज लेकर महुवा पर चढ़ आया,हाथीखान भी अपने दलबल के साथ था | उसकी विशाल फ़ौज ने महुवा के पास आकर डेरा लगा दिया | उधर उसके मुकाबले के खातिर जगमाल ने भी अपने चार हजार घुड सवार राजपूतों को युद्ध के लिए तैयार किया पर जगमाल ने सोचा कि बादशाह की इतनी बड़ी फ़ौज के आगे मेरे चार हजार आदमी कहाँ टिक पाएंगे उसे तेजसिंह के (भूत ) ३०० राजपूत याद आये कि वे फिर कब काम आयेंगे | जगमाल ने भूतों के लिए लापसी,घूघरी बनवाई,शराब की तुंगे भरवा दी,अफीम घोलकर बरतन भरवा दिए | रात होते ही जगमाल ने तो तीन ताली बजायी | तेजसिंह के ३०० भूत तुरंत हाजिर हो गए | जगमाल ने उनकी मनुहार की, खूब खिलाया. पिलाया. अफीम की मनुहारें की | भूतों ने खा पीकर मस्त हो हाथों में तलवारें ले जगमाल से युद्ध का हुक्म माँगा |
जगमाल बोला- “हे भूत सरदारों ! मेरी आपसे एक विनती है | आप जब भी दुश्मन पर तलवार का वार करें यह कहते जाएँ कि- ये “जगमाल की तलवार ” आप तो वार करते जाना और यह वाक्य दोहराते जाना |”

नशे में धुत मतवाले भूतों ने यही किया, रात को ही बादशाह की फ़ौज पर टूट पड़े | ये जगमाल की तलवार और एक मुंड कट गिरे | जिधर भी सुनाई दे उधर ही सुनने को मिले “ये जगमाल की तलवार” और हाथी, घोडा, सिपाही कट कट कर गिरने लगे | बादशाह की फ़ौज में भगदड़ मच गयी उसके सैनिक भागने लगे | भूतों ने पीछा कर उन्हें मारा वे वार करते और कहते “ये जगमाल की तलवार” इस तरह पीछा करते करते भूतों ने बादशाह की फ़ौज को भगा दिया | बादशाह के सैनिको ने अहमदाबाद पहुँच बताया कि “वहां तो हमने अजब गजब तमाशा देखा जिधर भी सुना उधर ही जगमाल की तलवार का नाम सुनाई दिया | बीबीयाँ मिंयाँजी से पूछने लगी -“ऐसे कितने जगमाल थे ? जो हर तरफ सुनाई दे रहा था कि – ये जगमाल की तलवार |

पग पग नेजा पाडिया,पग पग पाड़ी ढाल |
बीबी पूछे खान ने, जग केता जगमाल ||

नोट- यह कहानी मैंने पद्मश्री रानी लक्ष्मीकुमारी चुंडावत द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखी हुई उनकी पुस्तक ” कैरे चकवा बात” में पढ़ी थी | जिसे मैंने कुछ छोटा कर अपनी भाषा में यहाँ प्रस्तुत करने की कोशिश की है | आशा है आपको पसंद आएगी |

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