34.1 C
Rajasthan
Sunday, May 22, 2022

Buy now

spot_img

कन्हैयालाल सेठिया की कविता “अरे घास री रोटी ही” का ये है सच

भारत में इतिहास लेखन कभी रुचिकर नहीं रहा| भारतीय शासक इतिहास लेखन को लेकर प्राचीन काल से उदासीन रहे| लेकिन भारत के साहित्यकारों ने अपने साहित्य में ऐतिहासिक घटनाकर्मों का जमकर जिक्र किया| यही कारण है कि राजस्थान सहित भारत का ज्यादातर साहित्य वे ही लोग समझ सकते है जो इतिहास के जानकार है| और इतिहास भी वे ही लोग ठीक ढंग से व सही अर्थ में समझ सकते है, जिन्हें भारतीय साहित्य की समझ हो| चूँकि भारतीय साहित्य स्थानीय भाषाओँ में लिखा है, जो हर किसी के समझ में आ जाये संभव नहीं| हर भाषा का साहित्य उसी क्षेत्र के लोग जो उस स्थानीय भाषा से जुड़े हों, ही समझ सकते है| यही कारण है कि विदेशियों द्वारा लिखे गए इतिहास में बहुत सी भ्रांतियां लिख दी गई, हालाँकि कर्नल टॉड जैसे इतिहास लेखकों की मंशा कतई गलत नहीं थी, पर सही ऐतिहासिक तथ्यों की नासमझी और सुनी सुनाई बातों के आधार पर उन्होंने इतिहास लिख डाला|

लेकिन इस साहित्य में साहित्यकारों द्वारा युद्धों व उनमें अपने पसंदीदा नायकों का जिस अतिश्योक्ति से वर्णन किया है और अपने नायक के खिलाफ लड़ रहे को खलनायक साबित किया, उसने इतिहास में सबसे ज्यादा भ्रांतियां फ़ैलाने का काम किया| उदाहरण के तौर पर पृथ्वीराज चौहान और जयचंद का मामला लिया जा सकता है| इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज-गौरी युद्ध में जयचंद में कोई भूमिका ही नहीं थी, लेकिन चंदरबरदाई के पृथ्वीराज रासो के चलते जयचंद को आज गद्दार का पर्यायवाची शब्द बना दिया गया| जबकि जयचंद का कसूर सिर्फ इतना ही था कि उसके पृथ्वीराज से अच्छे संबंध नहीं थे|

इस मामले के साथ ही यदि हम महाराणा प्रताप के हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास पर चर्चा करें तो आज हर जगह महाराणा के जीवन पर बोलने वाले वक्ताओं के मुंह से महाराणा का इतिहास सुनने को मिलेगा -“महाराणा ने घास की रोटियां खाई, राजकुमार अमरसिंह के हाथ से जब बन बिलाव घास की रोटी छिनकर भाग गया तो राजकुमार अमरसिंह बिलख उठे| और यह दृश्य देख महाराणा की आँखे भर आई|

दरअसल राजस्थान के महान साहित्यकार व कवि स्व.कन्हैयालाल सेठिया ने, जिनका कुछ वर्ष पहले ही निधन हुआ है, ने महाराणा के संघर्ष को अपनी रचना में उकेरने, उपमा देने हेतु घास की रोटियां खाना और राजकुमार के हाथ से बन बिलाव द्वारा घास की रोटी छीन लेने की बात कही| और महाराणा के स्वतंत्रता हेतु संघर्ष को उपमाएं देने की इस बात को आज हम इतिहास मान बैठे| साहित्य हमें इतिहास की घटना की सूचना तो दे सकता है पर साहित्य में प्रयुक्त किये सभी शब्द व वाक्य इतिहास सम्मत हो ये जरुरी नहीं| चूँकि सेठिया जी की “अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलाव ले भाग्यो” कविता ज्यादा पुरानी नहीं है, फिर भी लोगों ने इस कविता में दी गई उपमाओं को इतिहास मान लिया तो हम समझ सकते है कि प्राचीन साहित्यिक ग्रंथों में लिखे इतिहास संबंधी तथ्य कैसे होंगे?

यदि सेठिया की इस रचना के ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करें तो पायेंगे कि इस कविता या रचना में बन बिलाव द्वारा अमर सिंह के हाथ से रोटी छिनने के बारे में बताई गई घटना मात्र काल्पनिक है| इसका इतिहास से कोई लेना देना नहीं| क्योंकि कवि ने अपनी रचना में जो कहानी बताई है वह ऐतिहासिक तथ्यों के एकदम विपरीत है| राजकुमार अमरसिंह हल्दीघाटी के युद्ध व उसके बाद राणा के संघर्ष के समय 17 वर्ष की आयु के थे| उस काल में 17 वर्ष का राजपूत बालक शेर व हाथियों से टक्कर लेने में सक्षम होता था| चित्तौड़ के इतिहास पर भी नजर डालें तो गोरा-बादल, पत्ता आदि बहुत कम उम्र के थे पर उन्होंने युद्धों में दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे और अपनी अप्रत्याशित वीरता की छाप छोड़ी थी| गोरा-बादल तो महज १२-१३ वर्ष के थे जब उन्होंने रानी पद्मिनी की योजनानुसार अलाउद्दीन खिलजी की कैद से राणा रतन सिंह को कमांडो ऑपरेशन कर छुड़ा लिया था| पत्ता ने अकबर द्वारा सूंड पर तलवारें बांधकर नशे में चूर मदमस्त भेजे गए हाथियों से टक्कर ली थी|

ऐसी दशा में समझा जा सकता है कि एक 17 वर्षीय राजकुमार और वह भी महाराणा प्रताप की परम्परा वाले उनके पुत्र के हाथों से कोई बन बिलाव रोटी छिनकर ले जाए, संभव नहीं| हल्दीघाटी का युद्ध जून 1576 में लड़ा गया था, जबकि राजकुमार अमरसिंह का जन्म 16 मार्च 1559 को हुआ था| इस तिथि से उनकी आयु देखी समझी जा सकती है|

इस तरह साफ़ है कि सेठिया जी की कविता “अरे घास री रोटी ही” मात्र साहित्यिक कल्पना है और यह महाराणा के संघर्ष को उपमाएं देने के लिए है ना कि इतिहास| इस तरह की रचनाओं व जनश्रुतियों को इतिहास ना मानकर सिर्फ इन्हें सुन या गाकर सिर्फ रसास्वादन मात्र करना चाहिए| इन्हें इतिहास मानकर कहीं भाषण या ज्ञान आदि नहीं झाड़ना चाहिए क्योंकि हमारा यह अल्प ज्ञान ही आगे चलकर इतिहास में भ्रांतियां पैदा करता है|

are ghas ri roti hi, kanhaiya lal ki rachna are ghas ri roti, maharana pratap, maharana amarsingh, chitthaud, chittore, gora-badal story in hindi, haldighati war, haldighati battle, rajasthani kavi sethia, sethiya ji, jaychand, jaichand, bharat mata ke veer putr maharana pratap

Related Articles

5 COMMENTS

  1. फितरत ही ऐसी है
    जब तक मिर्च मसाला न लगे
    बात ख़ास नहीं लगती

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Stay Connected

0FansLike
3,321FollowersFollow
19,600SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles