क्या क्षत्रिय ब्राह्मण ऋषियों की संतति है ?

भारतीयों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने, भारतीय संस्कृति को तबाह करने, भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए, उन्हें यह जताने के लिए कि वे जंगली थे, गंवार थे, के लिए झूंठा साहित्य व इतिहास रचा गया| मनघडंत काल्पनिक कहानियां लिखी गई| यहाँ की शासक जाति को विदेशी मूल का साबित करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया| पहले यह काम अंग्रेजों ने किया, बाद में आजादी मिलते ही वामपंथी और अपने आपको सेकूलर कहने वाले तथाकथित इतिहासकार अंग्रेज लेखकों की लिखी बातों का सन्दर्भ देकर उन्हीं तथ्यों का प्रचार-प्रसार करते रहे| जिस तरह इन तत्वों ने इतिहास से तोड़फोड़ कर इस देश की शासक जाति क्षत्रियों को विदेशी मूल का साबित करने की चेष्टा की, वहीं कुछ ब्राह्मण लेखकों ने क्षत्रियों के गोत्रों का ब्राह्मण गोत्रों से मिलने की बात को लेकर यह साबित करने की भरपूर कोशिश की कि क्षत्रिय ब्राह्मणों की संतति है| इस तरह अपने आपको क्षत्रियों से श्रेष्ठ साबित करने की मंशा से कुछ तत्वों ने क्षत्रियों को ब्राह्मणों का वंशज होने का दुष्प्रचार करने के इरादे से काफी कुछ बेमतलब की बातें लिख कर भ्रम फैलाया| ताकि आने वाली पीढियां उनका संदर्भ देकर राजपूतों को ब्राह्मणों की संतान समझे|और यह सब किया क्षत्रियों व ब्राह्मणों के मिलते जुलते गोत्रों की आड़ में|

चूँकि क्षत्रियों में अपने पुरोहित (गुरु) के नाम का गोत्र प्रयोग करने की प्रथा सदियों तक रही, इसी प्रथा के चलते क्षत्रियों के गोत्र ऋषियों या उन पुरोहितों के नाम पर रखे गये, जहाँ क्षत्रियों ने शिक्षा दीक्षा ली| चूँकि मध्यकाल के बाद कई राजपूत राजवंशों में शाखाओं, उपशाखों का विस्तार हुआ और वे शाखाएँ या उपशाखाएँ किसी पूर्वज या स्थान के नाम पर प्रचारित हुई, अत: क्षत्रिय युवकों ने भी इस नई बनी परम्परा की देखा-देखी गोत्रों के बारे में समझ लिया कि ये गोत्र जिस ऋषि की संतान है, उसी के नाम से बने है| लेकिन ऐसा नहीं है, यह सब क्षत्रियों पर अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में, उनका स्वाभिमान ख़त्म करने के षडयंत्र के तहत दुष्प्रचार किया गया| क्षत्रियों के गोत्र प्रकरण, या कहें क्षत्रिय ब्राह्मणों की संतति है, या नहीं प्रकरण पर क्षत्रिय इतिहास के विद्वान गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने काफी शोध किया और उन लेखकों को करारा जबाब दिया जिन्होंने इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया| ओझा ने अपनी पुस्तक “उदयपुर का इतिहास” भाग-1 के पृष्ठ 201 से 206 पर इस सम्बन्ध में काफी शोधपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किये है| इतिहासकार ओझा द्वारा किये शोध के कुछ तथ्य संक्षिप्त रूप में नीचे प्रस्तुत है, जो यह भ्रम मिटाने में सक्षम है कि क्षत्रिय किसी भी रूप में ब्राह्मणों की संतति नहीं है-

“श्रीयुत चिंतामणि विनायक वैद्य ने सन 1923 में “मध्ययुगीन भारत, भाग दूसरा नाम की मराठी पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें हिन्दू राज्यों का उत्कर्ष अर्थात् राजपूतों का प्रारंभिक (अनुमानत:ई.सन 750 से 1000 ता का) इतिहास लिखने का यत्न किया है| वैद्य महाशय ने उक्त पुस्तक में “राजपूतों के गोत्र” तथा गोत्र और प्रवर”, इन दो लेखों में बतलाने का तयं किया है कि क्षत्रियों के गोत्र वास्तव में उनके मूलपुरुषों के सूचक है, पुरोहितों के नहीं और पहले क्षत्रिय लोग ऐसा ही मानते थे|(पृष्ठ-61); अर्थात् भिन्न भिन्न क्षत्रिय वास्तव में उन ब्राह्मणों की संतति है, जिनके गोत्र वे धारण करते है|

वि.स. 1133 और 1183 के बीच दक्षिण (कल्याण) के चालुक्य (सोलंकी) राजा विक्रमादित्य (छठे) के दरबार में पंडित विज्ञानेश्वर ने “याज्ञावल्क्यस्मृति” पर “मिताक्षरा” नाम की विस्तृत टीका लिखी, जिसका अब तक विद्वानों में बड़ा सम्मान है और जो सरकारी न्यायालयों में भी प्रमाणरूप मणि जाती है| उस टीका में लिखा है है कि-“राजन्य (क्षत्रिय) और वैश्यों में अपने गोत्र (ऋषिगोत्र) और प्रवरों का अभाव होने के कारण उनके गोत्र और प्रवर पुरोहितों के गोत्र और प्रवर समझने चाहिए| साथ ही उक्त कथन की पुष्टि में आश्वलायन का मत उद्धृत करके बतलाया है कि राजाओं और वैश्यों के गोत्र वही मानने चाहिये, जो उनके पुरोहितों के हों| मिताक्षरा के उक्त अर्थ के विषय में श्रीयुत वैद्य का कथन है कि “मिताक्षराकार ने यहाँ गलती की है, इसमें हमें लेश मात्र भी सन्देश नहीं है (पृष्ठ-60)|

अब हमें यह निश्चय करने की आवश्यकता है कि मिताक्षरा के बनने से पूर्व क्षत्रियों के गोत्रों के विषय में क्या माना जाता था| वि.स. की दूसरी शताब्दी के प्रारंभ में अश्वघोष नामक प्रसिद्ध विद्वान और कवि हुआ, जो पहले ब्राह्मण था, परन्तु पीछे से बौद्ध हो गया था| वह कुकनवंशी राजा कनिष्क का धर्मसंबंधी सलाहकार था, ऐसा माना जाता है| उसके “बुद्धचरित्र” और “सौदरनंद” काव्य कविता की दृष्टि से बड़े उत्कृष्ट समझे जाते है| उसका ब्राह्मणों के शास्त्रों तथा पुराणों का ज्ञान भी अनुपम था, जैसा कि उसके काव्य से पाया जाता है| सौदरनंद काव्य के प्रथम सर्ग में उसने क्षत्रियों के गोत्रों के संबंध में विस्तृत विवेचन किया है, उसका सारांश निम्न है-

“गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था| उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था| कई इक्ष्वाकु-वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे| कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम-गोत्री कहलाये| एक ही पिता के पुत्र भिन्न-भिन्न गुरुओं के कारण भिन्न भिन्न गोत्र के हो जाते है, जैसे कि राम (बलराम) का गोत्र “गाग्र्य” और वासुभद्र (कृष्ण) का “गौतम” हुआ| जिस आश्रम में उन राजपुत्रों ने निवास किया, वह “शाक” नामक वृक्षों से आच्छादित होने के कारण वे इक्ष्वाकुवंशी “शाक्य” नाम से प्रसिद्ध हुये| गौतम गोत्री कपिल ने अपने वंश की प्रथा के अनुसार उन राजपुत्रों के संस्कार किये और उक्त मुनि तथा उन क्षत्रिय-पुंगव राजपुत्रों के कारण उस आश्रम ने एक साथ “ब्रह्मक्षत्र” की शोभा धारण की|”

अश्वघोष का यह कथन मिताक्षरा के बनने से एक हजार वर्ष से भी अधिक पूर्व का है, अतएव श्रीयुत वैद्य के ये कथन कि “मिताक्षराकार ने गलती की है”, और मिताक्षरा पूर्व क्षत्रिय के स्वत: के गोत्र थे; सर्वथा मानने योग्य नहीं है, और क्षत्रियों नके गोत्रों को देखकर यह मानना कि ये क्षत्रिय उन ऋषियों (ब्राह्मणों) के वंशधर है, जिनके अनेक गोत्र वे धारण करते है, सरासर भ्रम ही है| पुराणों से यह तो पाया जाता है कि अनेक क्षत्रिय ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुये और उनसे कुछ ब्राह्मणों के गोत्र चले| परन्तु उनमें यह कहीं नहीं लिखा मिलता कि क्षत्रिय ब्राह्मणों के वंशधर है|

यदि क्षत्रियों के गोत्र उनके पुरोहितों (गुरुओं) के सूचक न होकर उनके मुलपुरुषों के सूचक होते, जैसा कि श्रीयुत वैद्य का मानना है, तो ब्राह्मणों के समान उनके गोत्र सदा वे के वे ही बने रहते और कभी न बदलते, परन्तु प्राचीन शिलालेखादि से ऐसे प्रमाण मिल आते है, जिनसे एक ही कुल या वंश के क्षत्रियों के समय समय पर भिन्न भिन्न गोत्रों का होना पाया जाता है| जैसे-

  • – मेवाड़ के गुहिलवंशियों का गोत्र वैजपात है| पुष्कर के अष्टोत्तरशत-लिंग वाले मंदिर में एक एक सती का स्तंभ खड़ा है, जिस पर के लेख में पाया जाता है कि वि.स.1243 माघ सुदि 11 को ठकुरानी हीरवदेवी, ठा. कोल्हण की स्त्री, सती हुई| उक्त लेख में ठा.कोल्हण को गुहिलवंशी और गौतम गोत्री लिखा है|
  • – काठियावाड़ के गोहिल जो मारवाड़ से वहां गए थे,मेवाड़ के राजा शालिवाहन के वंशज है, अपने आपको गौतम गोत्री मानते है|
  • – मध्यप्रदेश के दमोह जिले मुख्य स्थान दमोह से गुहिलवंशी विजयसिंह का एक शिलालेख मिला है, जो नागपुर के म्यूजियम में सुरक्षित है| जिसके लेख में गुहिलवंश के चार राजवंशजों के नाम है जिनको विश्वामित्र गोत्री और गुहिलवंशी बताया है|
  • – चालुक्यों (सोलंकियों) का मूल गोत्र मानव्य था, मद्रास अहाते के विजागापट्टम जिले, जयपुर राज्य के अंतर्गत गुणपुर और मोड़गुला के ठिकाने के सोलंकियों का गोत्र मानव्य ही है, परन्तु लुणावाड़ा, पीथापुर और रीवां आदि के सोलंकियों (बघेलों) का गोत्र भारद्वाज होना वैद्य महाशय ने बतलाया है|

इस प्रकार एक ही वंश के राजाओं के भिन्न भिन्न गोत्र होने के कारण यही जान पड़ता है कि राजपूतों के गोत्र उनके पुरोहितों के गोत्रों के सूचक है, और जब वे अलग अलग जगह जा बसे, तब वहां जिसको पुरोहित माना, उसी का गोत्र वे धारण करते रहे| ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि राजपूतों के गोत्र सर्वथा उनके वंशकर्ताओं का सूचक नहीं, किन्तु पुरोहितों के सूचक होते थे, और कभी कभी पुरोहित के बदलने पर गोत्र बदल जाया करते थे, कभी नहीं भी| यह रीति उनमें उसी समय तक बनी रही, जब तक पुरोहितों के द्वारा उनके वैदिक संस्कार होकर प्राचीन शैली के अनुसार वेदादि-पठन-पाठन का कर्म उनमें प्रचलित रहा| पीछे तो वे नाम मात्र के रह गए, केवल प्राचीन प्रणालियों के लिए हुए संकल्प, श्राद्ध आदि में गोत्रोच्चार करने के अतिरिक्त उनका महत्त्व कुछ भी नहीं रहा और न वह प्रथा रही, कि पुरोहित का जो गोत्र हो वही राजा भी हो|

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