खूंटी पर विचारधारा

किसी भी सामाजिक,राजनैतिक संघठन की अपनी एक विचारधारा होती है उसी विचारधारा को देखकर सुनकर उसी विचारधारा के समान विचार रखने वाले लोग उन संघठनों में शामिल होते है ,उसका समर्थन करते है| इसी तरह समान विचारधारा के लोगों का समर्थन पाकर संघठन बढ़ते है, मजबूत होते है|हमारे देश सहित विश्व के हर देश में बहुत से सामाजिक,राजनैतिक संघठन है जो अपनी अपनी अलग-अलग विचारधारा के रूप में जाने जाते है विचारधारा ही उनका परिचय है|
हमारे देश में बहुत से राजनैतिक दल है, हर दल का अपनी अलग विचारधारा के साथ गठन किया गया| देश के नागरिक उन दलों की विचारधारा से प्रभावित होकर उनसे जुड़े और वे दल बढ़ते गए पर आज हमारे देश में सबसे बड़ी और जवलंत समस्या है कि हमारे यहाँ जितने भी राजनैतिक दल है वे अपनी अपनी विचारधारा से भटक गए है सबका मकसद या कहें एक ही विचारधारा बन गयी कि किस तरह सत्ता हथियायी जाए या सत्ता में बना रहा जाए|
सबसे पहले देश के एक बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस की विचारधारा की बात करते है- कांग्रेस में गठन के बाद जब महात्मा गाँधी कांग्रेस में आये तब कांग्रेस पर गाँधी की विचारधारा का असर हुआ और कांग्रेस ने महात्मा गाँधी की विचारधारा को अपनाया| जो लोग गाँधी जी की विचारधारा से सहमत नहीं थे या जिन्हें उनकी विचारधारा में भरोसा नहीं था वे लोग धीरे-धीरे कांग्रेस से अलग होते गए खैर…..
कांग्रेस गाँधी जी की विचारधारा लेकर बढ़ी, सत्ता में आई पर सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने गाँधी जी की विचारधारा का सिर्फ ढोल पीटा और कांग्रेस में नेहरु की विचारधारा चलने लगी उसके बाद इंदिरा गाँधी की विचारधारा| और ये विचारधारा बदलते बदलते इतनी ही रह गयी कि कैसे भी सत्ता में बने रहना है, चाहे इसके लिए कुछ भी किया जाय,कितनी ही बेशर्मी की जाय, भले जातिवाद बढाया जाय,धार्मिक तौर पर तुष्टिकरण कर वोट बैंक बनाया जाय,यदि वोट बैंक बनता है तो अवैध घुसपैठ को भी नजरअंदाज किया जाय,गरीबों के थोक वोट पाने के लिए ऐसी योजनाएं चलाई जाय कि फ्री में उन्हें कुछ देकर वोट पक्के किये जाए भले ही उन योजनाओं का लाभ उठाकर गरीब तबका कामचोर व निठ्ल्ला बन जाए,चुनावों में वोट खरीदने के लिए भ्रष्टाचार कर इतना धन जमा करलो कि आसानी से झुग्गीवासियों पर चुनाव के दौरान खर्च कर वोट हासिल कर सत्ता के तख़्त तक पहुंचा जा सके|
देश की दूसरी बड़ी राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी का भी यही हाल है उसके नेताओं ने भी अपनी मूल विचारधारा को खूंटी पर टांग दिया और अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढाने में लगे है|जिस विचारधारा के समर्थन में देश की जनता ने भाजपा को पूर्व में जब शासन सौंपा तो वह भी लोगों के विश्वास पर खरी नहीं उतरी| उसके भी कई नेताओं ने वोट के चक्कर में अपने आपको सेकुलर दिखाने की कोशिश की जो उनकी मूल विचारधारा के विपरीत थी| इसलिए अगले चुनावों में जनता ने उन्हें नकार दिया| आज भी भाजपा सही तरीके से तय नहीं कर पा रही है कि वो अपनी मूल विचारधारा से चले या सत्ता हथियाने के लिए किये जाने वाले हथकंडों वाली विचारधारा रखते हुए सत्ता हासिल की जाय|
वामपंथियों को भी लीजिये वो भी अपनी जिस विचारधारा को लेकर आगे बढ़ें उसे आज छोड़ चुके है और उस विचारधारा का सिर्फ ढिंढोरा पीटते ही नजर आते है| बंगाल में इनके खेल वहां की जनता देख चुकी है| पूंजीवाद का विरोध करने वाले दल के नेता या उनके परिजन सत्ता की मलाई खा-खाकर खुद पूंजीपति बन बैठे|धर्म को अफीम का नशा समान मानने वाले वामपंथी वोट बैंक की खातिर खुलकर एक धर्म विशेष का तुष्टिकरण करने में सबसे आगे दिखने की कोशिश में रहते है| कुल मिलकर इस दल ने अपनी विचारधारा खूंटी पर टांग सत्ता प्राप्ति वाले हथकंडो रूपी विचारधारा अपना ली|
समाजवादियों को भी देख लीजिये| जब भी कहीं बोलेंगे समाजवादी विचारधारा का ढोल पीटेंगे पर सत्ता में आने के लिए इनके द्वारा अपनाये गए हथकंडों से कौन अनजान है| उतरप्रदेश की एक समाजवादी पार्टी की विचारधारा किससे छिपी है कि समाजवाद की आड़ में वे सबसे ज्यादा धार्मिक तुष्टिकरण व जातिवाद फैलाकर सत्ता तक पहुँचने में कामयाब हुए|
बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा भी हमने देखी| स्वर्णों के खिलाफ विषवमन कर दलितों में नाम पर वोट बैंक का धुर्वीकरण करने के बाद भी जब सत्ता नहीं मिली तो सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर स्वर्णों का ही साथ लेकर सत्ता की मलाई आराम से पा ली गयी| कुल मिलाकर यही नजर आया कि इस दल की विचारधारा में भी दलितों के कल्याण से कोई मतलब नहीं रह गया बस उनके नाम से कैसे भी हो सत्ता हासिल करनी है|
बिहार के नितीश कुमार वाले समाजवादी विचारधारा वाले राजनैतिक दल का भी हाल यही है एक तरफ धर्म विशेष के लोगों के वोटों के चक्कर में सेकुलरता का ढोंग और दूसरी तरफ सत्ता की मलाई के लिए उसकी विपरीत विचारधारा वाली भाजपा का समर्थन| एक तरफ भाजपा के समर्थन से सत्ता की मलाई और दूसरी तरफ भाजपा के लोकप्रिय नेता नरेन्द्र मोदी का विरोध| कुल मिलाकर इनकी विचारधारा भी साफ है कि कैसे भी हो सत्ता मिलनी चाहिए|
देश में और भी बहुत से दल है जो किसी खास विचारधारा को लेकर बनाये गए थे पर वर्तमान में सबकी एक ही विचारधारा रह गयी येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना| सत्ता के लिए हमने कई बार दो विपरीत विचारधारा वाले दलों को एक साथ देखा भी है और देख भी रहें है|

अब जब देश के सभी राजनैतिक संघठन अपनी अपनी विचारधारा छोड़ वोट बैंक के लिए धार्मिक उन्माद फैलाते है या उसका समर्थन या उसे अनदेखा करते है, जातिवाद फैलाकर सीटें हासिल करते है,भ्रष्टाचार कर जमा किये धन से वोट खरीदकर सत्ता में आने की राह बनाते है तो देश के हित की बात,आम जनता के कल्याण के बात, देश की तरक्की की बात के लिए ऐसे दलों से उम्मीद भी कैसे की जा सकती है ?

पर क्या इस दशा के लिए सिर्फ राजनैतिक पार्टियों के नेता ही जिम्मेदार है ?
नहीं इसका दोष हम सिर्फ राजनेताओं पर ही नहीं मढ़ सकते हम देशवासी भी बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार है|
क्योंकि हमने भी देश की भलाई में काम आने वाली विचारधारा से कोई वास्ता नहीं रखा| हम देश के सर्वंगीण विकास की विचारधारा तो रखते है पर हम भी चुनावों में उस विचारधारा को उतार कर खूंटी पर टांग देते है और यह देखते है कि किसी दल ने अपने धर्म,अपनी जाति का उम्मीदवार खड़ा किया है और उसी आधार पर वोट देते है, उम्मीदवार के चयन के समय भी हम राजनैतिक दल को उस क्षेत्र में अपनी जाति या धर्म के आधार पर उम्मीदवार खड़ा करने को विवश करते है| क्योंकि वोट देते समय हम भी देश हित भूलकर अपनी जाति,अपने धर्म के आधार पर वोट देते है या उसे वोट देते है जो हमारा जातीय या धार्मिक तौर पर तुष्टिकरण करता है|तो भला फिर कोई राजनैतिक दल हमारी इस तरह की भावनाओं का दोहन करने से क्यों चुकेगा ?

इसलिए जितना दोष राजनेताओं का है उससे कहीं ज्यादा दोष हमारा भी है | जब हम वोट देते समय अपनी विचारधारा बदल लेते है तो राजनैतिक दल भी यदि वोट के लालच में अपनी विचारधारा बदलते है तो उनका भी क्या दोष ?

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12 Responses to "खूंटी पर विचारधारा"

  1. विजयपाल कुरडिया   September 2, 2012 at 2:35 am

    कांग्रेस ने गाँधी जी की विचारधारा का सिर्फ ढोल पीटा …true ..
    एक "SMS" का कमाल::::::::::::: दुनियां लगे बेमिसाल!!(Only One Sms)

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    • Ratan Singh Shekhawat   September 2, 2012 at 3:37 am

      विजयपाल जी कांग्रेस ही क्यों ? सभी दल अपनी अपनी विचारधारा का ढोल ही पीट रहे है बस|

      Reply
    • Hanvant Rajpurohit   April 5, 2013 at 2:19 pm

      Gandhi के पास कौनसी विचार धारा थी ?

      जो थी उस पर तौ कांग्रेस अमल कर ही रही है "मुस्लिम तुष्टीकरण"

      Reply
  2. Sanju   September 2, 2012 at 4:40 am

    nice presentation….
    Aabhar!
    Mere blog pr padhare.

    Reply
  3. प्रवीण पाण्डेय   September 2, 2012 at 5:03 am

    देश का विकास सारी विचारधाराओं का स्रोत है, तो विकास क्यों बाधित है..

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    • Ratan Singh Shekhawat   September 2, 2012 at 6:15 am

      सभी दलों की विचारधारा सिर्फ सत्ता प्राप्त करने के लिए वोट बैक बनाने की ही हो गयी, विकास से तो किसी का कोई लेना देना ही नहीं रह गया इसलिए बाधित है जो थोड़ा बहुत हो रहा है वह भी सिर्फ इसलिए कि उतना ही ना करें तो ये कमायें कैसे ?

      Reply
  4. dheerendra   September 2, 2012 at 6:05 am

    आज सभी दलो का मकसद एक ही है,कि सत्ता कैसे हथियाई जाए,वोट बैंक बढाने और तुष्टीकरण के लिए
    कई योजनाये चलाकर,शासकीय राशि का दुरूपयोग कर लोगो को कामचोर बना रही है,

    RECENT POST,परिकल्पना सम्मान समारोह की झलकियाँ,

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  5. DR. ANWER JAMAL   September 2, 2012 at 6:24 am

    अब जब देश के सभी राजनैतिक संघठन अपनी अपनी विचारधारा छोड़ वोट बैंक के लिए धार्मिक उन्माद फैलाते है या उसका समर्थन या उसे अनदेखा करते है, जातिवाद फैलाकर सीटें हासिल करते है,भ्रष्टाचार कर जमा किये धन से वोट खरीदकर सत्ता में आने की राह बनाते है तो देश के हित की बात,आम जनता के कल्याण के बात, देश की तरक्की की बात के लिए ऐसे दलों से उम्मीद भी कैसे की जा सकती है ?

    पर क्या इस दशा के लिए सिर्फ राजनैतिक पार्टियों के नेता ही जिम्मेदार है ?
    नहीं इसका दोष हम सिर्फ राजनेताओं पर ही नहीं मढ़ सकते हम देशवासी भी बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार है|

    बुद्धिजीवियों में भी यही रोग देखा जा रहा है –
    बड़े ब्लॉगर्स के ब्लॉग पर बहती मुख्यधारा का .

    धन्यवाद.

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    • Hanvant Rajpurohit   April 5, 2013 at 2:23 pm

      Anwarji, I dont wanted to comment but because you mentioned about Jatiwad, I have to I think. It was congress who compromises between 1947 and 1950, otherwise after giving one ISLAMIST country we could have one HINDU NATION

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  6. पूरण खंडेलवाल   September 2, 2012 at 1:47 pm

    यही तो सबसे बड़ी विडम्बना है चाहे राजनैतिक पार्टियां हो या हमारा समाज सभी जगह विचारधारा पर अडिग रहने वाले बहुत कम ही लोग रह गए है !!

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  7. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि आज दिनांक 03-09-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-991 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  8. Hanvant Rajpurohit   April 5, 2013 at 2:15 pm

    खास करनै Initial stage माथै हर राजनैतिक पार्टी री विचार धारा हुवै. जद उण विचार धारा सूं लोग प्रभावित हुवण लागै अर जुडण लागै तौ ए राजनैतिक पार्टिय़ा उण विचार धारा माथै चालण वाळौ रौ नीं सोच’र दूजा रौ सोचणौ सरु कर देवै. सोचै फलाणौ क्यूं म्हारै सूं प्रभावित कोनीं अर उणनै प्रभावित करण खातर विचारधारावां सूं compromise करण लाग.

    आ इज हालत अबार भाजपा री ईं हुयोड़ी छै.

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