कैसे हो गौ संरक्षण ?

कैसे हो गौ संरक्षण ?

गौ संरक्षण वर्तमान भारत का सर्वाधिक जवलंत मुद्दा है. पश्चिम की नक़ल कर अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले, या आजकल सेकुलरता का ढोंग करने वाले या फिर गौ को हिन्दुत्त्व से जोड़ने लोग बेशक इसे धार्मिक भावनाओं का खेल कहें, आस्था का प्रतीक कहें पर गौ संरक्षण देश के लिए, पर्यावरण के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए व हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है. पर अफ़सोस गौ संरक्षण के नाम पर आजकल राजनीति व ढोंग ज्यादा हो रहा है. एक पक्ष के लोग गौ संरक्षण के नाम पर धार्मिक भावनाओं का दोहन कर राजनीति सहित अपनी दुकानदारियाँ चलाना चाहते है तो दूसरा पक्ष गौ भक्षकों का साथ देकर राजनीतिक रोटियां सैकने की फिराक में रहता है. देश में बहुत कम लोग है जो गाय के संरक्षण को आर्थिक, पर्यावरणीय व देशवासियों के स्वास्थ्य से जोड़कर ईमानदारी से गौ संरक्षण में लगे है.

प्राय: देखा जा रहा है कि गौ-संरक्षण आजकल दिखावटी व ढोंगी समाज सेवियों के लिए धन कमाने का, झूंठी वाह वाही लुटने का एक शानदार मुद्दा बना हुआ है. लोग किसी नजदीकी गौ शाला में जायेंगे और गाय के साथ फोटो खिंचवाकर सोशियल साइट्स पर अपलोड कर ऐसे प्रचारित करेंगे जैसे उनसे बढ़कर बड़ा कोई गौ रक्षक नहीं. बहुत से गौ संरक्षण के नाम मोटा चंदा या सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी जेबें भरने में लगे. इन सबके होने के बावजूद सुखद स्थिति यह है कि आज भी देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो ईमानदारी से अपना तन-मन-धन लगाकर गौ संरक्षण में जुटे है. ईमानदारी से जुटे ऐसे लोगों का मैं दिल से अभिनन्दन करता हूँ. लेकिन कुछ गौ शालाएं खोलकर या गायों के लिए कभी कभार घास खरीदकर उन्हें डाल देने मात्र से गौ संरक्षण नहीं हो जायेगा. इसके लिए कुछ ठोस उपाय करने होंगे. गौ उत्पादकों के प्रयोग को बढ़ाना होगा. यह तभी संभव है जब हम गौ उत्पादों के स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभों का प्रचार-प्रसार करें. सही मायने में गौ संरक्षण तभी होगा जब पशुपालक गाय पाले. पशुपालक गाय तभी पालेंगे जब उन्हें गाय पालने से आर्थिक लाभ हो और आर्थिक लाभ तभी होगा जब गौ उत्पादों की बाजार में मांग होगी. बिना पशुपालकों के सहयोग के हम इस कार्य में कभी सफल नहीं होंगे. क्योंकि हम कितनी गौ शालाएं बना लेंगे और उनमें कितनी गायों को संरक्षण दे पायेंगे. अत: गौ संरक्षण हेतु पशुपालकों को गाय पालन हेतु प्रेरित करना ही पड़ेगा.

आज छोटे पशुपालक के सामने सबसे बड़ी समस्या चारागाह की है. राजपूत शासनकाल में ओरण (अरण्य) जिसे कई जगह स्थानीय भाषा में बणी व गौचर भी कहा जाता है छोड़ी जाती थी. जहाँ भूमिहीन पशुपालकों के पशुओं को चारागाह मिल जाता था. लेकिन आजादी के बाद राजपूतों द्वारा छोड़ी गई ऐसी गौचर भूमि पर पंचायतों की मिलीभगत से अवैध अतिक्रमण हुए है और गौचर या सिमिट गए या कहीं कहीं ख़त्म भी हो गए. जिसका सीधा दुष्प्रभाव छोटे व भूमिहीन पशुपालकों पर पड़ा है. अत: आज हमें गौ संरक्षण के लिए सबसे पहले आवश्यकता है गौचर भूमि को बचाने की. हर गांव में दो चार व्यक्ति हों जो सरपंच द्वारा गौचर की भूमि आबादी में बदलकर बंदरबांट करने की खिलाफत करें तो मैं समझता हूँ छोटे व भूमिहीन लोग भी पशुपालन अपना लेंगे.

गायों के गर्भाधान हेतु सांडों की कमी की वजह व इंजेक्शनस लगाकर गायों का गर्भाधान कराने का फैशन भी गौ संरक्षण के बीच रोड़ा बना हुआ है. इंजेक्शन से गर्भाधान होते ही देशी नस्ल की गायें वर्णशंकर नस्ल के बछड़े पैदा करती है. इस तरह पैदा हुए बछड़े न गाड़ी जोतने, ना ही हल जोतने के काम आते है और वे पशुपालक पर बोझ बन जाते है. अत: हमें ऐसे उपाय करने होंगे, साथ ही जागरूकता फैलानी पड़ेगी ताकि पशुपालक देशी गायों के गर्भाधान हेतु इंजेक्शन प्रयोग कर अपने देश की देशी नस्ल ना बिगाड़े. लोगों को समझाना होगा कि गाय सिर्फ धार्मिक आस्था के चलते ही हमारी माँ नहीं है. इसके दूध, दही, घी के प्रयोग से हम स्वस्थ रहते है, गाय का गोबर हमारे खेतों को उपजाऊ बनाता है. गौ उत्पाद बेचकर हमें आर्थिक लाभ होता है. विशेषज्ञों के अनुसार जहाँ कहीं खूब सारे कंप्यूटर या ऐसे उपकरण लगे हों जिनसे रेडिएशन निकलता हो, ऐसी जगह पर दीवारे यदि गाय के गोबर से पुती हो तो वे रेडिएशन को सोख लेती है और हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से हमें बचाती है. इसीलिए गाय को माँ का दर्जा दिया गया है.
पर अफ़सोस आज घरों में कुत्ते पालने के लिए लोगों के पास जगह है, जिससे कोई आर्थिक लाभ नहीं. पर अपनी माँ समान गाय को रखने के लिए जगह नहीं है.

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