34.1 C
Rajasthan
Sunday, May 22, 2022

Buy now

spot_img

अछूत कैसे हो सकते है दलित ?

आज जिस तरह से कार्य के आधार पर लोकतंत्र के चार स्तम्भ है ठीक उसी तरह से वैदिक काल में भी कार्यनुसार चार वर्ण बनाये गये- जिसमें शासन और सुरक्षा व्यवस्था देखने वालों को क्षत्रिय नाम दिया गया, शिक्षा व कानून आदि बनाने वालों को ब्राह्मण, व्यापार करने वालों को वैश्य और आज की कार्यपालिका की तरह काम करने वालों को शुद्र| उस काल में अपनाई वर्ण व्यवस्था जन्मजात ना होकर कार्य के आधार पर थी पर धीरे धीरे समय बीतने के साथ साथ किसी भी वर्ण में जन्मा व्यक्ति अपने पुस्तैनी कार्य में सलंग्न रहा और आगे चलकर कालांतर में यही वर्ण जन्म आधारित जातियां बन गये| चूँकि ब्राह्मणों के हाथ में शिक्षा, क्षत्रियों के हाथ में शासन और सुरक्षा, वैश्यों के हाथ में व्यापार के चलते अर्थ जैसे महत्त्वपूर्ण साधन हाथ में होने की वजह से इन तीनों वर्णों का कार्यपालिका रूपी शूद्रों पर वर्चस्व स्थापित हो गया| लेकिन जब तक क्षत्रिय आत्मनिर्भर रहते हुये अपने कार्य में लगे रहे तब समाज में किसी तरह का भेदभाव नहीं रहा, एक काबिल शुद्र भी ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण में शामिल हो सकता था, पर धीरे धीरे क्षत्रिय शिक्षा व अर्थ के मामले में ब्राह्मण और वैश्यों पर निर्भर रहने लगे और इस पर निर्भरता ने उन्हें अपने कर्तव्य से पथ विचलित कर दिया और क्षत्रियों में आई इसी कमी की वजह समाज में ऊँचनीच की भावना प्रबल हुई, कार्यपालिका रूपी शूद्रों के साथ काम के आधार भेदभाव ही नहीं छुआछुत भी बढ़ गई|

आज वैदिक वर्ण व्यवस्था के शुद्र शब्द का स्थान दलित, हरिजन आदि शब्दों ने ले लिया और वैदिक काल के शुद्र कालांतर में दलितों के नाम से पहचाने जाने लगे| लेकिन इस नाम परिवर्तन के बाद भी उनके साथ छुआछूत कम नहीं हुई| आजादी के बाद लोकतांत्रिक नेताओं ने जातिवाद मिटाने व समानता का अधिकार देने के खूब भाषण झाड़े व वादे किये पर वोट बैंक के लालच में इन्हीं नेताओं ने जातीय भेदभाव कम करने के बजाय बढाया ही| खैर…नेता जाने, उनका काम जाने | लेकिन मेरे यह समझ नहीं आता कि आज इतना समय परिवर्तित होने के बावजूद दलित अछूत कैसे है, क्यों है ?

कई बार मैं सोचता हूँ जब मेरे पूर्वजों ने, मैंने, मेरी संतान ने जब जन्म लिया तब दाई के रूप में जिस महिला ने हमें इस धरती पर सर्वप्रथम छुआ वह दलित महिला ही थी (ज्ञात हो गांवों में आजतक दाई का काम दलित महिलाएं ही करती आई है), उसी ने इस धरती पर अवतरित होते ही हमें अपने हाथों में संभाला, हमारे लिए वो सब काम किये जो हमारी माँ उस वक्त नहीं कर सकती थी| तो जिस दलित महिला ने हमें सबसे पहले छुआ वह बाद में हमारे लिये अछूत कैसे हो गई ? गांव में जिन दलितों को हम बचपन से उनकी उम्र के हिसाब से दादा, बाबा, काका, भैया कहते आये है वे ऐसे आदर सूचक संबोधनों के बाद भी अछूत क्यों हो जाते है ? किसी के साथ बैठकर एक थाली में खाना खाना या रिश्ते करना किसी का भी व्यक्तिगत मामला हो सकता है, पर किसी को अछूत समझना कतई न्याययुक्त नहीं कहा जा सकता|

हालाँकि आज सफ़र में, होटलों में, कार्यालयों में कोई किसी की जाति नहीं पूछता और अनजाने में छुआछुत पर कोई ध्यान नहीं देता फिर भी जिनको लोग जानते है उन्हें आज भी अछूत समझते है| और आजादी के बाद भी भले लोकतंत्र में सबको सामान अधिकार हो छुआछुत नहीं मिट पाई |  हमारे नेताओं ने भले ही शुद्र शब्द की जगह दलित, हरिजन आदि शब्द दियें हो पर क्या इन शब्दों ने इन्हें फिर अलग थलग पहचान ही नहीं दी ? राजस्थान के महान क्षत्रिय चिंतक स्व. आयुवान सिंह शेखावत ने अपनी पुस्तक “राजपूत और भविष्य” में इन्हें पुरुषार्थी नाम दिया है, क्योंकि दलित या शुद्र जातियां भी हमारी तरह ही पुरुषार्थ करती है अत: इन्हें दलित, शुद्र आदि कहने के बजाय पुरुषार्थी मान क्यों ना ससम्मान अपने साथ रखा जाय ?

Related Articles

8 COMMENTS

  1. दलित या शुद्र जातियां भी हमारी तरह ही पुरुषार्थ करती है अत: इन्हें दलित, शुद्र आदि कहने के बजाय पुरुषार्थी मान क्यों ना ससम्मान अपने साथ रखा जाय ?
    सही है !!

  2. आपको ये बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि आपका ब्लॉग ब्लॉग – चिठ्ठा – "सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग्स और चिट्ठे" ( एलेक्सा रैंक के अनुसार / 31 मार्च, 2014 तक ) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएँ,,, सादर …. आभार।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Stay Connected

0FansLike
3,321FollowersFollow
19,600SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles