वडौ कुण ?

वडौ कुण ?
राजस्थानी भाषा के साहित्यकार, इतिहासकार श्री सौभाग्यसिंह जी शेखावत की कलम से….

सलूम्बर (Salumber) मेवाड़ (Mewar) रौ सैंठौ ठिकाणौ गिणीजै नै मेवाड़ री थाप उथाप में आगीवांण भणीजै। सलूम्बर रा सांम चूंडावत (Chundawat) बाजै। चूंडौ राणा लाखा रौ टीकायत बेटौ। वीरता में वांकौ सूरता में सैंठौ। रावत चूंडा री जवाय रौ सलूम्बर पाट थांन। रजवाड़ां रा ठिकाणां में इण रीत जिण रीत गोपिकावां में कांन। रावत चूंडौ पाट रौ धणी होतां थकां भी आपरै पिता राणा लाखा रै अजाण में काढियोड़ा वचनां खातर आपरै टीकाई पद रौ त्याग कियौ अर पिता भगति रै जस रौ लाह लियौ। ख्यातां बातां में कीरत खाटी अर इण भांत भीसम पिता री पाळी परिपाटी।

राज रै खातर संसार में न जांणै कितरा धळ-धौंकल हुवा। बेटौ बाप नै मारियौ। बाप बेटा नै तरवार रै घाट उतारियौ। सहोदर सहोदरां रा सिर बाढिया अर भतीजां काकां रा कंठ काटिया। राज-रजवाड़ां रा जूनां इतिहास अैड़ा इज रगत सूं रळथळ मिळै। पण रावत चूंडै मेदपाट रा राज रौ, हिंदुवां भाण रा पद रौ, दस सहस गांवां रा धणी पणा रौ हक छौड़तां नाक में सळ इज नीं घालियौ। ऊकरड़ी रा ठीकरा ज्यूं राज रै ठोकर मारी। बौळाई रा बासण ज्यूं राजगादी ने जणाई। अर आपरा दुमात रा छोटा भाई मोकळ नै मेवाड़ रौ खावंद बणाय सांमध्रमता रै साथ मोकळ री चाकरी बजाई। रजवट री म्रजाद खराखरी निभाई अर रुघवंस रै आदर्स माथै भळभळाती किलंगी इज जांणी चढ़ाई। इण सूं सलूम्बर नै सलूम्बर रा धणी चूंडावत आखा राजथानां में आदरजोग, सरधाजोग गिणीजिया नै चौखतीख में सिरै भणीजिया। कवीसरां री वाणी में कथीजिया “उदियापुर चूंडा सिरै, सेखाघर आमेर।’’

मेवाड़ रा महीप महाराणा अड़सी रै समै मेवाड़ में दिखणियाँ रौ ठाढौ झोड़ पड़ियौ। दिखणियां री राफट रौळ में मेवाड़ री म्रजाद मौळी पड़ी। ग्वालियर रौ राजा महादाजी पटेल मेवाड़, ढूंढाड़ अर मारवाड़ में घणी अबखी बिताई। ठौड़-ठौड़ खागां चमकाई। चंडिकावां नै रुधिरपान सूं त्रिपताई। सिव नै फूलां री ठौड़ मुण्डा री मांळावां पहराई पण मरेठा रजवाड़ां नै फोड़ा पाड़ण में कसर नीं रखाई। महादाजी रूपी मदंध मैंगळ सूं मुहरौ करण खातर राणै अड़सी चित में उपाई अर मेवाड़ री म्रजाद रा रुखाळा, जमराज रा साळा, कळह रा कराळा चूंडावत, सकतावत, राणावत, झाला, चहुंवाण, तंवर अर पिता, पूत नै भंवर सकला नै अड़सी तेड़ाया। आंटीला अखडै़त, पवंगा पखरैत, चढ़िया पाळा उदयपुर आया अर महादाजी संू रटाकौ लेण नै उजीण (मालवा) नै चलाया। उण समै अैड़ासा लखाया कै उरबसी रा आसक कै सांमध्रम रा उपासक। वीरभद्र रा भाई कै जमराज रा जंवाई। भाभाड़ा भूत सा भयंकर, खळदळां रा खंयकर जिका चाल नै उजीण आया अर महाकाल रै थांन मंदार रा फूल चढ़ाया। सिप्रां में तन झकोळिया अर दिखणियां माथै खांडा तोलिया। मेवाड़ री सेना में साहपुरा रौ अधीस ऊमेदसिंघ राणावत, सलूम्बर रौ साहिब पहाड़सिंघ चूंडावत, झालावाड़ रौ जालिमसिंघ झालौ आद कितरा ईज जंग जोधार महादाजी रूपी सागर में जहाज रूपी मेवाड़ री थांमियां पतवार। राजा ऊमेदसिंघ साहपुरा साठ साल रा नै रावत पहारड़सिंघ सलूम्बर मगर पच्चीसी में। अेक तो संसार री ताती सीळी पवन रा लहरका लियोड़ौ नै बीजौ वय-बसंत रै बारणै पग दियोड़ौ। राजा ऊमेदसिंघ छोटी वडी चौरासी लड़ायां लड़ियोड़ा। महाराजा सवाई जैसिंघ ढूंढाड़, महाराजा अभैसिंघ मारवाड़, महाराजा ईसरीसिंघ कछावा, राजाधिराज बखतसिंघ नागौर, महाराव राजा ऊमेदसिंघ हाडा, राव मल्हार इंदौर इत्याद रै साथ घणा-घणा रटाका खायोड़ा, अपछरावां सू आरतियां उतरायोड़ा अर जीवतसंभ कहवायोड़ौ। सरब भांत खायी पीयी रा धणी। पूत पोता सगळी तरै राम राजी। राड़ रा रसिया ऊमेदसिंघ सांथरा री मौत री मानता सदा करता सौ मनचायौ प्रब आयौ जोय उछब-सौ रचायौ अर मेवाड़ रा सूरमां सांवतां नै कसूम्बौ दिरायौ। उण समै विकसतै वदन रै, उभरतै अंगोटै रै, झूमतै जोबन रावत पहाड़सिंघ नै देख नै फुरमायौ रावतजी ! थारी उमर अजै खावण पीवण री है। संसार रौ सीळौ तातौ, खाटौ मीठौ थां घणौ चाखियौ नीं है। आज रौ रटाकौ बीजी भांत रौ लखावै है नैं जै-पराजै तो वेह रै लेखै इज लखावै है। राज, आज रै झगड़े में पग नीं मेलै अर ऊमेदसिंघ तौ खायी रौ धणी है सौ अखेला खेल भले ई खेलै तौ कांई अड़ांस है ?

पण वडौ छोटौ आवड़दा सूं नीं गिणीजै। पहाड़सिंघ कैयौ, पहाड़सिंघ तौ राज संू छोटौ है, पण सलूम्बर तौ मोटौ है। मेवाड़ रा धणी सूं सलूम्बर री वय वडी है। पहाड़सिंघ लड़ाई सूं टाळौ खावै तो सलूम्बर री लाज म्रजाद बिल्लै लाग जावै अर रजवाड़ों में म्रजादा री कळलोपना-सी गिणत में आवै। आरबल रा तौ गिणत रा दिन हुवै पण बात जुगां चालै अर काची खाया आखी जिनगानी सालै सौ राणेराव अैड़ौ नीं फरमाइजै अर उजीण रौ धाम, सिप्रारौ तीरथ, सांध्रम रौ तकाजौ दई जोग सूं नीठ सौ लाधौ है सौ घोड़ा री बागां उठाइजै। मां मेवाड़ रै गौरव खातर जीव झोकाइजै अर रामायण महाभारत रौ सौ चकाबोह दिखाइजै। इण भांत रौ रावत पहाड़सिंघ जाब दियौ जद राजा ऊमेदसिंघ अर बीजा सांवतां वाह वाह कैयौ। ऊमेदसिंघ फरमायौ-राज री सल्हा वडी है। सलूम्बर री सपूती री आ लारली सूं आगली कड़ी है। फेर कांई ढील देखौ। ढोली सिंघव राग में दोहा देवण लागा अर रीझ मोजां पांवण लागा। सूरवीरां रा मन मरण नै उमावण लागा नै कायर कमजोरां रा काळजा धड़क-धड़क कंपावण लागा। दोनां फौजां री बागां ऊपड़ी अर नगारां पर चौबां पड़ी। सूर धीरां आम्हा साम्हा चलाया जिकां नै देख सिवासिव मुळकाया। महादाजी पटेल रा कमनेतारा तीरां सूं कितरा इज कळह कामणां रा खांविंद तडच्छा खाय रणभौम में लोटण लागा अर कितरा इज मूर्छा भंग उठ-उठ नै मरहठां रा झूलरां नै बोटण लागा। मेवाड़ रा पांच हजार जोधार मरेठां री पैंतीस हजार प्रतना रा पग उठाय दिया अर जीत रा नगारा घुराय दिया। पण, इतरां में दादू चेलां री जमात रा पट्टबाजां री कंवारी घड़ा आयी अर मेवाड़ री फतै पराजै में पलटी खायी। सात हजार मरैठा नै सांथरै सुवाया अर पछै ऊमेदसिंघ, पहाड़सिंघ सुरगापुर सिधाया। इण रीत ल्हौड़ वडाई रौ फैसलौ हुवौ जिकौ राजस्थान में छोटौ महाभारत इज कहीजियौ। म्रजादा रै आगै उमर न्हाटी। इण रीत पहाड़सिंघ कीरत खाटी। वडौ उमर सूं नीं, किरतब सूं गिणीजै। मोटा तौ भाखर हुवै जिकां में भाटा नीसरै। मिनख रौ छोटी-मोटौ उणरौ किरतब गिणीजै। गुण गेल पूजा। औ इज मोटा पणा रौ परवांण जाणीजै।

History of Salumber and Chundawat Rajputs in Rajasthani Bhasha

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