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Friday, September 30, 2022

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परमार राजवंश और उसकी शाखाएँ : भाग-1

परमार अग्नि वंशीय हैं। श्री राधागोविन्द सिंह शुभकरनपुरा टीकमगढ़ के अनुसार तीन गोत्र हैं-वशिष्ठ, अत्रि व शाकृति। इनकी शाखा वाजसनेयी, सूत्र पारसकर, ग्रहसूत्र और वेद यजुर्वेद है। परमारों की कुलदेवी दीप देवी है। देवता महाकाल, उपदेवी सिचियाय माता है। पुरोहित मिश्र, सगरं धनुष, पीतध्वज और बजरंग चिन्ह है। उनका घोड़ा नीला, सिलहट हाथी और क्षिप्रा नदी है। नक्कारा विजयबाण, भैरव कालभैरव तथा ढोल रणभेरी और रत्न नीलम है।
परमारों का निवास आबू पर्वत बताया गया है। क्षत्रिय वंश भास्कर के अनुसार परमारों की कुलदेवी सिचियाय माता है, जिसे राजस्थान में गजानन माता कहते हैं। परमारों के गोत्र कहीं गार्ग्य, शौनक व कहीं कौडिल्य मिलते है।

उत्पति- परमार क्षत्रिय वंश के प्रसिद्ध 36 कुलों में से एक हैं। ये स्वयं को चार प्रसिद्ध अग्नि वंशियों में से मानते हैं। परमारों के वशिष्ठ के अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीनतम शिलालेखों और ऐतिहासिक काव्यों में वर्णित है। डा. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि ‘हम किसी अन्य वंश को अग्निवंश माने या न माने परन्तु परमारों को अग्निवंशी मानने में कोई आपत्ति नहीं है।’ सिन्धुराज के दरबारी कवि पद्मगुप्त ने उनके अग्निवंशी होना और आबू पर्वत पर वशिष्ठ मुनि के अग्निकुण्ड से उत्पन्न होना लिखा है। बसन्तगढ़, उदयपुर, नागपुर, अथूणा, हरथल, देलवाड़ा, पारनारायण, अंचलेश्वर आदि के परमार शिलालेखों में भी उत्पति के कथन की पुष्टि होती है।

अबुलफजल ने आइने अकबरी में परमारों की उत्पति आबू पर्वत पर महाबाहु ऋषि द्वारा बौद्धों से तंग आने पर अग्निकुण्ड से होना लिखा है।

प्रश्न उठता है कि अग्निवंश क्या है? इस प्रश्न पर भी विचार, मनन जरूरी है ? इतिहास बताता है कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध जब बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ तो क्षत्रिय और वैश्य भी बौद्ध धर्मावलम्बी बन गये। फलतः वैदिक परम्परा नष्ट हो गई। कुमारिल भट्ट (ई.700) व आदि शंकराचार्य के प्रयासों से वैदिक धर्म में पुनः लोगों को दीक्षित किया जाने लगा। जिनमें अनेकों क्षत्रिय भी पुनः दीक्षित किये गये। ब्राह्मणों के मुखिया ऋषियों ने वैदिक धर्म की रक्षा के लिए क्षत्रियों को पुनः वैदिक धर्म में लाने का प्रयास किया, जिसमें उन्हें सफलता मिली और चार क्षत्रिय कुलों को पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित करने में सफल हुए। आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया। यही अग्निवंश का स्वरूप है।

जिसमें परमार वंश अग्नि वंशी कहलाने लगा। छत्रपुर की प्राचीन वंशावली वंश भास्कर का वृतान्त, अबुलफजल का विवरण भी बौद्ध उत्पात के विरुद्ध बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में पुनः लौट आने व यज्ञ की पुष्टि करते हैं। आबू पर्वत पर यह ऐतिहासिक कार्य 6 ठी व 7 वीं सदी में हुआ था। आज भी आबूगिरी पर यज्ञ स्थान मौजूद है।

मालवा के प्रथम परमार शासक- मालवा पर परमारों का ईसा से पूर्व में शासन था। हरनामसिंह चौहान के अनुसार परमार मौर्यवंश की शाखा है। राजस्थान के जाने-माने विद्वान ठाकुर सुरजनसिंह झाझड़ की भी यही मान्यता है। ओझा के अनुसार सम्राट अशोक के बाद मौर्यों की एक शाखा का मालवा पर शासन था। भविष्य पुराण भी मालवा पर परमारों के शासन का उल्लेख करता है।

मालवा का प्रसिद्ध राजा गंधर्वसेन था। उसके तीन पुत्रों में से शंख छोटी आयु में ही मर गया। भर्तृहरि जी गद्दी त्याग कर योगी बन गये। तब तीसरा पुत्र विक्रमादित्य गद्दी पर बैठा। भर्तृहरि गोपीचन्द के शिष्य बन गये जिन्होंने श्रृंगार शतक, नीति शतक और वैराग्य शतक लिखे हैं। गन्धर्वसेन का राज्य विस्तार दक्षिणी राजस्थान तक माना जाता है। भर्तृहरि के राज्य छोड़ने के बाद विक्रमादित्य मालवा के शासक बने। राजा विक्रमादित्य बहुत ही शक्तिशाली सम्राट थे। उन्होंने शकों को परास्त कर देश का उद्धार किया। वह एक वीर व गुणवान शासक थे जिनका दरबार नवरत्नों से सुशोभित था। ये थे-कालीदास, अमरसिंह, वराहमिहीर, धन्वतरी वररूचि, शकु, घटस्कर्पर, क्षपणक व बेताल भट्ट। उनके शासन में ज्योतिष विज्ञान प्रगति के उच्च शिखर पर था। वैधशाला का कार्य वराहमिहीर देखते थे। उज्जैन तत्कालीन ग्रीनवीच थी जहां से प्रथम मध्यान्ह की गणना की जाती थी। सम्राट विक्रमादित्य का प्रभुत्व सारा विश्व मानता था। काल की गणना विक्रमी संवत् से की जाती थी। विक्रमादित्य के वंशजों ने 550 ईस्वी तक मालवा पर शासन किया।

लेखक : Devisingh, Mandawa

क्रमशः………….

Parmar Rajvansh aur uski shakhaon ka itihas
parmaro ka itihas hindi me
agnivanshi parmar panwar vansh ka itihas

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13 COMMENTS

  1. घड़िया पंवार राजवंश इतिहास क्या हैं

  2. Bhaisahab main koodh ek sankhla parmar Rajput Hoon
    But aapke anusar parmar jab 6th or 7th century me agnivansh se aaye to phir ushse pahle ujjain ke shashak veer vikramaditya parmar Rajput konse Kool ke hue
    Vikramaditya ka Kal to aaj se lagbahag 2000 saal purana h or unhi se Vikram sanwat suru huaa to ish hisaab se parmar bahut purane kshatriaa h
    Or agnikoond ki baat kuch samajh nahin aati kyunki agnikoond v yagya to vikramaditya ke 500-600sal baad huaa bataya jata h Jo ki purnath galat h
    Kyunki agnikoond theory ke anusar parmaron ki uttpatti agnikoond se hue or tabhi ve agnikul ke kahlaye jabki ush samay koi jadu sa daviy shaktiyon ki manyata nahin
    thi
    Ish Karan ithihas me kahin n kahin truti h
    Jab parmar vansh hi aaj se Lagbhag 2200 saal purana h ya ushse bhi jyada to ish hisaab se to agni se uttpatti bhi ushse purani how hogi
    Kyunki ushse pahle mauryon ka shashan tha Jo baudh ko Saran dete the
    Or ushi samay parmaron ki uttpatti hue hogi
    Aap kripya meri shanka ko door kare

    • अग्निकुंड कोई उत्पन्न नहीं होता, अग्निकुण्ड में हवन किया गया था जो क्षत्रिय वैदिक धर्म छोड़ बौध धर्म के अनुयायी हो गये, उन्हें वापस वैदिक धर्म में लाया गया और हवन द्वारा शुद्ध किया गया ! उस वक्त चार कुलों के लोग शामिल थे अत: उन्हें अग्निकुंड से पैदा हुआ प्रचारित कर दिया गया और अग्निवंशी लिख दिया गया | इस पर हमारी वेब साईट पर लेख है उसे पढ़ें |

      • में परमार राजपुत हुं, गुजरात राज्य मे सुरेन्द्रनगर जिल्ले मे मूली (परमारो की राज है) गोत्र वशिष्ठ, ईस्ट देव मांडवरायजी, कुल देवी हर्षसिघ्घी माताजी है। मेरे पुजनीय पूर्वजो मूली गांव में पहेले रहेते थे, कीसी कामकाज या रोजगारी की खोज के चक्करमे मेरे पूर्वज वहां से रोजगारी के तलासमे वहां से निकल गये और गुजरात के बरोडा जिल्ले मे महिसागर नदी के तट पर तिथोर गाव परमारो का स्टेट माना जाता है वहां जा कर मेरे पूर्वज ७ से ८ पेढी या उससे पहेले जा कर बसे थे। आज हमारी हालत ये है की हम मूली के परमार है तो कोई मानने को तैयार नही है। कीसी के पास परमार वंश की ३६ शाखा है, जीसमे गुजरात स्टेट तिथोर (चिथोर) गाव का ईतिहास या कोई डीटेईल दे सकता है तो मेरी मदद करो, जय माताजी

  3. हम परमार वंश गोत्र सपनो धार उज्जैनी अब शिवपुर दियर नम्बरी जिला बलिया उत्तर प्रदेश के निवासी है

  4. मैं परमार राजपूत हू लेकिन मेरा गोत्र kondilya है झारखंड, बंगाल, बिहार, मे भी यही गोत्र है जबकि सही गोत्र वसिष्ठ हैं क्यों कि सभी dhar नगर के ही है अगर आप मे से किसी को kondilya gotra के बारे मे जानकारी है तो देने का कष्ट करें l नमस्कार l

  5. कृप्या परमार राजपूत कौन्डील्य गोत्र की विस्तृत जानकारी दे।

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