जोधपुर किले का इतिहास History of Jodhpur Fort

रणबंका राठौड़ों की नगरी जोधपुर में, किसी ओर से भी प्रवेश करने पर कोसों दूर से चिड़ियानाथ पहाड़ी पर धरती का लाडला, मेहरानगढ़ दूर से चमकता दिखाई देता है | जोधपुर में सूरज की सर्वाधिक किरणें पड़ती है अंत: सूरज की रौशनी में नहाये किले की चमक देखते ही बनती है | धरातल से 121 मीटर ऊंचाई बने इस किले को मोरध्वज और गढ़ चिंतामणि के नाम से भी जाना जाता है | मेहरानगढ़ फोर्ट अपनी स्थापत्यकला और कलात्मक महलों के लिए देश विदेश में काफी चर्चित है और देश के पर्यटन केन्द्रों में प्रमुख है | इसकी दृढ़ता, कलात्मकता व भव्यता देख ब्रिटिश पत्रकार  रुडयार्ड किपलिंग के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा- “इसका निर्माण फ़रिश्ते, परियों और देवताओं की करामत है |”

दुर्ग की ऊंचाई दुर्जेयता देखकर इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इस किले के बारे में लिखा- “जोधा के बेटे इस महल की खिड़कियों से ही अपनी सल्तनत पर अधिपत्य रख सकते थे, उनकी हुकूमत की हद तक इस किले से उनकी निगाह पहुँचती थी|” अपनी राजधानी को मंडोर को सुरक्षा की दृष्टि से अनुपयुक्त समझकर मारवाड़ के शासक राव जोधाजी ने 12 मई 1459 को इस दुर्ग की नींव रखी व अपने नाम से जोधपुर नगर बसाया | आपको बता दें मारवाड़ में राव सीहाजी  ने राठौड़ साम्राज्य की नींव डाली थी और राव सीहा जी से लेकर जोधपुर के महाराजा हनुमंतसिंह जी कुल चालीस शासक हुए हैं |

इस दुर्ग के निर्माण की कहानी भी बड़ी रोमांचक है | राव जोधा की प्रबल इच्छा थी कि नया किला समृद्धि का प्रतीक रहे अंत: उन्होंने ज्योतिषियों व तांत्रिकों से सलाह ली| तंत्रपूजा के अनुसार किले की नींव में नरबलि आवश्यक थी अंत: राव जोधा ने अपने राज्य में मुनादी करवाई कि जो जाबांज चिड़ियानाथ पहाड़ी पर बनने वाले किले की नींव में जिन्दा गड़ने के लिए तैयार हो, राजा की तरफ से भूमि व प्रचुर धन इनाम के रूप में दिया जायेगा| मुनादी सुनकर रजिया भांबी इस बलिदान के लिए तैयार हुआ और नींव के मुहूर्त के समय वह नींव में दफ़न हो गया, ठीक उसके ऊपर दुर्ग का खजाना और नक्कारखाना बनाया गया| इस तरह मारवाड़ रियासत के एक नागरिक ने दुर्ग की नींव पड़ते ही अपने प्राणों का बलिदान दिया| रजिया भांबी के इस बलिदान पर आज भी जोधपुर राजपरिवार सहित मारवाड़ के सभी नागरिक गर्व करते हैं और रजिया भांबी को याद करते हैं |

दुर्ग में जाने के लिए घुमावदार सड़क बनी है, दुर्ग में विविध हिस्से, जिनमें दरवाजे, महल मंदिर आदि स्थान हैं, जो समय समय पर विभिन्न राजाओं द्वारा बनाये गए हैं | प्रवेश के लिए दो मुख्य दरवाजे फतेहपोल व जयपोल है | मुगलों को हराने के उपलक्ष में 1707 में महाराजा अजीतसिंह ने बनवाया और जयपोल को महाराजा मानसिंह ने 1909 में जयपुर व बीकानेर की संयुक्त सेनाओं को पराजित करने के उपलक्ष्य में बनवाया था| उसके बाद लाखन पोल है जिस पर जयपुर की तोपों के निशान आज भी विद्यमान है| फिर 16 वीं शताब्दी में राजा मालदेव द्वारा निर्मित अमृतीपोल आता है| इस पोल में घुसने के बाद दांई तरफ महलों की विशाल ऊंचाई के दर्शन होते हैं | आगे बढ़ने पर राव जोधा का फलसा आता है जो राव जोधा द्वारा निर्मित है जो उस वक्त दुर्ग का प्रवेश द्वार होता था| राव जोधा के फलसे के बाद अतीत की अनगिनत स्मृतियाँ संजोये लोहापोल आता है जिसका निर्माण भी राव जोधा ने करवाया था|

लोहापोल के आगे सूरजपोल है जहाँ से सीढियाँ चढ़कर जोधपुर दुर्ग में स्थापत्य के खास ख़ास नमूने जाली-झरोखों वाले महल व गवाक्षों के सुन्दर और कलात्मक शिल्प देखे जा सकते हैं | यहीं श्रृंगार चौकी हैं, जहाँ राव जोधा को छोड़कर सभी राजाओं का राज्याभिषेक हुआ था| किले के पार्श्वभाग की प्राचीर काफी ऊँची है, यहाँ कई विशाल व सीधी ऊँची बुर्जें है, जहाँ तोपों के मोर्चे बने हैं| यहाँ रखी तोपों में किलकिला, शम्भूबाग़ और गजनीखां तोपें रखी है जो कभी शत्रु सेना पर कहर ढाती थी| तोपखाने से आगे चलते ही चामुंडा देवी का शानदार व भव्य मंदिर बना है| इस देवी की प्रतिष्ठा राव जोधा ने मंडोर से लाकर करवाई थी|

राव जोधा से लेकर महाराजा तखतसिंह तक यह दुर्ग शाही आवास रहा है| दुर्ग के अंत भाग में लाल पत्थरों से निर्मित चिताकर्षक, कलापूर्ण सुन्दर व भव्य महल बने हैं| इनमें मोती महल, फतह महल, श्रृंगार महल, शीश महल, जनाना महल, और दीपक महल खास हैं| झरोखों, जालियों व शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूनों व सुन्दर व मनमोहक चित्रकारी युक्त इन महलों में कईयों की छत कांच व स्वर्ण जड़ित है| अपने जीवनकाल में यह दुर्ग दो बार पराभव देख चुका है | राव मालदेव के समय 1544-46 में शेरशाह सूरी व 1678 में महाराजा अजीतसिंह के समय यह दुर्ग मुगलों के अधीन रहा|

देश के अन्य किलों की अपेक्षा राठौड़ी शौर्य का प्रतीक यह किला आज पर्यटकों को सबसे ज्यादा लुभाता है |  स्थापत्य-वैभव और वास्तुकला के इस बेजोड़ नमूने के साथ अनेक शौर्य गाथाएँ जुड़ी है| 52 युद्धों के विजेता राजा मालदेव, अफगानिस्तान तक अपने शौर्य का डंका बजाने वाले प्रतापी राजा जसवंतसिंह और वीर शिरोमणि दुर्गादास जिसे देश का बच्चा बच्चा जानता है के शौर्य की अनगिनत कहानियां इस दुर्ग से जुडी है|

वर्तमान में यह दुर्ग मारवाड़ के पूर्व शासक परिवार की सम्पत्ति है और 1974 से अपने 500 वर्षों का इतिहास सहेजे एक शानदार संग्रहालय है जो दर्शनीय है और देश विदेश के लाखों पर्यटक इसे देखने व इसके शौर्य की कहानियां सुनने यहाँ आते हैं| इसी दुर्ग में महाराजा मानसिंह द्वारा स्थापित एक प्राचीन पुस्तकालय भी है जहाँ देश विदेश के हजारों शोध छात्र शोध सामग्री जुटाने आते हैं| जोधपुर देश के सभी महत्त्वपूर्ण नगरों से सड़क, रेल व वायु मार्ग से जुड़ा है यदि आप भी वास्तुकला के इस बेजोड़े नमूने को निहारना चाहते है तो पधारिये आपका स्वागत है |

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