यहाँ खिलजी को अपने ही खजाने के बदले मिले थे कटे सिर व राख की ढेरियाँ

यहाँ खिलजी को अपने ही खजाने के बदले मिले थे कटे सिर व राख की ढेरियाँ

History of Jaisalmer : अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विभिन शासकों से वसूले धन को पन्द्रह सौ खच्चरों व पन्द्रह सौ घोड़ों पर लाद कर जैसलमेर के रास्ते दिल्ली भेजा जा रहा था| इस काफिले की सुरक्षा के लिए कई सौ हथियारबंद सैनिक भी तैनात थे| जिसकी सूचना मिलने पर जैसलमेर के रावल जैतसी के राजकुमारों ने उस लूट लिया और खजाने को जैसलमेर ले आये| इस लूट की सूचना मिलने पर खिलजी ने नबाब महबूब खान के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी| इस सेना का जैसलमेर के भाटियों ने पूरी तैयारी के साथ मुकाबला किया| जैसलमेर के राजकुमार हमीर व देवराज ने जो किले के बाहर सेना के साथ तैनात थे, ने खिलजी की सेना को शिविर से बाहर तक नहीं निकलने दिया| उनकी खाद्य सामग्री को भी बाधित किया| कर्नल टॉड के अनुसार इस शुरूआती लड़ाई में खिलजी सेना के सात हजार सैनिक मारे गए|

खिलजी सेना का जैसलमेर किले पर यह घेरा वर्षों चला, इसी दौरान रावल जैतसी का निधन भी हो गया और उनके बड़े पुत्र मूलराज का राजतिलक भी हुआ| एक बार खिलजी की सेना ने जैसलमेर किले पर आक्रमण किया, पर नौ हजार सैनिक खोने के बाद भी किले को फतह नहीं किया जा सका| वर्षों चले इस घेरे के बाद किले में खाद्य सामग्री का अभाव हो चला था अत: रावल मूलराज ने खिलजी सेना के आगे आत्म समर्पण करने के बजाय जौहर व साका कर आत्म बलिदान का निर्णय लिया| सन 1294 ई. में जैसलमेर किले में उपस्थित क्षत्राणियों ने अग्नि की प्रचंड ज्वाला में कूद कर जौहर व्रत किया और जैसलमेर के किले में बचे भाटी वीरों ने केसरिया वस्त्र धारण कर किले के दरवाजे खोल दिए और दुश्मन सेना पर टूट पड़े| इस तरह जैसलमेर के वीरों ने जौहर के बाद साका किया| आपको बता दें केसरिया वस्त्र धारण कर, किले के दरवाजे खोल इस तरह आक्रमण करने को राजपूत संस्कृति में साका करना कहा जाता है|

भाटी वीरों द्वारा साका कर वीरगति पाने के बाद खिलजी सेना किले में प्रविष्ट हुई पर उसे अपने खजाने के बजाय मिली राख की ढेरियां और क्षत विक्षत शव व कटे सिर| खजाने को पहले ही भाटी वीर ठिकाने लगाकर हजम कर चुके थे| जीत के बाद खिलजी की सेना को ऐसा कोई व्यक्ति जिन्दा नहीं बचा जो उसे खजाने का राज बता सके और जिसे सजा दी जा सके| अलाउद्दीन खिलजी अपने समय का सबसे शक्तिशाली शासक था| उसने भारत में जितने किले जीते उतने शायद ही किसी ने जीते हों, फिर भी यहाँ के वीर उसका खौफ नहीं खाते थे और मौका मिलने पर शक्तिशाली बादशाह खिलजी को चुनौती देते रहते है जो उन वीरों के हौसले, हिम्मत और दुस्साहस को उजागर करता है|

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