शेखावाटी का माउंट : हर्षनाथ पहाड़

शेखावाटी का माउंट : हर्षनाथ पहाड़
इस माह कोई एक दशक बाद 15 दिन गांव में गुजारने को मिली छुट्टी के दौरान 6 अगस्त को गांव के पास स्थित लोसल कस्बे में बैंकिंग कार्य निपटाने के बाद वहीँ से बस पकड़ राजपूत युवा परिषद् के नव-नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष उम्मेद सिंह करीरी से मिलने सीकर आ गया, उम्मेद सिंह करीरी का कार्यालय सीकर से मेरे गांव की मुख्य सड़क पर ही है सो कार्यालय के आगे ही बस उतार देती है|

उस दिन उनके कार्यालय के कर्मचारी हड़ताल पर थे सो उम्मेद सिंह जी भी हमसे बतियाने को फ्री थे, दिन भर कई ज्वलंत सामाजिक व स्थानीय राजनैतिक मुद्दों पर चर्चा होती रही शाम को वापस गांव जाने का सोच ही रहा था कि उम्मेद जी के पास राजश्री साफा हाउस के राजेन्द्र सिंह खोरी का फोन आ गया, वे बोले मैं जल्द ही आपके पास आ रहा हूँ और कुछ देर में ही वे अपनी स्विफ्ट कार से दो और मित्रों के साथ आ धमके, मुझे देखते ही उन्होंने उम्मेद सिंह जी को कह दिया – “भाई साहब फेसबुक के बाहर फेस टू फेस कभी कभार मिलते है अत: आज रात्री का खाना व रहना मेरे घर मेरे गांव खोरी में ही होगा|” उन्होंने जिस अधिकार से आग्रह किया उसके बाद मेरे व उम्मेद सा दोनों के लिए ना कहना मुश्किल था| सो चुपचाप उनकी गाड़ी में बैठ उनके गांव की और चल पड़े|

राजेन्द्र सिंह जी का गांव खोरी अरावली पर्वत श्रंखला की एक ऊँची पहाड़ी हर्षनाथ की तलहटी में बसा हुआ है सो जैसे जैसे हम गांव के नजदीक पहुंचे हर्षनाथ पहाड़ बड़ा दिखाई देने लगा और उस पर लगे बिजली बनाने वाले बड़े बड़े पंखे हमें अपनी और आकर्षित कर पहाड़ पर आने का न्यौता देने लगे, साथ ही वर्षा के मौसम में हरे भरे पहाड़ की रौनक का गुरुत्वाकर्षण हमें इस कदर अपनी और खिंच रहा था कि हमारी गाड़ी खोरी गांव की और जाने वाले रास्ते की बजाय सीधे पहाड़ की राह हो ली और कुछ ही मिनटों में पहाड़ की चढ़ाई चढने लगी|

हर्षनाथ पहाड़ पर सबसे पहले कालेज के दिनों में जाना हुआ था उस वक्त भी बारिश का मौसम था,बादल पहाड़ पर उतरे हुए थे तब हम छात्रावास के सभी छात्र अपने रसोईये को साथ लेकर बादलों व पहाड़ी के साथ दाल-बाटी का लुफ्त उठाने गये हुए थे और सभी साथियों ने अपनी अपनी साइकिलें तलहटी में बसे गांव में रखकर लगभग चार किलोमीटर की ऊँची चढ़ाई पर रोमांच के साथ पैदल ही चढ़ गये थे| दूसरी बार कालेज के दिनों में ही एक मुंबई की फिल्म पार्टी वालों को लोकेशन दिखाने के बहाने जाना हुआ, यह इस पहाड़ पर मेरी पांचवी यात्रा थी, जिसमें हमने गाड़ी में बैठ सड़क मार्ग से चढ़ाई चढ़ी|

चढाई चढ़ रही गाड़ी के म्यूजिक सिस्टम में चल रहा “काको ल्यायो काकड़ी काकी मांग्या बीज, काको ठोकी लात की काकी गया गीत” पहाड़ की रौनक में चार चाँद लगा मन को प्रफुल्लित कर दे रहा था, गीत के बोल सुन एक बार तो लगा कि कहीं “काकी के लात” मारने वाला गीत किसी नारीवादी ने सुन लिया तो हमें नारी विरोधी घोषित करने में एक क्षण नहीं लगायेगा पर शुक्र है ऐसा कोई नारीवादी वहां था नहीं|

गीत के साथ ही पहाड़ी की सड़क पर आती जाती गाडियों का रैला देखकर भी अचम्भा हुए जा रहा था क्योंकि किशोरावस्था में जब भी वहां गये थे तब अपने समूह के अलावा दूसरा कोई समूह नजर नहीं आता था आदमी के नाम पर दिखते थे तो सिर्फ पुरातत्व, वन विभाग के कर्मचारी, गड़रिये या फिर मंदिर के पुजारी| इनके अलावा तो बकरियां व बंदर ही चारों और नजर आते थे पर इस बार इसके विपरीत सड़क पर गाड़ियों का रैला था, पहाड़ पर चढ़ने के बाद वहां पार्किंग भी गाड़ियों से पटी पड़ी थी, पार्किंग स्थल से मंदिर तक लोगों का हुजूम दिखाई दे रहा था, पूछने पर पहाड़ के पड़ौसी राजेन्द्र सिंह ने बताया कि आजकल यहाँ हर वक्त भीड़ रहती है, अब तो यह पहाड़ पिकनिक स्पॉट बन गया है, रास्ते में गाड़ियाँ रोक या पहाड़ पर इधर उधर बैठे युवकों को मदिरा की चुस्कियां लेते देख मुझे भी समझते देर ना लगी कि अब ये पहाड़ सुरापान के शौक़ीन के लिए एक शानदार जगह बन गया है न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला|

खैर…पहाड़ पर भीड़ के बावजूद रौनक देखने वाली थी, बिजली बनाने वाले ऊँचे विंड पावर के पंखे अपनी मस्ती में बिना किसी की परवाह किये अपनी चाल में घूम बिजली बनाने में व्यस्त थे, चूँकि हमारे पहुँचते पहुँचते शाम हो चुकी थी, बादलों की ओट में छुपे सूर्य देवता अपनी ड्यूटी ख़त्म कर अपने घर जाने की तैयारी में थे, इस बार देखा पहाड़ पर सूर्य देव को घर प्रस्तान करते का दृश्य (सनसेट) देखने को वहां बैठने के लिए बैंचें व टिन के झोपड़े नुमा शेड बना सरकार ने विशेष व्यवस्था भी कर दी है|

विंड पावर पंखों, हरियाली, लोगों व गाड़ियों की भीड़, ऊँचा शिव मंदिर, वन विभाग के दफ्तर व उनका गेस्ट हाउस सबने मिलकर हर्षनाथ पर्वत को आबाद कर रमणीय बना दिया जो वहां गये हर पर्यटक को प्रभावित व रोमांचित करता है, मुझे भी इन सब ने रोमांचित किया पर चूँकि मेरी यह पांचवी यात्रा थी सो मुझे पता था कि मेरी ये ख़ुशी, रोमांच कुछ ही क्षण बाद ख़त्म हो अवसाद का रूप ले लेगा जब मैं सन 973 ई. में चाहमान शासक विग्रहराज प्रथम के शासन काल में एक शैव सन्त भावरक्त द्वारा बनवाये गये क्षत विक्षत खंडहर मंदिर के अवशेष देखूंगा|

उत्तर मध्यकाल में शिव को समर्पित यह मंदिर वर्तमान में नए बने मंदिर के पास ही ऊँचे अधिष्ठान पर निर्मित है जो आज खंडहर में तब्दील हो चूका है| इस खंडहर प्राचीन मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, कक्षासन युक्त रंग्मंड़प एवं अर्धमंडप के साथ एक अलग नंदी मंडप बना है, अपने मौलिक अवस्था में यह मंदिर एक ऊँचे शिखर से परिपूर्ण था| यह मंदिर अपनी स्थापत्य विशिष्टताओं एवं ब्राहमण देवी-देवीताओं की प्रतिमाओं सहित नर्तकियों, नर्तकों, संगीतज्ञों, योद्धाओं व कीर्तिपुरुषों के प्रारूप वाली सजावटी दृश्यावलियों के उत्कृष्ट शिल्प कौशल हेतु उल्लेखनीय है| मंदिर के पास पड़ी विखंडित कलाकृतियों को देख मंदिर की कलात्मकता की उत्कृष्टता का अंदाजा सहज ही लग जाता है| खंडित प्राचीन पुरातत्व को देख अचानक ब्लॉगर ललित शर्मा जी की याद गयी कि काश वे साथ होते तो कलाकृतियों के पुतात्त्व व उनकी शिल्पकला पर विस्तृत प्रकाश डाल हमारा ज्ञान वर्धन करते|

इतनी सुंदर कलाकृतियों को देख सहज अनुमान लगाया जा सकता कि कभी इस मंदिर के कैसे सुनहले दिन थे पर एक धर्मांध बादशाह औरंगजेब की धर्मान्धता ने इसकी वैभवता नष्ट कर इसे जमीन पर छितराने को विवश कर दिया, मंदिर के साथ ही एक भैरव मंदिर भी है वह भी उस धर्मांध बादशाह की कुदृष्टि का शिकार बना था, औरंगजेब के हमले के बाद इस मंदिर की मरम्मत जरुर हुई पर लम्बे समय तक इसके रख रखाव पर ध्यान न देने के चलते आज यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, आधुनिक लोगों ने नाम कमाने के लिए उसके पास एक ऊँचे शिखर वाला नया मंदिर तो बना दिया पर इसकी मरम्मत की किसी ने जरुरत नहीं समझी, और अब पुरातत्व विभाग के अधीन होने के चलते कोई चाह कर भी इस मंदिर के लिए आंसू बहाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता|

उत्कृष्ट कलाकृतियों की दर्दनाक स्थित देख मन विचलित होने के बावजूद साथियों की ख़ुशी में खुश दीखते हुए पहाड़ के सौंदर्य व उसके साथ, साथ गये मित्रों को अलग अलग एंगल्स से कैमरे में कैद कर रात होने से पहले पहाड़ से उतरने को फिर गाड़ी में सवार में हुए, गाड़ी का म्यूजिक सिस्टम फिर “काको ल्यायो काकड़ी” राजस्थानी लोक गीत सुनाने में व्यस्त हो गया| फेसबुक मित्र राजेंद्र सिंह के खोरी गांव स्थित घर पहुँचते पहुँचते अँधेरे के साथ साथ वर्षा की फुहारों ने हमारा गांव में स्वागत किया, मित्र के घर हमारे रात्री भोजन हेतु बकरे के मीट की हंडिया पहले से चढ़ी हुई थी जिसमें वर्षा की वजह से खलल पड़ रहा था आखिर हंडिया पर छतरी तान बारिश से बचा भोजन सामग्री को पकाया गया जो इतनी बढ़िया पकी कि वैध जी द्वारा मांसाहार खाने पर लगायी रोक के बावजूद अपने आपको रोक नहीं सका|

फेसबुक व फेस टू फेस मित्रों का साथ, स्वादिष्ट भोजन, बारिश का मनभावन मौसम और हर्षनाथ की सुरम्य वादियों की यात्रा ऐसे कई सुनहले यादगार मौके दिल्ली की भाग दौड़ वाली आपाधापी जिन्दगी में कभी कभार ही मिलते है|

15 Responses to "शेखावाटी का माउंट : हर्षनाथ पहाड़"

  1. पुराने स्थापत्यों का सरंक्षण आवश्यक है.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज वृहस्पतिवार (22-06-2013) के "संक्षिप्त चर्चा – श्राप काव्य चोरों को" (चर्चा मंचः अंक-1345)
    पर भी होगी!
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ब्लॉ.ललित शर्मा   August 22, 2013 at 1:58 am

    इस मंदिर को देखने की इच्छा जागृत हो गयी, नवम्बर में चलेगे आपके साथ.

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  4. राम राम सा, आपने एक नयी और अद्भुत स्थान के बारे में बताया, धन्यवाद, कभी शेखावटी का जाना हुआ तो यंहा पर जरुर जायेंगे. वन्देमातरम…

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  5. P.N. Subramanian   August 22, 2013 at 2:59 am

    चाहमान शासनकाल का पहला मंदिर देख पाया. चित्रों में ऊंचे शिखर वाला दूसरा मंदिर भी दिखा फिर पढ्ने से जानकारी हुई.

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  6. ताऊ रामपुरिया   August 22, 2013 at 7:06 am

    बहुत रोचक तरीके से लिखा अपाने इस यात्रा वृतांत को, आभार.

    रामराम.

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  7. ताऊ रामपुरिया   August 22, 2013 at 7:08 am

    “काको ल्यायो काकड़ी काकी मांग्या बीज,
    काको ठोकी लात की काकी गया गीत”

    हा हा हा…बचपन याद हो आया जब इन लाइनों को यों ही गाया करते थे और कभी कभी मोहल्ले के काकाओं से पिटाई भी हो जाती थी.:)

    रामराम.

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  8. प्रवीण पाण्डेय   August 22, 2013 at 8:30 am

    सांस्कृतिक धरोहरों को निर्लज्ज भाव से तोड़ना और उन्हें फिर से स्थापित न होने देना, यह हमारे इतिहास के दुखद अध्याय हैं।

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  9. HARSHVARDHAN   August 22, 2013 at 4:40 pm

    आज की बुलेटिन जन्म दिवस : हरिशंकर परसाई …. ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर …. आभार।।

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  10. Lalit Chahar   August 22, 2013 at 5:12 pm

    हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आप को आमंत्रित किया जाता है। कृपया पधारें!!! आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा |

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  11. Lalit Chahar   August 23, 2013 at 9:46 am

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल किया गया है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} (25-08-2013) को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर …. Lalit Chahar

    Reply
  12. मदन मोहन सक्सेना   August 23, 2013 at 10:56 am

    सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति.
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  13. Gajendra singh Shekhawat   August 27, 2013 at 3:41 am

    हर्षनाथ पहाड़ यात्रा वर्णन की गतिशीलता में इस कदर बह गए है की जाने का मन हो रहा है । जीण माता की यात्रा के दौरान दूर से घुमती हुयी इन पवन चक्कियों को निहारा जरुर है लेकिन जा नहीं पाए ।

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  14. Arun   April 18, 2014 at 8:52 am

    उस धर्मांध बादशाह के नाम से आज भी एक मुख्य सड़क है दिल्ली में… मजबूरी क्या है … समझ नहीं आता … जय भवानी

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